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जय निठ्ल्ले

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बैठे थे दो आज निठ्ल्ले,
खा रहे थे भुने छ्ल्ले,
सोच रहे थे जुमले-वूमले,
नाच रहे थे बल्ले-बल्ले।

पडे‌ थे रात में थल्ले-थल्ले,
सूत रहे थे मुफ्त के भल्ले,
खुशी से हो रहे पिल्ले-पिल्ले,
हवा से कर रहे लव रिले-डिले।

बना रहे थे हवाई किले,
झूम रहे थे हल्ले-हल्ले,
गरज रहे थे-भोले-भोले,
नाच रहे थे जय-बम भोले।
जय सुफी बाबा गुलछर्रे,
बने रहेंगे तेरे चेले निठल्ले।

डिस्कलेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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