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गुरुदत्त: कहानी उस आखिरी रात की

जिंदगी में यार क्या हैं? दो ही चीजें हैं कामयाबी और नाकामी.


Guru Dutt

गुरुदत्त साहब की खुद की जिंदगी इतनी फिल्मी थी कि उन पर ही कई फिल्में बन जाएं और जब वह किसी फिल्म को बनाते थे तो लगता था मानों फिल्म का हरेक किरदार असल जिंदगी जी रहा हो. गुरुदत्त की जिंदगी अगर कहानी है तो उनकी मौत भी एक अफसाना. गुरुदत्त साहब की मौत को कोई आत्महत्या बताता है तो कोई हत्या तो कोई सामान्य मौत. पर उस सच को कोई नहीं जानता जो उनकी आखिरी रात का था.


Guru DuttDeath of Guru Dutt: जिंदगी की आखिरी रात

जिस रात के काले अंधेरों के आगोश में गुरुदत्त मौत की नींद सो गए थे उस रात उन्होंने जमकर शराब पी थी, इतनी उन्होंने पहले कभी नहीं पी थी. गीता (उनकी पत्‍‌नी, जिनके साथ वह उनके अलगाव का दौर था) के साथ उनकी नोंकझोंक हो गई थी. गीता ने उनकी बिटिया को उनके साथ कुछ वक्त बिताने के लिए भेजने से इंकार कर दिया था. गुरुदत्त अपनी पत्नी को बार–बार फोन कर रहे थे कि वह उन्हें अपनी बेटी से मिलने दे लेकिन गीता फोन नहीं उठा रही थी. हर फोन के साथ गुरुदत्त का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था. अंत में उन्होंने अल्टीमेटम….या फिर कहें कि यह संकेत देते हुए कहा, बच्ची को भेज दो या फिर तुम मेरा मरा मुंह देखो. इसके बाद उन्होंने करीब एक बजे खाना खाया और ऐसे सोए कि दुबारा नहीं उठे. उनकी मौत उनके कमरे में हुई.


Guru Dutt & Waheeda Rehman affair : प्यासा रह गया वहीदा और गुरुदत्त का प्यार

बॉलिवुड में जब भी प्रेम कहानियों का जिक्र होता है तो वहीदा रहमान और गुरुदत्त का नाम सबसे पहले आता है. इन दोनों की जोड़ी बॉलिवुड की शुरुआती प्रेमी जोड़े की थी. दोनों का प्यार अगर सबकी निगाहों में सबसे बेहतरीन प्यार था तो दोनों का जुदा होना भी किसी ड्रामे से कम नहीं. जुदाई में एक सच्चे आशिक का क्या हाल होता है यह गुरुदत्त ने दिखाया था. शराब की बोतल में डूबे आशिक की छवि अकसर हमें फिल्मों में ही देखने को मिलती है लेकिन असल जिंदगी में उस किरदार को गुरुदत्त ने ही जिया था.


क्राइम थ्रिलर बनाने के उस्ताद: आमतौर पर गुरुदत्त का नाम आते ही उनकी कलात्मक फिल्मों के नाम लोगों के जुबां पर बरबस आ जाते हैं, जबकि क्राइम थ्रिलर फिल्में बनाने में उनका कोई सानी नहीं था और जाल एवं बाजी जैसी फिल्मों को मानक माना जाता है.


Guru Dutt and Devanand दोस्तों के दोस्त: बॉलिवुड में जिस समय अभिनेता अक्सर अपने काम के लिए दूसरे अभिनेता को हटाने के सारे हथकंडे अपनाते थे वहीं गुरुदत्त ने दोस्ती की मिसाल कायम की. देवानंद और गुरुदत्त यह वह जोड़ी थी जो बॉलिवुड में दोस्ती की पहली मिसाल बनकर उभरी. दोनों ने एक साथ अपने कॅरियर की शुरुआत की थी. अपने स्ट्रगल के दिनों में दोनों की दोस्ती खूब जमी और दोनों ने निर्णय किया कि अगर गुरुदत्त साहब कभी डायरेक्टर बने तो वह देवानंद को अपनी फिल्म में लेंगे और अगर कभी देवानंद ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोली तो गुरुदत्त उनकी फिल्म को डायरेक्ट करेंगे. गुरुदत्त और देवानंद ने अपने वायदे निभाए भी. देवानंद ने जब अपनी प्रोडक्शन कंपनी “नवकेतन” खोली तो गुरुदत्त को पहली बार फिल्म “बाजी” में डायरेक्टर बनने का मौका दिया. इसी तरह गुरुदत्त ने भी अपनी सुपरहिट फिल्म “सीआईडी” में देवानंद को अभिनेता के तौर पर काम दिया. दोनों की दोस्ती के किस्से बॉलिवुड में जगजाहिर हैं.


pyaasa_guru_duttगुरुदत्त: एक आदर्श अभिनेता, निर्देशक और कवि

हिंदी सिनेमा में गुरु दत्त का मुकाम सबसे अलहदा है, जिन्हें पूरी दुनिया आज भी याद करती है. वह एक ऐसे ठहरे हुए इंसान और सुलझे हुए फिल्मकार थे, जो कामयाबी पर इतराते नहीं थे और नाकामी से घबराते नहीं थे.


जिंदगी में हार और जीत तो लगी रहती है लेकिन जो हार को एक सबक की तरह लेकर आगे बढ़ता है कामयाबी उसी के कदम चूमती है. बॉलिवुड में अगर पहले शो-मैन का खिताब किसी को जाता है तो वह हैं गुरुदत्त. गुरुदत्त एक कॉमर्शियल मूवी को एक आर्ट मूवी की तरह पेश करते थे और उस समय में उनकी फिल्मों की सफलता देखते ही बनती थी.


गुरुदत्त का जन्म नौ जुलाई, 1925 को कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले में हुआ. उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशकर पादुकोण था. बचपन में आर्थिक दिक्कतों और पारिवारिक परेशानियों के कारण गुरुदत्त मुश्किल से तालीम हासिल कर पाए. शुरुआत में उन्होंने कोलकाता में एक टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की, हालाकि बाद में वह यह नौकरी छोड़कर अपने माता-पिता के पास मुंबई लौट आए. अपने चाचा की मदद से उन्होंने पुणे स्थित प्रभात फिल्म कंपनी में तीन साल के अनुबंध पर नौकरी हासिल की. यहीं से वह कुछ फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आए. उनकी देव आनंद से पहली मुलाकात यहीं हुई. बाद में वह फिर मुंबई लौटे और फिल्म निर्माण एवं अभिनय की शुरुआत की. उन्होंने बतौर निर्देशक पहली फिल्म वर्ष 1951 में बाजी बनाई. इस फिल्म में देवानंद मुख्य भूमिका में थे. इसके बाद फिर उन्होंने देव आनंद के साथ जाल फिल्म बनाई.


गुरुदत्त ने प्यासा, कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम और चौदहवीं का चाद जैसी कई यादगार फिल्मों का निर्माण किया. इसी दौरान अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ उनकी जोड़ी काफी चर्चित रही. पर्दे के पीछे इन दोनों के रूमानी रिश्ते की भी चर्चा रही.


10 अक्तूबर, 1964 को उनका निधन हुआ, उस समय उनकी उम्र महज 39 साल थी. उनकी मौत को लेकर रहस्य है. कुछ लोग इसे खुदकुशी करार देते हैं. उनकी आखिरी फिल्म सांझ और सवेरा रही. टाइम पत्रिका ने प्यासा और कागज के फूल को 100 सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार किया. सीएनएन ने उन्हें एशिया के 25 सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में शामिल किया.


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