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संयुक्त परिवार की अवधारणा

Durga Dutt

Durga Dutt

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हिंदू सनातन धर्म ‘संयुक्त परिवार’ को श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान मानता है। धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो घर संयुक्त परिवार का पोषक नहीं है उसकी शांति और समृद्धि सिर्फ एक भ्रम है। आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं और उनकी जगह एकल परिवार लेते जा रहे हैं, लेकिन बदलती जीवनशैली और प्रतिस्पर्धा के दौर में तनाव तथा अन्य मानसिक समस्याओं से निपटने में अपनों का साथ अहम भूमिका निभा सकता है, यह बात कई शोध कार्यक्रमों में सिद्ध की जा चुकी है।
संयुक्त परिवारों में आसपास काफी लोगों की मौजूदगी एक सहारे का काम करती है। संयुक्त परिवार की रक्षा होती है सम्मान, संयम और सहयोग से। संयुक्त परिवार से संयुक्त उर्जा का जन्म होता है और संयुक्त उर्जा दुखों को खत्म करती है, ग्रंथियों को खोलती है। इसके विपरीत कलह से कुल का नाश होता है। संयुक्त हिंदू परिवार का आधार है- कुल, कुल की परंपरा, कुल देवता, कुल देवी, कुल धर्म और कुल स्थान। वर्तमान में हिन्दू परिवार में ‘अहंकार और ईर्ष्या’ का स्तर बढ़ गया है जिससे परिवारों का निरंतर पतन स्वाभाविक ही है। अब ज्यादातर परिवार एकल परिवार हो गए हैं अथवा इस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले हिन्दुओं में एक कुटुंब व्यवस्था थी, परन्तु ईर्ष्या और पश्चमी सभ्यता की सेंध के कारण हिन्दुओं का ध्यान न्यूक्लियर फेमिली की ओर हो गया है, जोकि अनुचित है। संयुक्त परिवार में ही बच्चे का ठीक-ठीक मानसिक विकास होता है। एकल परिवार में बच्चे के मस्तिष्क की संरचना अलग होती है, जो कई बार सामाजिक तालमेल में अक्षम सिद्ध होती है।
इसी क्रम में चर्चा करने पर हमें पता चलता है कि शास्त्र अनुसार स्त्री परिवार और धर्म का केंद्र बिंदु है इसीलिए स्त्री को अपने धर्म का पालन करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि स्त्री को पति और घर के बुजुर्ग की बातों का सम्मान और पालन करना चाहिए। पति से विरोध नहीं बल्कि अनुरोध करना चाहिए। पति को भी पत्नी को आदेश नहीं देना चाहिए बल्कि उससे अनुरोध करना चाहिए। संयुक्त परिवार का केंद्र है स्त्री और धर्म। जहां इनका सम्मान होता है वहां रोग और शोक नहीं होते। किसी विचार पर मतभेद होने पर भी संयमित रहकर पति का ही साथ देना चाहिए या पति से इस पर एकांत में चर्चा करना चाहिए। स्त्री, पुरुष दोनों को अपना चरित्र उत्तम बनाए रखना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि जब पति-पत्नी में आपसी कटुता या मतभेद न हो तो गृहस्थी धर्म, अर्थ व काम से सुख-समृद्ध हो जाती है।
संयुक्त परिवार में पिता के माता–पिता को दादी और दादा कहते हैं। पिता के छोटे भाई को काका (चाचा), बड़े भाई को ताऊ कहते हैं। पिता की बहन को बुआ कहते हैं। काका की पत्नी को काकी, बेटी को बहिन और बेटे को भाई कहते हैं। ताऊ की पत्नी को ताई, बेटी को बहिन और बेटे को भाई कहते हैं। इसी तरह मझौले काका की पत्नी को काकी, बेटी को बहिन और बेटे को भाई कहते हैं। संयुक्त परिवार में जहां बच्चों का लालन-पालन और मानसिक विकास अच्छे से होता है वहीं वृद्धजन का अंतिम समय भी शांति और खुशी से गुजरता है। वह अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं। हमारे बच्चे संयुक्त परिवार में दादा-दादी, काका-काकी, बुआ आदि के प्यार की छांव में खेलते-कूदते और संस्कारों को सीखते हुए बड़े हो।
संयुक्त परिवार से ही संस्कारों का जन्म होता है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, जिसमें सबसे बड़ा कारण है गृह कलह, सास-बहु, पति-पत्नी के झगड़े, गरीबी और आत्मकेंद्रित महत्वकांक्षा। इस सबके चलते जहां एकल परिवार बनते जा रहे हैं वहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आ रहा है- तलाक। इसका हल निकालने में ‘धर्म’ महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है, क्योंकि दो इंसानों की सोच एक नहीं हो सकती है इस सोच को एक करने के लिए किसी माध्यम की भूमिका की जरूरत होती है और वह निश्चित रूप से धर्म ही है। धर्म को समझने वाले में विनम्रता आती है तथा स्त्री का सम्मान बढ़ता है। धर्म को जानने वाला जहां सभी के विचारों का सम्मान करना जानता है वहीं वह अपने रूठों को मनाना भी जान जाता है। धर्म से जुड़े रहने से संयुक्त परिवार में प्रेम पनपता है। धर्म से जुड़े रहना का तरीका है- एक ही ईष्ट बनाकर नित्य प्रतिदिन ‘संध्यावदन’ करना। सत्संग से धर्म को जानना। ऐसे परिवार में पति रुठा तो भाभी ने मनाया, पत्नी रूठी तो ननद ने प्यार से समझा दिया। ज्यादा हुआ तो सभी ने मिल बैठ कर बीच का रास्ता निकाल लिया।
 डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है। 

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