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कोरोना काल (अवसाद की पीड़ा या अवसर का आनंद)

CHINTAN JAROORI HAI

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आजकल चल रहे कोरोना काल में अत्यधिक लोग व्यथित हैं कि बुरा समय चल रहा है। अगर गहन मंथन किया जाय तो ये बहुत कुछ सीख लेने का एवं कुछ नया सृजनात्मक कर दिखाने का समय है। पृकृति का ही उदाहरण लें तो पर्यावरण में कितना सुधार हो गया है प्रदूषण लगभग खत्म होने के कगार पर है ,नदीयां पुनर्जीवित होने लगी है ऐसा लगता है जैसे इस धारा ने नया जीवन पा लिया हो।

बड़ी बहुद्देशीय कंपनियों ने जाना है कि अब उन्हें बड़े शहरों में आफिस लेकर लाखों रुपये बर्बाद न कर वर्क फ्रॉम होम के द्वारा ही काम चलाया जा सकता है। इससे कर्मचारी अपने पैतृक स्थान पर रहकर अपने माता पिता की सेवा के साथ अपना कार्य सम्पन्न कर सकते हैं इससे पलायन की समस्या का भी निदान हो सकता है।

इस काल मे समाज मे एक और सकारात्मक परिवर्तन आया है वे अब ज्यादा अपने शरीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हुए हैं तथा उनका ध्यान व्यायाम एवं प्रतिरोधक क्षमता बनाये रखने वाले भोजन की ऒर गया है ।बच्चों में भी इस जागरूकता के द्वारा जंक फूड सेवन में कमी आई है ।

परिणामस्वरूप बीमारियों में अचानक बड़ी गिरावट आई है। लोगों के अपने पैतृक गांव लौटने से फिर बंज़र खेत लहलहाने लगें हैं। पैतृक घर लौटने से फिर एकल परिवार की कुप्रथा को तोडते हुए संयुक्त परिवार के चलन का प्रादुर्भाव हुआ है। अंत मे अपनी कविता के साथ इस बात पर बल देना चाहूँगा की यह कोरोनकाल एक नए युग, नई शुरुआत का आह्वान है

 

अवसाद में अवसर होगा (कविता)

स्याह काली रात हो
तूफां भरी बरसात हो
जीवों का क्रंदन भी हो
धरा में कंपन भी हो
पथिक तू डिगना नहीं
धीर तू धरना वहीं
भोर का मंजर होगा

अवसाद में अवसर होगा
……….

उलाहनों के डेरे में
आलोचना के घेरे में
पडने लगें जो तुझ पर
थामना तू एक एक कर
उनमें तेरी याद का
भविष्य की बुनियाद का
हर नया प्रस्तर होगा
अवसाद में अवसर होगा

……………….
छोड़ ऊँचे आसमां को
लौट फिर अपने निशाँ को
तेरा इंतज़ार करती
लहलहायेगी वो धरती
शून्य की बिसात में
एक नई शुरुआत में
हारने के डर होगा
अवसाद में अवसर होगा

दीपक पांडेय
Jnv नैनीताल 263135

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पु​ष्टि नहीं करता है।

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