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कश्मीर फाईल्स………कश्मीरी पंडितों के दर्द को तीस साल बीत गए, लेकिन हालात अब भी वही हैं।

Durga Dutt
Durga Dutt
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मशहूर सूफी कवि अमीर खुसरो ने खूबसूरत शब्दों के साथ कश्मीर के बारे में कहा कि “गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त” (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं) कश्मीर जिसको जमीन की जन्नत कहा जाता है, उस का नाम कश्यप ऋषि के नाम पर रखा गया था। जम्मू का नाम वहां के राजा जम्बू लोचन के नाम पर रखा गया था और कश्मीर का नाम सतीसर अर्थात् कछुओं की झील से पड़ा था। 12वीं शताब्दी में कश्मीर पूर्ण हिन्दू राज्य रहा था, उसके बाद अलग-अलग धर्मों के शासक वहां पर आते गए। कश्मीर में तीसरी शताब्दी में अशोक का शासन रहा था, और वहां बोद्ध धर्म ने भी अपनी जड़ें फैलाई।
कश्मीर के 48वें सम्राठ अशोक थे, इनको धर्माशोक के नाम से भी परिचय प्राप्त था, कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अंतर्गत इसका वर्णन मिलता है। अशोक के आगमन के साथ ही तीसरी शताब्दी में ही बौद्ध धर्म का आगमन भी कश्मीर में हुआ। छठी शताब्दी में उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के अधीन फिर से हिन्दू धर्म की वापसी हुई। यहां मुस्लिम शासन का आरंभ चौदहवीं शताब्दी में हुआ और उसी काल में फारस से सूफी इस्लाम का भी आगमन हुआ था। जम्मू- कश्मीर को एशिया का स्विटजरलैंड और नेचर- शो विंडो भी कहा जाता है। अपनी कला, संस्कृति और साधना की पहचान लिए भारत की भूमि कश्मीर, जो बाद में चलकर आतंक का पर्याय बन गयी।
इस कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को अपना घर बार छोड़कर बेघर होना पड़ा। उनके दर्द को पहली बार पर्दे पर देखा। लाखों की तादाद में कश्मीरी पंडित सड़कों पर मौत का झेल रहे थे, जो भी कश्मीरी पंडित मिलता था उस पर लोग अपना कहर बरपा रहे थे। अंत में तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन ने सेना बुलाई, जिसके बाद सेना कश्मीरी पंडितों के बचाव में आई। ना कोई पुलिसवाला, ना नेता और ना ही सिविल सोसाइटी के लोग। लाखों की तादाद में पीड़ित कश्मीरी हिंदू समुदाय के लोग जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य शहरों में काफी दयनीय स्थिति में जीने लगे, लेकिन किसी सिविल सोसाइटी ने उनकी पीड़ा पर कुछ नहीं किया।
तत्कालीन केंद्र सरकार ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन या उनके साथ हुई बर्बरता पर कुछ नहीं किया। भारत के इतिहास का सबसे काला दिन 19 जनवरी 1990 का, जिसमें कश्मीरी पंडितों को अपने ही घर यानी जम्मू-कश्मीर से बेदखल कर दिया। इस जख्म के 30 साल बीत गए। इस बीच कितनी ही सरकारें बदलीं, कितने मौसम आए और चले भी गए। यही नहीं पीढ़ियां तक बदल चुकी हैं। लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी और न्याय के लिए लड़ाई अभी भी जारी है। 19 जनवरी 1990 को जो हुआ यह कहानी किसी से छिपी नहीं है। दर्द की दास्तां बताते कश्मीरी पंडितों को दर दर की ठोकरें खाते हुए तीस साल बीत गए, लेकिन इस पीड़ित समुदाय का दर्द अब तक कम नहीं हो सका।
ड‍िस्क्‍लेमर: उपरोक्त व‍िचारों के ल‍िए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम क‍िसी भी दावे तथ्य या आंकड़े की पुष्‍ट‍ि नहीं करता है।

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