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अब ऐसे होगा श्रीकृष्ण का जन्म!

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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अक्सर भागवत कथा करने वाले पौराणिक लोग जिसे धर्म प्रचार कहते हैं, जब ये योगिराज श्री कृष्ण जी महाराज के बारे में मनघडंत बात कहते है तो सुनने वाले सोचते है, धर्म बरस है। दूसरा इन कथाओं को सुनकर, आम व्यक्ति यह भी सोच बैठता है कि मैं धार्मिक हो रहा हूं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था में वैदिक धर्म के बारे कोई जानकारी नहीं दी जाती है। इस कारण आज लोग अपने महापुरुषों के जीवन चरित्र के विषय में जानकारी के लिए टीवी सीरियलो या तथाकथित बाबाओं के भरोसे है और यह दोनों धन कमाने के लिए अपने महापुरुषों के जीवन चरित्र से खिलवाड़ कर समाज के बड़े हिस्से को दिग्भर्मित कर रहे है।

आप कुछ पल को कान्हा, बाल गोपाल की लीला छोड़ दीजिये। इनकी लीला समझिये, भजन गाते है, “मनिहार का वेश बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया” मतलब इनके अनुसार योगिराज श्री कृष्ण जी महाराज चूड़ियाँ बेच रहे है। इसके अलावा ये लोग श्री कृष्ण को लीलाधर, रसिक, गोपी प्रेमी, कपड़े चोर, माखन चोर और न जाने कथाओं में क्या-क्या लोगों को बता रहे होते है कि उनके 16 हजार गोपियाँ थी, वे सरोवर पर छिपकर कपडे चुराने जाया करते थे।

इसलिए जो लोग आज योगिराज श्री कृष्ण को जानना चाहते है तो पुराणों का चश्मे से कृष्ण को नहीं समझा जा सकता। क्योकि वहां सिवाय रासलीला मक्खन चोरी के आरोपों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। इस्कान के मन्दिरों में नाचने से कृष्ण को नहीं समझा जा सकता। कृष्ण को समझने  के लिए न मीरा के भजनों की जरुरत है न रसखान चौपाइयों की। न सूरदास के दोहों की जरुरत है और न किसी भागवत कथा कहने वाले बाबाओं की। कृष्ण को समझने के लिए बस स्वयं को समझना होता है, उसके लिए अर्जुन बनना पड़ता है।

कृष्ण का यह तर्क है कि जब तक इन्सान के अन्दर स्वयं के अनिष्ट की आशंका है तब तक वह ईश्वर पर अविश्वास पैदा कर रहा है। क्योंकि हानि लाभ, सुख दुःख जीवन की लीला है, एक नाटक है, जिससे हर किसी को गुजरना होता है। इस नाटक में बिना भाग लिए कोई जीवन मंच से नहीं उतर सकता है। इसलिए कृष्ण सदा मुस्काते रहे, वह कभी गंभीर नहीं हुए। वरना अभी तक संसार में जितने लोग आये सब दुखी गंभीर दिखाई दिए। चाहें बुद्ध हो या जीसस, गुरु नानक हो या मोहम्मद। हर कोई चिंता में व्याप्त रहा किन्तु श्री कृष्ण जी दुनिया के एक अकेले ऐसे महापुरुष है जो दुःख में भी मुस्कुराने का साहस करते है, जो मृत्यु को भी हंसकर स्वीकार करने की हिम्मत रखते है।

चित्र साभार गूगल
चित्र साभार गूगल

तभी अर्जुन से कृष्ण कहते है पार्थ जब तू ऐसा समझता है कि कोई मर सकता है, तब तक तू आत्मा पर विश्वास के बजाय शरीर पर विश्वास कर रहा है। क्योंकि तुझे पता ही नहीं है कि जो भीतर है, वह न कभी मरा है, न कभी मर सकता है, अगर तू सोचता है कि मैं किसी को मार सकूँगा, तो तू बड़ी भ्रांति में है, बड़े अज्ञान में है। क्योंकि मारने की धारणा ही शरीरवादी की धारणा है आत्मवादी की नहीं। असल में योगिराज श्री कृष्ण मनुष्य-जाति के इतिहास में एक अकेले महापुरुष हैं, जो जीवन के सब अर्थों को स्वीकार कर लेते है। जो परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते, जो अधर्म के विरुद्ध खड़ा होने और बोलने का साहस रखते है।

किन्तु इसके विपरीत ब्रह्मवैवर्त नामक पुराण में कृष्ण के चरित्र का कलंकित चित्रण किया गया इसके उपरांत विभिन्न मत-मतांतरों के लोगों ने अपने तथाकथित नबियों, काल्पनिक ईश्वर के दूतों को बड़ा दिखाने के लिए इसी पुराण का सहारा लिया। इसके बाद तथाकथित दुराचारी गुरुओं ने धर्म और ईश्वर की आड़ में पंडाल सजा-सजाकर कृष्ण के महान चरित्र को कलंकित किया जो आज भी जारी है। जैसा कुछ समय पहले दिल्ली में एक बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित अपने आश्रम में लड़कियों को निर्वस्त्र कर कहता था मैं कृष्ण हूं और तुम गोपी हो। ऐसे लोगो ने ही कृष्ण का जो असली वीरता का चरित्र था, जो साहस का था। जो ज्ञान का था, जो नीति का था। जिसमें युद्ध की कला थी, जिसमें प्रेम था, करुणा थी, वो सब हटा दिया नकली खड़ा कर दिया।

भला जिनके  स्वयं घर में हजारों गायें हों और घर में दूध-दही व माखन की कोई कमी न हो वो क्यों दूसरे के घर माखन चुराकर खायेगा? क्या बाल लीला करने के लिए सिर्फ यही एक कार्य बचा था। भला जो द्रोपदी की अर्धनग्न देह को ढककर समस्त हस्तिनापुर लताड़ लगाता हो, वो क्यों भला गोपियों को नग्न देखने के लिए कपडे चोरी करेगा? स्वयं सोचिए जिसनें योग की परम ऊंचाई को प्राप्त किया हो, जिस कृष्ण के अन्दर ऐसा अध्यात्म हो जो जीवन की समस्त संभावनाओं को एक साथ स्वीकार कर लेता हो ऐसे योगिराज श्रीकृष्ण की भविष्य के लिए बड़ी सार्थकता है। भविष्य को कृष्ण के सिद्धांतों की आवश्यकता है, इस भारत भूमिको  इस वैदिक संस्कृति को योगिराज श्री कृष्ण आवश्यकता है। क्योंकि जब सबके मूल्य नियम सिद्धांत फीके पड़ जाएँगे सब के सब अँधेरे में डूब जाएँगे और इतिहास की मिटटी उन्हें दबा देगी, तब भी श्री कृष्ण जी का तेज चमकता हुआ रहेगा। बस लोग इस योग्य हो जाये कि कृष्ण को समझ पाए। जिस दिन ऐसा होगा कृष्ण के विचार का जन्म हो जायेगा, अधर्म हार जायेगा और एक पवित्रता और ज्ञान का जन्म होकर धर्म विजयी हो जायेगा पुन: कृष्ण जन्म हो जायेगा।

 

 

 

 

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