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सिनेमा के सौ साल

hundered of cinemaहिन्दी सिनेमा आज से ठीक 99 साल पहले मूक फिल्मों के साथ शुरू हुई थी और आज उसका यह सफर थ्री डी फिल्मों तक जा पहुंचा है. इस सौ सालों में हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कई को बनता तो कई को बिगड़ता हुआ देखा है. हिन्दी सिनेमा का सफर किसी भी लिहाज से आसान नहीं कहा जा सकता. यह सफर बहुत ही परेशानियों से भरा रहा है. लेकिन तमाम परेशानियों को मिटाकर हिन्दी सिनेमा ने हमेशा आगे की तरफ ही कदम बढ़ाए हैं. हां, यह जरूर है कि ज्यादा आगे जाने के चक्कर में हिन्दी सिनेमा सही और गलत के बीच की दीवार को भी कई बार लांघता हुआ देखा गया. हालांकि सौ साल पूरे होने की खुशी में चलिए सभी गम भुलाकर याद करें हिन्दी सिनेमा के पिछले 99 सालों के सफर को.


फिर लौट आए हैं बैडमैन


21 अप्रैल 2013

99 साल पहले दादा साहब फालके ने 1913 में राजा हरिश्चंद्र की फिल्म बनाई थी, एक ऐसा राजा जो कभी झूठ नहीं बोलता था, जरूरत पड़ने पर भी झूठ का सहारा नहीं लेता था. यह एक मूक फिल्म थी. वर्तमान में सैंकड़ों फिल्में विभिन्न भाषाओं में बन चुकी हैं. हम हिंदी सिनेमा की सदी की ओर कदम रख चुके हैं और 21 अप्रैल, 2013 में हिंदी सिनेमा अपने 100 वर्ष पूरे कर लेगा.


सफर बिन बोलती फिल्मों से लेकर रंगीन सिनेमा तक का

राजा हरिश्चंद्र मई 1913 में तैयार हुई थी. फिल्म बहुत जल्दी भारत में लोकप्रिय हो गई और 1930 तक लगभग 200 फिल्में भारत में बन रही थीं. दादा साहब फालके द्वारा बनाई गई यह फिल्म 1914 में लंदन में दिखाई गई. पहली बोलती फिल्म थी अरदेशिर ईरानी द्वारा बनाई गई आलम आरा. इस फिल्म को दर्शकों की खूब प्रशंसा मिली और इसके बाद सभी बोलती फिल्में बनीं. इसके बाद देश विभाजन जैसी ऐतिहासिक घटनाएं हुर्ई. उस समय बनीं हिंदी फिल्मों पर इसका प्रभाव छाया रहा.


फिल्मों का विषय

1950 से हिंदी फिल्में श्वेत-श्याम से रंगीन हो गईं. उस दौर में फिल्मों का विषय प्रेम होता था और गाने फिल्म का महत्वपूर्ण अंग बन गए थे. इस तरह 1960-70 के दशक में फिल्मों में हिंसा का प्रभाव रहा. 1980-90 के दशक में दोबारा प्रेम पर आधारित फिल्में दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुर्ईं. वर्ष 1990 के बाद बनीं फिल्में भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चर्चा में रहीं. विदेशों में हिंदी फिल्मों के चर्चा में रहने का मुख्य कारण प्रवासी भारतीय थे और फिल्मों में भी प्रवासी भारतीयों को दिखाया जाता था. आज के समय में फिल्मों का विषय बेहद फैल चुका है. समाज के हर पहलू पर आपको सिनेमा जगत में फिल्में देखने को मिलेंगी. हां आज वास्तविकता और मनोरंजन के नाम पर फूहड़पन बेचने का एक नया कारोबार जरूर शुरू हुआ है जिसका सपना शायद दादा साहब फाल्के ने नहीं देखा था.


दो शब्द सिनेमा के पितामह के नाम

दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जाता है. दादा साहब फाल्के सर जेजे स्कूल ऑर्फ आर्ट्स के प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार थे. वह मंच के अनुभवी अभिनेता थे और शौकिया जादूगर. वह प्रिटिंग के कारोबार में थे. 1910 में उनके एक साझेदार ने उनसे अपना आर्थिक सहयोग वापस ले लिया. कारोबार में हुई हानि से उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया. उन्होंने क्रिसमस के अवसर पर ईसामसीह पर बनीं एक फिल्म देखी. फिल्म देखने के दौरान ही उन्होंने निर्णय किया कि उन्हें एक फिल्मकार बनना है. उसके बाद से उन्होंने फिल्मों पर अध्ययन और विश्लेषण करना शुरू कर दिया. फिल्मकार बनने के इसी जुनून को साथ लिए वह 1912 में फिल्म प्रोडक्शन में क्रैश कोर्स करने के लिए इंग्लैंड चले गए और हेपवर्थ के अधीन काम करना सीखा और इसके बाद उन्होंने अपने ज्ञान से भारत को सिनेमामय बना दिया.


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