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आत्मा ही नहीं दिल भी रोता है जब सरहद पर कोई जवान शहीद होता है

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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धरो कवच आभूषण तजकर, नयनों में अब क्रोध भरों, किस उलझन में पड़े हो राजन, तत्काल कटी कृपाण धरो बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आहवान करो।

दुःख की इस असहनीय घड़ी में प्रश्न भी है कि कब तक हमारे सैनिक इस लाक्षाग्रह में जलते रहेंगे, उठो राजन! अब सहन मत करो, बन अर्जुन इतिहास को पुन: गांडीव की टंकार सुना दो। देश को हिला देने वाले पुलवामा हमले में जिस माँ ने बेटा खोया है उस माँ की छाती जरुर फटी होगी, दुनिया उस बाप की भी उजड़ी होगी, जिसने अपना सहारा खोया है। दर्द के चाबुक पत्नी और उस संतान के तन मन में पड़े होंगे, जिनकी मांग का सिंदूर और जिसके सर से बाप का साया छिना है, आज इनका दर्द देखकर देश के अन्तस् से अथाह पीड़ा और आक्रोश की लहर उठ रही है। आखिर कैसे मजहबी भेडियों ने कश्मीर को कब्रिस्तान बना डाला। वो किस तरह दुश्मन देश से मिलकर देश की संप्रभुता, अखंडता पर चोट कर रहे है। एक कथित मजहबी आजादी का सपना पाले वो लोग बार-बार ललकार रहे है और हम सहिष्णुता और अहिंसा के सिद्दांतों का पालन करते-करते कायरता का आवरण ओढ़कर कश्मीरियत और जमुहुरियत का गाना गा रहे है।

एक तरफ हम लोग विश्व शक्तियों के भारत की साथ तुलना करते नहीं थकते, दूसरी और देखे तो हम इतने कमजोर राष्ट्र बन चुके है कि अपने हितों पर होती चोट पर निंदा से ज्यादा कभी कुछ नहीं कर पाते। बेशक किसी की धार्मिक आस्था पर चोट नहीं करनी चाहिए किन्तु जहाँ धर्म ही न हो अधर्म ही अधर्म दिख रहा हो तो आतंक में आस्था रखने वाले इन जहरीले सांपो के फन क्यों न कुचले जाये? शायद ऐसा न करना तो हमारे किसी धर्म शास्त्र में नहीं लिखा हैं।

पठानकोट के बाद उरी इसके बाद अब पुलवामा देश के सैनिक एक-एक कर भेडियों के चोरी छिपे हमलों का निवाला बन रहे है और हम सर्वशक्ति संपन्न होते हुए भी सिवाय आंसू पोछने, पीड़ा की कविता गाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे है। कम से कम हमें राष्ट्र रक्षा में तो अपने ग्रंथो का ध्यान करना चाहिए कि जब दुश्मन बार-बार अट्टहास करता है जैसे अभिमन्यु वध के उपरांत अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा था तब जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले थे पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। आज भी समय वही मांग दोहरा रहा है गांडीव उठाओं कलयुग के राजन कर दो दुश्मन का विनाश।

आखिर हम कब तक अपनी भारत माता के वीर सपूतों के शवों पर आंसू बहाते रहेंगे। जबकि दुश्मन हर बार हमें घाव देकर चला जाता है। इन 40 जवानों बलिदान से देश के किस नौजवान का खून नहीं खोला होगा। किस माँ की आँखे नम नहीं हुई होगी, 40 घरों के चिराग बुझ गये, आखिर हम कब तक श्रद्धांजलि देते रहेंगे? हर दिन, हर सप्ताह, हर महीना, हर साल हमारे जवान मरते रहते है और राजनेता आरोप प्रत्यारोप लगाकर इस खून सनी जमीन पर मिटटी डालते रहते है। जो लोग आज इन मजहबी भेडियों का साथ दे रहे शुरू उनसे करना चाहिए क्योंकि महाभारत में युद्ध के दौरान कई बार कृष्ण ने अर्जुन से परंपरागत नियमों को तोड़ने के लिए कहा था जिससे धर्म की रक्षा हो सके। जो अधर्म के रास्ते पर चलेगा उसका सर्वनाश निश्चित है, फिर चाहे वह कोई भी व्यक्ति क्यों ना हो। कर्ण गलत नहीं थे सिर्फ उन्होंने गलत का साथ दिया था। इस कारण उन्हें मौत मिली। समझने के लिए यही काफी है। अब केवल अकर्मण्य बने रहने का खतरा देश कब तक उठाता रहेगा।

हमे श्रीलंका जैसे छोटे देश से भी सीखना चाहिए कि किस तरह उन्होंने लिट्ठे जैसे मजबूत आतंकी नेटवर्क के ढांचे को नेस्तनाबूद किया, हमें इजराइल से सीखना चाहिए कि अपने दुश्मनों के बीच रहकर अपना स्वाभिमान कैसे बचाया जाता है। म्यूनिख ओलिंपिक खेलों के दौरान 11 इजराइली एथलीटों को बंधक बनाया और बाद में सबकी हत्या कर दी। बंधकों को छुड़ाने की कोशिश में वेस्ट जर्मनी द्वारा की गई कार्रवाई में 5 आतंकी मारे गए थे। लेकिन इसके बाद बाकी बचे तीन आतंकियों, जिनमें इस साजिश का मास्टरमाइंड भी शामिल था, को वहां की खुफिया एजेंसी मोसाद ने सिर्फ एक महीने के अंदर ही ऑपरेशन ‘रैथ ऑफ गॉड’ चलाकर न सिर्फ खोजा बल्कि मार भी गिराया। इजराइल ने हमले की निंदा नही की थी बस प्रतिकार किया था। जिसकी जरुरत आज हमें भी हैं।

अभी तक जो चल रहा था वह एक राजनितिक गलती हो सकती है। अगर आगे भी यही होगा तो इतिहास इसे सर्वदलीय गलती कहने से गुरेज नहीं करेगा। आज राजनेताओं को समझना होगा धर्मनिरपेक्षता सामाजिक समरसता का विषय हो सकता है किन्तु यदि शत्रु धर्म के सहारे ही हमला करता रहेगा तो कैसी धर्मनिरपेक्षता। यह बात सभी को समझनी चाहिए कि कोई भी देश वीरता के साथ जन्म लेता है और कायरता के साथ मर जाता है, अत्यधिक शांति भी कायरता का रूप होती है। अंत में सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आत्मा ही नहीं दिल भी रोता है जब सरहद पर कोई जवान शहीद होता है।

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