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पृथ्वीराज कपूर : अभिनय के भीष्म पितामह

क्लासिक फिल्म मुगल ए आजम में बादशाह अकबर की जीवंत भूमिका निभाने वाले हिंदी सिनेमा के युगपुरुष पृथ्वीराज कपूर को उनकी कड़क आवाज, रोबदार भाव-भंगिमाओं और शानदार अभिनय क्षमता के लिए आज भी याद किया जाता है. फिल्मों से दौलत और शोहरत पाने के बावजूद इस लाजवाब कलाकार का रंगमंच से गहरा लगाव रहा.


पृथ्वीराज कपूर ने फिल्म जगत में अलग मुकाम हासिल करने वाले कपूर खानदान की नींव रखी और उनकी विरासत को अगली कई पीढि़यों ने पूरी शिद्दत के साथ जिया. अगर हम पृथ्वीराज कपूर को हिन्दी सिनेमा का भीष्म पितामह कहें तो गलत नहीं होगा.


Prithviraj-Kapoorपृथ्वीराज कपूर का बचपन

पृथ्वीराज कपूर का जन्म अविभाजित भारत के पेशावर में 3 नवंबर, 1906 को हुआ था. उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर पेशावर में ही पुलिस सब इंस्पेक्टर थे. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. हां, एक दुख उन्हें तीन साल की उम्र में जरूर मिला और वह यह कि उनकी मां दुनिया से चल बसीं. पृथ्वीराज अपने जमाने के सबसे पढ़े-लिखे अभिनेताओं में से थे. उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की और फिर वकालत की पढ़ाई की. हालांकि उनका दिल रंगमंच के लिए ही धड़कता था.


उन्होंने स्कूल में आठ साल की उम्र में अभिनय किया और कॉलेज में नाटक ‘राइडर्स टू द सी’ में मुख्य महिला चरित्र निभाया. रंगमंच को उन्होंने अपनाया लाहौर में रहते हुए, लेकिन पढ़े-लिखे होने के कारण उन्हें नाटक मंडली में काम नहीं मिला.


पृथ्वीराज कपूर का परिवार

17 वर्ष की उम्र में ही उनकी शादी 14 वर्षीय रामसरानी से कर दी गई. अभिनय का शौक उन पर इतना हावी था कि वह अपने तीन बच्चों को पत्नी के पास छोड़कर 1928 में मुंबई आ गए. हालांकि उनके तीन नहीं पांच बच्चे थे जिसमें से देवी निमोनिया से और एक बच्ची नंदी चूहा मारने की दवा को खाने की वजह से मर गई. पृथ्वीराज कपूर के बाद उनके तीन बेटे राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर ने उनके वंश को आगे वढ़ाया. पृथ्वीराज के पौत्र रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, राजीव कपूर, करण कपूर और कुणाल कपूर ने भी फिल्मों में काम किया. इनमें से विशेषकर ऋषि कपूर को बतौर अभिनेता खासी सफलता हासिल हुई. उनकी एक बेटी भी है जिसका नाम उर्मिला है.


आज कपूर खानदान भारतीय सिनेमा जगत का सबसे समृद्ध परिवार माना जाता है जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी कई सितारे दिए हैं.


पृथ्वीराज कपूर का कॅरियर

मुंबई आने पर पृथ्वीराज को फिल्मों में काम करने का पहला मौका “सिनेमा गर्ल” में मिला. यह एक मूक फिल्म थी. उन्होंने आठ अन्य मूक फिल्मों में काम किया. 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” बनी. इस फिल्म में उन्होंने सहायक अभिनेता की भूमिका निभाई.


विद्यापति (1931), सिकंदर (1941), दहेज (1950), आवारा (1951), जिंदगी (1964), आसमान महल (1965), तीन बहूरानियां (1965) आदि फिल्मों में पृथ्वीराज ने अपने दमदार अभिनय का जौहर दिखाया लेकिन उनकी सबसे यादगार फिल्म है “मुगल ए आजम”. इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने बादशाह अकबर के किरदार को अमर कर दिया.


इसके साथ ही उन्हें 1947 की फिल्म “सिकंदर” में एलेक्जेंडर द ग्रेट का किरदार निभाने के लिए याद किया जाता है. अपने बेहतरीन अभिनय और रोबीली आवाज से उन्होंने इस किरदार को अमर कर दिया. बाद के दिनों में सिकंदर के किरदार को ध्यान में रखकर कई फिल्में बनीं, लेकिन पृथ्वीराज ने ऐसा मानक स्थापित कर दिया था कि अधिकतर भूमिकाएं उसी से प्रभावित नजर आईं.


पृथ्वी थिएटर : पृथ्वीराज कपूर का पहला प्यार

फिल्मों में कामयाबी के बावजूद रंगमंच पृथ्वीराज का पहला प्यार बना रहा. वह 1931 में अंग्रेजी में शेक्सपीयर के नाटक पेश करने वाली ग्रांट एंडरसन थिएटर कंपनी से जुड़ गए. पृथ्वीराज ने अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर 1944 में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की. रंगमंच के इस दीवाने ने पहली बार हिंदी में आधुनिक और पेशेवर शहरी रंगमंच की अवधारणा को मजबूती दी. उससे पहले तक केवल लोक कला और पारसी थिएटर कंपनियां थीं. पृथ्वी थिएटर का घाटा पूरा करने के लिए पृथ्वीराज फिल्मों से मिलने वाली राशि को उसमें लगा दिया करते थे. 16 वर्ष तक पृथ्वीराज के मार्गदर्शन में पृथ्वी थिएटर ने 2662 शो किए. पठान, दीवार, अछूत और कलाकार आदि उनके प्रमुख नाटक थे. पैसा फिल्म बनाने के दौरान ही उनका वोकल कार्ड खराब हो गया और उनकी आवाज पहले जैसी दमदार नहीं रही. वर्ष 1960 में उन्हें पृथ्वी थिएटर को बंद करना पड़ा.


अपने शानदार अभिनय से हिंदी सिनेमा को समृद्घ बनाने वाला यह फनकार 29 मई, 1972 को कैंसर से मर गया और लाजवाब अभिनय की विरासत छोड़ गया.


पृथ्वीराज कपूर को मिले पुरस्कार

साल 1972 में पृथ्वीराज कपूर को मरणोपरांत फिल्मों में अमूल्य योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वर्ष 1969 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. वह आठ वर्ष तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे.


पृथ्वी राज कपूर अपने जीवनकाल में पृथ्वी थिएटर को पुनर्जीवित करने की अपनी तमन्ना को पूरा नहीं कर सके लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र शशि कपूर ने अपने पिता को श्रद्घांजलि देते हुए इसे पुनर्जीवित किया.


भारतीय सिनेमा जगत के युगपुरूष पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया.


उनकी चर्चित फिल्मों में “विद्यापति”, “आनंदमठ”, “दहेज”, “परदेसी”, “रूस्तम सोहराब”, “राजकुमार” आदि शामिल हैं.

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