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कितनी अराजक है ‘आप’ की नीति ?

जागरण जंक्शन फोरम

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लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती। नेताओं को जनता से वही वादे करने चाहिए जो वो पूरे कर सकें – राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

पिछले कई दिनों से अपनी नीतियों, धरना-प्रदर्शनों को लेकर विवादों में चल रही दिल्ली की सरकार पर अराजक होने जैसे कई आरोप लगाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं 65वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपने भाषण में ‘अराजकता’ को शासन का विकल्प मानने से इंकार किया है। प्रणब मुखर्जी के ऐसे तीखे शब्दों को सीधे तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कार्यप्रणाली से ही जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ लोग जहां अरविंद केजरीवाल के इस संघर्ष को एक बदलाव की नजर से देख रहे हैं वहीं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो आम आदमी पार्टी की विचारधारा और काम करने के तरीकों को अराजकता की निशानी करार दे रहे हैं। यहां तक कि स्वयं अरविंद केजरीवाल भी खुद को सबसे बड़ा अराजकतावादी मान चुके हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि एक मुख्यमंत्री का अपने ही प्रशासन के खिलाफ संघर्ष किस ओर इशारा करता है।


बुद्धिजीवियों का एक वर्ग, जो परंपरागत तौर-तरीकों के इतर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की नीतियों से संतुष्ट है, का कहना है कि आज देश को बदलाव की आवश्यकता है और यह जरूरत ऐसी है जिसे किसी भी रूप में नजरअंदाज कर आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। मुख्यमंत्री का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के खिलाफ धरना-प्रदर्शन यह साबित करता है कि दिल्ली की पुलिस राज्य के निर्वाचित नेताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है और उनके अनुसार कार्य करना जरूरी नहीं समझती। इसके परिणामस्वरूप राज्य में शांति-व्यवस्था स्थापित करना एक कठिन कार्य बन चुका है। ऐसे हालातों में अरविंद केजरीवाल का यह संघर्ष प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ बदलाव तो जरूर लाएगा। इस वर्ग में शामिल लोगों का यह भी कहना है कि बड़े बदलाव लाने और प्रशासन की नींद खोलने के लिए बड़े कदम उठाने पड़ते हैं और ऐसे कदम उठाने वालों को थोड़े बहुत आरोपों का सामना करना ही पड़ता है।


वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जिनके अनुसार अरविंद केजरीवाल का प्रशासन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करना समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अन्य राज्यों और आम जन के बीच एक गलत उदाहरण पेश कर रहे हैं। पहले ही प्रयास में इतनी बड़ी जीत हासिल कर ‘आप’ 2014 में भी एक बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है लेकिन सड़कों पर ऐसे प्रदर्शनों के कारण वह अपनी लोकप्रियता और आगामी चुनावों में मिलने वाले फायदे को गंवा सकती है। एक मुख्यमंत्री का अपनी मांग मनवाने के लिए सड़कों पर उतरना देखकर आम जनता भी अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर सकती है। ‘आप’ के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को संवैधानिक पद ग्रहण करने के बाद ऐसे प्रदर्शन या ऐसी कोई भी हरकत नहीं करनी चाहिए जिसका खामियाजा राज्य या फिर समाज को भुगतना पड़े।


उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. अरविंद केजरीवाल का अपने ही राज्य की पुलिस व्यवस्था के साथ संघर्ष कितना जायज है?

2. क्या अराजकता के बल पर समाज में बदलाव लाया जा सकता है?

3. क्या अरविंद केजरीवाल की इस ‘अराजक’ नीति का खामियाजा अन्य राज्यों को भी भुगतना पड़ सकता है?

4. मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता है, तो ऐसे में ‘आप’ की नीतियों को किस हद तक गलत करार दिया जा सकता है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:

कितनी अराजक है ‘आप’ की नीति ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक ‘आप की अराजकता’’  है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व आप की अराजकता’’  – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


3. अगर आपने संबंधित विषय पर अपना कोई आलेख मंच पर प्रकाशित किया है तो उसका लिंक कमेंट के जरिए यहां इसी ब्लॉग के नीचे अवश्य प्रकाशित करें, ताकि अन्य पाठक भी आपके विचारों से रूबरू हो सकें।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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