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रामधारी सिंह दिनकर: मैं भारत के रेशमी नगर में रहता हूं

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‘‘मैं भारत के रेशमी नगर में रहता हूँ.

जनता तो चट्टानों का बोझ सहा करती

मैं चांदनियों का बोझ किसी विध सहता हूँ.

गन्दगी, गरीबी, मैलेपन को दूर रखो

शुद्धोदन के पहरेवाले चिल्लाते हैं,

है कपिलवस्तु पर फूलों का श्रृंगार पड़ा

रथ-सामरूढ़ सिद्धार्थ घूमने जाते हैं”.

यह भाव महान लेखक रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) का है. दिनकर ने अपने अनुभवों की व्यापकता और गहनता के जरिए भारत-भाग्य विधाताओं के खोखले जीवन की अन्तरंग झांकी, शासकीय दांव-पेंच, जनता के प्रति हृदयीन उपेक्षाभाव, जीवन की कंगाली और त्रास को बड़ी खूबसूरती के साथ अपने लेखन में उकेरा है.


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दिनकर के काव्य के उतार-चढ़ाव के प्रत्येक चरण को उनके जीवन के विकास-क्रम, या कहें घटना-क्रम के साथ जोड़ा जा सकता है. 23 सितंबर, 1908 ई. को सिमरिया के बेगुसराय (बिहार) में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में रामधारी सिंह दिनकर का बचपन खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बगीचों में गुजरा.


दिनकर की आरंभिक शिक्षा गांव में ही प्राथमिक विद्यालय से हुई. यहीं से इनके मनोमस्तिष्क में राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा था. उन्होंने मैट्रिक के बाद पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बी. ए. ऑनर्स किया. विद्यार्थी के रूप में दिनकर की इतिहास, राजनीति और दर्शन पर अच्छी पकड़ थी जो उनके लेखन में साफ झलकता है. दिनकर ने संस्कृत, मराठी, बंगाली, उर्दू और इंग्लिश साहित्य को पढ़ा है.


पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. ऑनर्स की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दिनकर ने पहले सब-रजिस्ट्रार के पद पर और फिर प्रचार विभाग के उप-निदेशक के रूप में कुछ वर्षों तक सरकारी नौकरी की. वह लगभग नौ वर्षों तक वह इस पद पर रहे. इसके बाद दिनकर की नियुक्ति मुजफ्फरपुर के लंगट सिह कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में हुई. बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और इसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने. दिनकर के साहित्यिक जीवन की विशेषता यह थी कि शासकीय सेवा में रहकर भी वे निरंतर स्वच्छंद रूप से साहित्य सृजन करते रहे.


रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) को राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, क्रांतिपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताओं के कारण असीम लोकप्रियता मिली. उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ नाम से विभूषित किया गया. दिनकर पारंपरिक रीति से जुड़े हुए एक ऐसे लेखक थे जिनकी राष्ट्रीयता चेतना, सांस्कृतिक दृष्टि, वाणी का ओज सबकुछ भारतीय था.


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