Menu
blogid : 3738 postid : 840861

….और वो अपने किराये के पैसे उस बूढ़ी भिखारिन को देने लगे

Special Days

  • 1021 Posts
  • 2135 Comments

आज के ही दिन भारत की पावन भूमि पर विवध गुणों से सम्पन्न एक बालक का जन्म हुआ जिसके जन्म की तारीख़ का तो लोगों को ज्ञान है, लेकिन उसके शहादत के तरीके का नहीं. इस विडंबना पर जहाँ हर युवा सरकार की ओर नज़रें गड़ाये हुए है, वहीं उनको धीरज बँधाने के लिए उनकी जीवन की कुछ प्रेरणादायी लघु-कहानियों का संकलन किया गया है.



sc



अन्याय का विरोधी

सुभाष का जन्म कटक नगर में 23 जनवरी को हुआ था. पांच वर्ष का होने पर उनका नामांकन ‘प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल‘ में करवाया गया. वहाँ अंग्रेज़ों के बच्चे उनके सहपाठी थे. वे अपने भारतीय सहपाठियों को नीची नज़रों से देखते, उन्हें गालियाँ देते और बेवजह झगड़ा करने को तैयार रहते थे.


एक दिन मध्यावकाश में अंग्रेज़ बच्चे मैदान में खेल रहे थे. कई भारतीय विद्यार्थी थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे बैठे थे. सुभाष ने उनसे पूछा, ’क्या तुम्हें खेलना पसंद नहीं?’ उन्होंने कहा, ‘पसंद तो बहुत है, परंतु वे हमें मैदान में नहीं आने देते.’ यह सुनकर सुभाष ने कहा, ‘क्यों, क्या ईश्वर ने तुम्हें हाथ नहीं दिए हैं?’ क्या तुम गोबर-मिट्टी के बने हो? निकालो गेंद.’


बच्चे पहले तो कुछ झिझके, परंतु जब सुभाष ने गेंद उछाली तब सारे दौड़ पड़े. अंग्रेज़ बच्चे ने उन्हें रोकने का भरपूर प्रयास किया. बात न बनने पर वो झगड़ने लगे. दोनों दलों में घमासान झगड़ा हुआ. भारतीय बच्चे अंग्रेजों के बच्चों पर भारी पड़े. शिक्षकों को ख़बर मिलते ही वो मैदान की ओर दौड़ पड़े. उनके साथ प्राचार्य भी वहाँ पहुँचे. प्राचार्य ने बच्चों को समझा-बुझा कर मामाला शांत कराया.


लेकिन अंग्रेज़ के बच्चे अपने को अपमानित महसूस कर रहे थे. अपनी बेइज्ज़ती का बदला लेने के लिए कुछ दिनों बाद अंग्रेज़ के बच्चों ने योजना बनाकर आक्रमण किया. सुभाष के नेतृत्व में भारतीयों ने फिर उनकी खूब पिटाई की. प्राचार्य ने उनके पिता जानकीनाथ बोस को चिट्ठी लिखी-‘उनका पुत्र पढ़ाई में उत्तम है, परंतु वह गुट बनाकर मारपीट करता है, उसे समझाइये.’


पिताजी ने सुभाष को बुलाकर उनसे सारी बातें पूछी.  पूरी घटना सुनाने के बाद सुभाष ने जैसे निष्कर्ष देते हुए कहा, ‘आप भी प्राचार्य को चिट्ठी लिखें कि वो अंग्रेज़ी बच्चों को समझाएँ. यदि वे गालियाँ देंगे और मारेंगे तो हम भी उनके साथ ऐसा ही करेंगे.’



Read: गुमनामी बाबा ही थे सुभाष चन्द्र बोस?




सेवाभाव-

बड़े होने पर सुभाष का दाखिला कलकत्ता के प्रेसिडेन्सी कालेज में हुआ. वहाँ वह कलकत्ता के ‘नव विवेकानंद समूह’ के सदस्य बन गये. विवाह न करने की तथा दीन-दुखियों की सेवा करने की उन्होंने शपथ ली थी. आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक सेवा को प्रत्यक्ष में लाने हेतु वह प्रयोग करने लगे. तभी उनके जीवन में एक अहम घटना हुई. उनके निवास-स्थान के सामने सफेद बालों वाली एक वृद्ध भिखारिन बैठती थी जिसके चेहरे पर झुर्रियाँ थी. वह चिथड़े पहनती थी. सुभाष ने मन में कुछ निश्चय किया.



Read: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती विशेष



प्रेसिडेन्सी कॉलेज तीन मील दूर था जहाँ जाने के लिए सुभाष को ट्राम लेना पड़ता था. उन्होंने कॉलेज पैदल जाना शुरू किया और हर दिन ट्राम के किराये के पैसे वह उस बूढ़ी भिखारिन को देने लगे. पिताजी को जब यह ज्ञात हुआ तब उन्होंने अपना माथा ठोंक लिया. ‘नव विवेकानंद समूह’ के सदस्यों ने आठ दिनों का शिविर रखा. सब ने भगवा कपड़े पहने और झोली हाथ में लेकर धन-धान्य जुटाया. इस शिविर में चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे छात्र भी थे. उनमें से केशव बलिराम हेडगेवार के साथ सुभाष का विशेष स्नेह संबंध बना. सुभाष और केशव हेडगेवार को अनेक बार बाढ़, हैज़ा, अकाल जैसी विपत्तियों से लड़ते-लड़ते देश की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हुआ.


सुभाष की सरिता रूपी जीवन-गाथा की कुछ धारओं के अनुसार भी अगर भारतीय बहें तो भारतीय समाज की दयनीय स्थिति से आसानी से निपटा जा सकता है. लेकिन दुर्भाग्य! आज तक उन्हें प्रेरणा-स्रोत मानने वालों को यह भी पता नहीं चल पाया है कि उनकी मौत कैसे हुई! Next….











Read more:

क्या हवाई दुर्घटना से बच गए थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस?

Netaji Subhash Chandra Bose Biography in Hindi

गर गांधी जी चाहते तो…..







Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *