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मोदी का इसरो प्रमुख को गले लगाना तस्वीर ही नहीं है बल्कि एक शिक्षा है

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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मिशन चंद्रयान 2 चंद्रमा की सतह से जब महज लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर था तब उसका सम्पर्क भारत की स्पेस एजेंसी इसरो से टूट गया। करीब ग्यारह वर्ष के रात-दिन की मेहनत, करोड़ों रूपये की लागत और करोड़ों देशवासियों का सपना भी इसी के साथ मानो टूट गया। देश के हजारों वैज्ञानिक कुछ पल को मायूस भी हो गये। मायूसी के इस माहौल में प्रधानमंत्री का बेगलुरु स्थित इसरो के मुख्यालय में इसरो चीफ को गले लगाकर उनकी पीठ थपथापाने वाला पल बेहद भावुक कर देना वाला था।

कुछ लोग भले ही इस तस्वीर को राजनीति से प्रेरित मान रहे हों, लेकिन इसे राजनीति के बजाय एक शिक्षा के तौर पर भी देखा जा सकता है। हम चाहें तो इस तस्वीर को अपने जीवन में उतार सकते हैं। हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी कई बार ऐसे पल आते हैं जब हम खुद को कमजोर महसूस करते हैं। तब हम सोचते है काश कोई हो जो हमें गले से लगाकर कह दे, कुछ नहीं निराश या मायूस मत हो, हौसला मत तोड़ सब कुछ सही होगा। देख मैं खड़ा हूंं ना तेरे साथ।

केवल हम ही क्यों हमारे परिवार समाज में भी अनेकों ऐसी घटनाएंं सामने आती है जब कोई खुद को अकेला महसूस कर कई बार गलत कदम भी उठा लेते है। इसलिए इस तस्वीर को केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि खेल, कला और शिक्षा व्यापार के क्षेत्र में जोड़ कर देख सकते हैं। स्कूल में शिक्षक और परिवार में अभिभावक इससे सीख सकते हैं। क्योंकि जब हमारे देश में कोई एक बच्चा मेहनत करने के बावजूद भी खेल, कला या परीक्षा में कम अंक लाता है तो घर में अभिभावक उसे ताने देते हैं। उसे पड़ोसियों के बच्चों के उदाहरण दिए जाते हैं। यह हमारे देश का एक रिवाज सा बन गया है कि अनेकों मौकों पर हम ही अपने बच्चों का मनोबल तोड़ देते है। एक किस्म से कहे तो एक नासमझी के कारण कई बार बच्चों और युवाओं को शारीरिक और मानसिक यातना के दौर से गुजरना पड़ता है।

चित्र साभार गूगल
चित्र: साभार गूगल

विरले ही कोई माता-पिता या शिक्षक ऐसे होते हैं जो उन पलों में उसे ऐसे गले लगाकर कहते हो कि कोई बात नहीं बेटे तुमने अच्छी मेहनत की आगे और बेहतर करने की कोशिश करना। अभी कुछ दिनों पहले मैं राजस्थान के कोटा शहर की एक खबर पढ़ रहा था कि जनवरी 2019 से मार्च तक यानि तीन महीनों के अन्दर ही वहां के विभिन्न कोचिंग संस्थानों में तैयारी कर रहे 19 छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर चुके हैं।

सभी जानते है कि इंजीनियर और डॉक्टर बनने का रास्ता कोटा होकर जाता है। इसीलिए देश भर से छात्र कोटा में इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश की तैयारी के लिए कोटा पहुंचते है। हर साल लगभग डेढ़ से दो लाख छात्र-छात्राएं कोटा का रुख करते हैं। कोटा शहर के हर चौक-चौराहों पर छात्रों की सफलता के बड़े-बड़े होर्डिंग्स बताते हैं कि कोटा में कोचिंग ही सब कुछ है। यह हकीकत है कि कोटा में सफलता का स्ट्राइक तीस फीसदी से ऊपर रहता है और इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप 10 में से कम से पांच छात्र कोटा के ही रहते हैं। लेकिन कोटा का एक और सच भी है जो बेहद भयावह है। एक बड़ी संख्या उन छात्रों की भी है जो नाकाम हो जाते हैं और उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी असफलता बर्दाश्त नहीं कर पाते।

आंकड़े उठाकर कर देखें तो साल 2018 में 19 छात्र, 2017 में सात छात्र, 2016 में 18 छात्र और 2015 में 31 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया। वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो 2013 की अपेक्षा लगभग 61.3 प्रतिशत ज्यादा थी। इसमें केवल कोटा शहर ही क्यों इसके अलावा भी देश में सीबीएसई या अन्य केन्द्रीय बोर्ड के अलावा राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के दसवीं बारहवींं के नतीजे आने के बाद हर वर्ष देश में शिक्षकों और अभिभावकों की फटकार के कारण न जाने कितने किशोर छात्र-छात्राएं घबराकर, डरकर या अन्य किसी अवसाद के कारण आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं।

देखा जाए तो केवल शिक्षा ही नहीं व्यापार और खेल जगत में भी कई होनहार युवा असफलता के भय और फटकार के कारण आत्महत्या जैसे रास्ते को चुन लेते है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं अभी हाल में सीसीडी के मालिक सिद्धार्थ हेगड़े ने इतने बड़े मुकाम पर पहुंचकर आत्महत्या का रास्ता चुन लिया। मेरा मानना है ऐसे पलों में यदि अपने लोग गले लगाकर उनका होसला बढ़ाएं और प्रेरित करें तो निसंदेह उनकी कार्यशैली में परिणाम अच्छे आयेंगे। शायद लोग इस तस्वीर से प्रेरणा लेंगे और आने वाले समय में इन भावनात्मक पलों का उपयोग अपने परिवार स्कूल और समाज में एक दूसरे को प्रेरित करने के लिए करेंगे।

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