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ईश्वर सर्वभूतानाम

E. Rajesh Pathak

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भारतीय चिंतन में मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद की कोई गुंजाईश नहीं. इसलिए कहा कहा गया है – ‘ ईश्वर सर्वभूतानाम’ [गीता]  अथार्थ, सभी प्राणीयों  में ईश्वर का वास है. ये ईश्वरीय तत्व सबमें सामान रूप से भी है, किसी में कम या ज्यादा नहीं- ‘समानं सर्व भूतेषु’[गीता]. जातीय आधार पर अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ माननें वाले आज भी कम नहीं हुए हैं, पर गीता इस विषय पर  क्या कहती है,देखें – ‘चातुरवर्न्यम मया सृष्टम गुणकर्मविभागश’ अथार्थ, ‘ये चार वर्ण मेरे द्वारा गुण और स्वाभाव के आधार पर सर्जित किये गए हैं [ जो कि जन्म के स्थान पर योग्यता एवं चरित्र पर आधारित हैं]’.[गीता:४-१३]

जन्म को लेकर ऊँच-नीच की धारणा और जातिवाद को निर्मूल करने वाले गीता के इन उपदेशों के साक्षात् दर्शन जिसके जीवन में मिलते हैं वो हैं महात्मा गाँधी.  उन्होंनें  इसके [जातिवाद] के  निवारण के लिए जो-जो उपाय हो सकते हैं वो सब किये. जात-पात की भावना का तोड़ जिस एक चीज़ में उन्हें सर्वाधिक दिखा वो था अंतर्जातीय  विवाह.

९ मई, १९४५ को एक समाजसेवक को लिखे अपने पत्र में वे कहते है- ‘विवाह उसी जाति में हो रहा हो तो मुझसे आशीर्वाद मत मांगो. लड़की दूसरी जाति की होगी तो में अवश्य आशीर्वाद दूंगा.’ आगे आने वाले दिनों में इस क्रम में एक कदम आगे बढ़ते हुए हरिजन सेवक संघ के एक कार्यकर्त्ता द्वारा पूछे प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था-‘मुझे ऐसा लगता है कि विचार निरंतर विकसित होते रहते हैं.  आगे बढ़ते समय सबको उस वेग से बढ़ना संभव नहीं होता. यदि तुम्हारी लड़की अविवाहित हो और सात्विक धर्मभावना से प्रेरित होकर तुम उसके लिए हरिजन वर ला सकते हो, तो में प्रसन्नतापूर्वक वधु-वर का अभिनन्दन करूँगा.’

सन १९४५ को महाराष्ट्र में नवले और करपे दो परिवारों  की संतानों का अन्तर्जातीय विवाह हुआ. समाज के जिन प्रतिष्ठित जनों ने वर-वधु को आशीर्वाद भेजे उनमें प्रमुख थे- स्वातंत्र्यवीर सावरकर; जगद्गुरु शंकराचार्य, डॉ.कुर्तकोटी; र.स्व.सेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर और साथ ही गांधी जी. इतना ही नहीं, बल्कि आगे चलकर ऐसा हो गया कि उनकी पूरी कोशिश रहती कि ऐसे किसी विवाह में जाना नहीं छूटे जिसमें वर या वधु में से कोई एक हरिजन हो.

पहली पत्नी के देहांत के उपरान्त, डॉ अम्बेडकर का दूसरा विवाह एमबीबीएस डॉक्टर सारस्वत ब्रह्मण शारदा कबीर के साथ हुआ था. इस अवसर पर सरदार पटेल ने उन्हें पत्र में लिखा, ‘मुझे यकीन है कि यदि बापू आज जीवित होते, तो अवश्य ही उन्होंने आपको आशीर्वाद दिया होता.’ अंबेडकर ने जवाब में लिखा, ‘मैं आपकी बात से सहमत हूं कि यदि बापू जीवित होते, तो इसे[शारदा कबीर]  अपना आशीष दिया होता.’

अस्पृश्यता के अपमान का सबसे बड़ा भुग्तभोगी समाज स्वछता के कार्य में लगा वाल्मीकि समाज है. इसके निवारण के लिए स्वच्छता के कार्य को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने का उन्होंने भरसक प्रयास किये. इसकी शुरुआत उन्होंने अपने   सावरमती आश्रम से की. आश्रम के स्वच्छता के लिए अलग से स्वच्छताकर्मी न रखते हुए उन्होंने  ये नियम बनाया  कि वहाँ रहना वाले कार्यकर्त्ता ही स्वयं  इसकी देखभाल करे।

वो कहा करते थे-‘हर व्यक्ति को स्वयं का सफाईकर्मी होना चाहिये. हरिजनों में गरीब सफाई करने वाला  समाज में सबसे नीचे खड़ा है जबकि वह सबसे महत्वपूर्ण है। अपरिहार्य होने के नाते समाज में उसका सम्मान होना चाहिए एक वाल्मीकि  जो समाज की गंदगी साफ करता है उसका स्थान मां की तरह होता है। जो काम एक वाल्मीकि  दूसरे लोगों की गंदगी साफ करने के लिए करता है वह काम अगर अन्य लोग भी करते तो यह बुराई कब की समाप्त हो जाती’। (गांधी वाङ्मय, भाग-54, पृष्ठ 109)

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्‍य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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