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केवल 5 रुपये मासिक आमदनी कमाने वाला यह व्यक्ति कैसे बना भारत का प्रतिष्ठित वैज्ञानिक

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भारत की खान में ऐसे कई हीरे हैं जिनकी चमक अमूल्य है. सी. वी. रमन, जगदीश चंद्रबोस, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर और भी अनेक. इन सभी ने अपने क्षेत्र में ऐसा चमत्कार कर दिखाया जिससे भारत का नाम दुनिया भर में गर्व से लिया गया. इन सभी हीरों में से एक हीरा है ‘श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर’.


Srinivasa Ramanujan



आधुनिक काल के महानतम गणित विचारक श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को भारत के दक्षिणी भूभाग में स्थित कोयंबटूर के ईरोड नामक गांव में हुआ था. कहा जाता है कि रामानुजन् को उस जमाने में गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला था लेकिन फिर भी उन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में काफी अहम योगदान दिया.


आज उनके 128वें जन्मदिन पर पूरे भारत वर्ष में उनका जन्मदिवस ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है. रामानुजन् के जीवन व उनके संघर्ष से जुड़ी ऐसी कई बातें हैं जो काफी कम लोग जानते हैं. तो आईये एक झलक डालते हैं विद्वानी श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर के जीवन पर:


श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था. कहा जाता है कि रामानुजन् तीन वर्ष के हो गए थे लेकिन फिर भी बोलना नहीं सीख पाए थे जिसके कारण उनके परिवार वाले चिंतित थे. उन्हें लगता था कि रामानुजन् गूंगे हैं.


बेहद प्रतिभावशाली रामानुजन् को जब उनके माता-पिता ने स्कूल में भर्ती कराया तो उनका पढ़ाई में मन नहीं लगाता था लेकिन दस वर्ष की आयु में वे प्राइमरी परीक्षा अपने पूरे जिले में सबसे अधिक अंक लेकर पास हुए थे.


ramanujan ticket


रामानुजन् के बारे में एक बात यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने कभी गणित किसी से सीखा नहीं था बल्कि स्वयं ही वे गणित में इतने विद्वानी बने थे. उनका दिमाग इतना तेज़ था कि उन्होंने स्कूल के समय में ही कॉलेज के स्तर के गणित को पढ़ लिया था.


एक समय पर रामानुजन् की गणित में अत्यंत रुचि उन्हें काफी भारी पड़ी थी. यह उनके स्कूल के दिनों की बात है जब वे ग्यारहवीं कक्षा में गणित को छोड़कर बाकी सभी विषयों में फेल हो थे. क्या कोई सोच सकता है कि पढ़ाई में इतना कुशल इंसान भी फेल हो सकता है? लेकिन सच यही है जिसके चलते उन्हें बाद में बारहवीं कक्षा की पढ़ाई प्राइवेट परीक्षा से करनी पड़ी थी.


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रामानुजन् काफी गरीब परिवार के थे जिसके चलते उन्होंने घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए बच्चों को गणित के ट्यूशन देना शुरू किया और साथ ही कुछ लोगों के बही-खाते संभाल कर रोजी-रोटी कमाई.


यह बात जानकर आपको बेहद हैरानी होगी कि उस समय रामानुजन् को ट्यूशन से कुल पांच रूपये मासिक मिलते थे जिसमें से जैसे-तैसे वे अपना गुजारा करते थे.



Ramanujan Srinivasa



घर में बुरे आर्थिक स्थिति से अभी रामानुजन् गुजर ही रहे थे कि उनके पिता ने 1908 में उनका जानकी नाम की कन्या से विवाह कर दिया. विवाह के बाद दोहरी जिम्मेदारी के चलते रामानुजन् नौकरी ढूंढने के लिए मद्रास चले गए लेकिन बाहरवीं कक्षा पास ना होने की वजह से नौकरी मिलना काफी मुश्किल हो गया.


रामानुजन् के नौकरी ढूंढने से जुड़ी एक रोचक बात है कि वे जब भी नौकरी खोजने के लिए किसी से मिलते थे तो उन्हें अपना एक रजिस्टर दिखाते थे. इस रजिस्टर में उनके द्वारा किये गए गणित के शोध थे. लेकिन लोग इसे अकसर नजराअंदाज कर देते.


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रामानुजन् ने अपनी पहली नौकरी मद्रास के एक डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर के पास नौकरी की थी. उनकी इस नौकरी से उन्हें 25 रुपये मासिक मिलते थे.


रामानुजन् अपनी कलर्क की नौकरी के साथ-साथ रात में गणित पर शोध कार्य भी किया करते थे. कहते हैं कि वे गणित के सूत्रों को पहले स्लेट पर लिखते थे और फिर बाद में उसे एक रजिस्टर पर उतारते थे. रात को रामानुजन के स्लेट और खड़िए की आवाज के अक्सर उनके परिवार वालों की नींद खराब होती थी.



Ramanujan Hardy



रामानुजन् के परिश्रम को प्रोफेसर हार्डी द्वारा भी सराहा गया जिसके चलते रामानुजन् को कैंब्रिज को विदेश आने का आमंत्रण दिया. कहा जाता है कि आर्थिक तंगी के कारण स्वयं प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन् को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता दी थी.


रामानुजन् के गणित में किये कार्यों की वजह से ही उन्हें विदेश में रॉयल सोसाइटी की सदस्यता हासिल हुई थी. इसके साथ ही वे ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने.


रामानुजन् के जीवनकाल का सबसे बड़ा संघर्ष था उनकी सेहत. 1917 में इंग्लैण्ड में उनकी सेहत में परिवर्तन आना शुरू हो गया था. तेज़ बुखार, बदन में दर्द, खांसी, थकान और अचानक से पतले होने जैसे चिन्ह यह बता रहे थे कि रामानुजन् की हालत काफी गंभीर है.



Srinivasa Ramanujam



इंग्लैण्ड की उस ठंड में उनकी सेहत और भी बिगड़ती गई और आखिरकार वे वर्ष 1919 में भारत वापस लौट आए. लेकिन यहां आकर भी उनकी हालत में कोई सुधार ना आया और 26 अप्रैल, 1920 को मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर ने अपनी आखिरी सांस ली.


श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर का अचानक से हुआ देहांत पूरे गणित संसार और भारत के लिए काफी दुखद था. 3,884 प्रमेयों का संकलन करने वाले रामानुजन् को आज भी भारत में काफी गर्व से याद किया जाता है. Next…..


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