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मूलनिवासियों की थ्योरी को झटका

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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कई सालों से मूलनिवासी और आर्यन थ्योरी गढ़कर जो लोग अपनी इतिहास और राजनीति की दुकान चला रहे थे। अब हरियाणा के हिसार जिले के राखीगढ़ी में मिले कंकालों पर किये गये डीएनए शोध से आर्यों के आक्रमणकारी होने की थ्योरी मनगढ़ंत साबित हुई। 2015 में राखीगढ़ी सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में मिले कंकालों के डीएनए सैंपल की जांच पूरी गई है। पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविदों के अनुसार कंकालों के डीएनए मध्य एशियन लोगों के जीन से नहीं मिलते हैं। असल में साल 2015 में राखीगढ़ी में हजारों साल पुराने कुछ कंकाल मिले थे। पुरातत्ववेत्ता वसंत शिंदे की अगुवाई में इन कंकालों पर किए गए अध्ययन की शुरूआत में कहा गया कि ये कंकाल ईरानी सभ्यता से काफी मिलते जुलते हैं। लेकिन, हाल में प्रकाशित हुए शोध से पता चलता है कि दक्षिण एशिया में खेती किसानी का जो काम शुरू हुआ था वो यहां के स्थानीय लोगों द्वारा शुरू हुआ था न कि पश्चिम से लोग यहां आए थे।

 

इस शोध में सामने आया है कि 9000 साल पहले भारत के लोगों ने ही कृषि की शुरुआत की थी। इसके बाद ये ईरान व इराक होते हुए पूरी दुनिया में पहुंची। भारत के विकास में यहीं के लोगों का योगदान है। कृषि से लेकर विज्ञान तक, यहां पर समय समय पर विकास होता रहा है। इस अध्ययन को पूरा करने में 3 साल का समय लगा है। अध्ययन करने वाली टीम में भारत के पुरातत्वविद और हारवर्ड मेडिकल स्कूल के डीएनए एक्सपर्ट शामिल हैं। इस टीम ने साइंटिफिक जनरल (सेल अंडर द टाइटल) नाम से रिपोर्ट प्रकाशित की है। राखीगढ़ी में खुदाई करनेवाले पुरातत्वविदों के अनुसार, युगल कंकाल का मुंह, हाथ और पैर सभी एक समान हैं। इससे साफ है कि दोनों को जवानी में एक साथ दफनाया गया था। बता दें के ये निष्कर्ष हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, एसीबी जर्नल ऑफ अनैटमी और सेल बायॉलजी में प्रकाशित किए गए थे।

 

निष्कर्ष में आगे कहा कि कंकाल, जिनकी उम्र 21 से 35 वर्ष के बीच आंकी गई थी, को विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला में ले जाया गया था। जहांं जांंच कंकाल में किसी तरह के आघात या घाव के कोई सबूत नहीं मिले हैं। इस अध्ययन ने साबित किया कि आर्यन आक्रमण सिद्धांत त्रुटिपूर्ण और भ्रामक था और वैदिक युग का ज्ञान और संस्कृति का विकास स्वदेशी लोगों के माध्यम से हुआ था। 5000 साल पुराने कंकालों के अध्ययन के बाद जारी की गई रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि हड़प्पा सभ्यता में हवन और सरस्वती पूजा होती थी। ऐसे में जाहिर आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी ही गलत साबित होती है। वैसे पहले भी कई इतिहासकारों का कहना था कि वामपंथियों की आर्यन थ्योरी मनगढंत कल्पना पर आधारित है। जिसकी परतें इस नए शोध से उघड़ती नजर आ रही हैं।

 

क्योंकि इस रिपोर्ट में तीन बिंदुओं को मुख्य रूप से दर्शाया गया है। पहला, प्राप्त कंकाल उन लोगों से ताल्लुक रखता था, जो दक्षिण एशियाई लोगों का हिस्सा थे। दूसरा, 12 हजार साल से एशिया का एक ही जीन रहा है। तीसरा, भारत में खेती करने और पशुपालन करने वाले लोग बाहर से नहीं आए थे, अगर हड़प्पा सभ्यता के बाद आर्यन बाहर से आए होते तो वह जरुर अपनी संस्कृति साथ लाए होते।

 

इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्पष्ट तौर से देखें तो यह अध्ययन मैक्स मूलर, विलियम हंटर और लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले इन तीन लोगों के शोध पर सवाल खड़े होते हैं। इनकी थ्योरी में आर्यों को घुमंतू या कबीलाई बताया जाता है। बताते है यह ऐसे खानाबदोश लोग थे जिनके पास वेद थे, रथ थे, खुद की भाषा थी और उस भाषा की लिपि भी थी। मतलब यह कि आर्य पढ़े-लिखे, सभ्य और सुसंस्कृत खानाबदोश लोग थे। यह दुनिया का सबसे अनोखा बुद्धि का नमूना है कि खानोबदोश लोग पढ़े लिखे थे और नगर सभ्यताओं में रहने वाले लोग अनपढ़ गंवार थे। दूसरी विडम्बना ये भी देखिये कि मैक्स मूलर की थ्योरी को सच मानकर हमारे ही देश के इतिहाकारों ने धीरे धीरे यह प्रचारित करना शुरु किया कि सिंधु लोग द्रविड़ थे और वैदिक लोग आर्य थे। सिंधु सभ्यता आर्यों के आगमन के पहले की है और आर्यों ने आकर इसे नष्ट कर दिया और बच्चों को भी यहींं पढाया जाने लगा।

 

हालांंकि कुछ सालों पहले भी आईआईटी खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनता को लेकर नए तथ्य सामने रखे थे कि यह सभ्यता 5500 साल नहीं बल्कि 8000 साल पुरानी थी। यानि यह सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से भी पहले की है। मिस्र की सभ्यता 7,000 ईसा पूर्व से 3,000 ईसा पूर्व तक रहने के प्रमाण मिलते हैं, जबकि मोसोपोटामिया की सभ्यता 6500 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में थी। जबकि हड़प्पा सभ्यता से 1,0000 वर्ष पूर्व की सभ्यता के प्रमाण भी खोज निकाले हैं। भले इतिहास आर्यों को लेकर कई दावे किए गए लेकिन फिर भी सवाल ज्यों का त्यों रहा कि आर्य बाहर से आए थे या यहीं भारत ही निवासी थे। बेशक इसे लेकर वामपंथियों ने कई दावे किए। अब वामपंथी इतिहासकारों अपना ज्ञान भी अपडेट कर लेना चाहिए और मूलनिवासियों के नाम पर चल रही दुकानों पर ताला जड़ देना चाहिए।

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