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दरख्‍त

Darakth

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ये दृश्य देख कर कैसा लगता है आपको कहीं आक्सीजन न मिलने पर मौत हो रही है तो काही पेट भर खाना न  मिलने पर  इस दशा में हम क्या कर रहें हैं और क्या कर रहे थे , जब कोरोना कि पहली मार से देश बाहर निकल रहा था। आज सरकार या लोगों को इसका ज़िम्मेदार ठहराना गलत ही होगा क्यूँ कि हम सब बराबर के गुनहगार हैं!  बस किसी कि गलती काम है तो  किसी कि ज्यादा लेकिन आज सभी इसका इल्जाम  भुगत रहे हैं ।

 

*हम क्या कर रहे है और क्या कर रहे थें *

जब मौत अपनी छूरियाँ तेज करने गई थी
हम बेहोश थे और जाने कब
उधार का व्यक्त निकल गया ,
अब साँसों की कीमत दे कर भी जान नहीं बच रही है
जिन मंदिर मस्जिदों के भरोसे हम बैठे थे
वो आज कुछ नहीं कर रहे
बस बन गए है मुर्दा पत्थर ,

सियासत अपनी रोटियाँ सेक रही है,
लाशें ,काशें ,आहें सब खूब फल फूल रहे हैं
एक ज़हर है जिसे हर साँस मे हम ले रहे हैं
सवाल उठान , परिस्थितियों से लड़ना मौत को बुलाना है
और कुछ ना करना तो बिना लड़े मार जाना है

अपने कंधे अपने पैर अपना बोझ उठान
लड़ना खुद भी और लोगों को मौत कि नीद से बचाना
हमे कोई फरिश्ता बचाने नहीं आ रहा
हमें अब इस दलदल से खुद निकाना है
और सोचना है कि हम क्या कर रहे हैं और क्या कर रहें थें
– दरख्त (स्वामी )

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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