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चर्च और नन के बीच बढ़ रही है दूरी!

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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ईसाई धर्म दरबार में सदियों से जीसस को अपना पति स्वीकार कर समर्पित रही नन प्रथा अब धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। उधर लोगों के जीवन स्तर को सुधारने दावा करने वाले चर्च अपने साम्राज्यवाद के विस्तार में व्यस्त है और इधर नन अवहेलना, प्रताड़ना और शोषण की भूमि बनती जा रही है। हाल ही में केरल में एक नन को रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत आने वाली एक धर्मसभा ने सिर्फ इस कारण निष्कासन कर दिया कि नन पर कविता प्रकाशित करने, कार खरीदने और उन्होंने पिछले साल दुष्कर्म के आरोपी पादरी फ्रैंको मुल्लाकल के खिलाफ 5 नन की ओर से वायनाड में आयोजित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।

एक किस्म से देखा जाये तो कुछ समय पहले तक पूर्णतया अद्यात्मिक समझे जाने वाले नन के जीवन से धीरे-धीरे पर्दे उठने शुरू हो चुके है। पिछले कई वर्षों से गिरजाघरों की जिन्दगी से त्रस्त होकर निकली या निकाली गयी अनेकों नन चर्च से अपना मुंह मोड़ रही है। एक लम्बे अरसे से दक्षिण भारतीय राज्यों में खासकर केरल में महिलाओं कैरियर के अवसरों में चर्च को प्रमुखता रही थी लेकिन पिछले कई वर्षों में कॉन्वेंट के अन्दर और बाहर ननो के शोषण के एक के बाद एक मामले सार्वजनिक होने से आज केरल समेत कई दक्षिण भारतीय राज्यों की महिलाएं कान्वेंट और चर्च में जाने से कतराने लगी है।

अभी तक केरल राज्य जो सबसे अधिक संख्या में लडकियों को नन बनने के भेज लिए रहा था। अब हाल फिलहाल इसकी संख्या में 75 फीसदी तक की कमी देखी जा रही है। नन बनने के इस गिरते प्रतिशत को देखते हुए दक्षिण के ईसाई धर्म संस्थान अब उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों की ओर दौड़ रहे है इनमें छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, असम और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से गरीब परिवारों की लडकियों को चर्च में लाया जा रहा है।

1960 के दशक के मध्य से यदि आंकड़ा देखा जाये तो उस समय प्रत्येक राज्य से हर साल लगभग दो दर्जन ननों की भर्ती की जा रही थी और ऐसा लगभग एक दशक तक चला, किन्तु 1985 में यह संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी थी जो अब तेजी से कम होती जा रही है। सिर्फ भारत में ही नहीं यदि देखा जाये तो साठ साल पहले संयुक्त राज्य अमेरिका में 180,000 कैथोलिक नन थीं, लेकिन वर्तमान समय में यह संख्या गिरकर 50,000 से भी कम रह गई है।

60 के दशक में विशेष रूप से गरीब, ईसाई परिवारों के बीच यह प्रथा थी कि गरीब ईसाई माता-पिता से उनकी अपनी एक बेटी को जीसस का आदेश बताकर कॉन्वेंट में शामिल जरुर कराया जाता था। किन्तु आज ज्यादातर ईसाई परिवार इस आदेश को नजरअंदाज कर रहे है। क्योंकि एक तो दिन पर दिन चर्च की चारदीवारी से बाहर ननों के शोषण के किस्से बाहर आये, जैसा कि कई मेरी चांडी और सिस्टर जेष्मी समेत कई पूर्व ननों की किताबों में पढने को मिला। साथ ही दूसरा आज के परिवारों में सिर्फ एक या दो बच्चे हैं, जिनके पास चुनने को कई कैरियर विकल्प हैं। केरल की महिलाएं अब स्वास्थ्य सेवा, आईटी और अन्य उद्योगों में काम करने के लिए दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ रही है। हालत बदल चुके है आज महिलाएं प्राइवेट सेक्टर से लेकर रक्षा, विदेश स्वास्थ हर क्षेत्र में उसके लिए द्वार खुले हुए है जहाँ उस पर कोई ईसाइयत का धार्मिक बोझ भी नहीं है।

चित्र साभार गूगल
चित्र साभार गूगल

यूरोप की एक पूर्व नन सिस्टर फेडेरिका, जो अब एक नन नहीं हैं,  उसने काफी समय तक चर्च में जीवन गुजारा और कॉन्वेंट के जीवन का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने के बाद फेडेरिका ने लिखा कि नन के आपसी समलैंगिक सम्बन्धों को अक्सर धार्मिकता का नाम दिया जाता है। या फिर एक नन बने रहने के लिए पादरियों की वासना को बुझाना पड़ता है। चर्च के अन्दर कोई लोकतंत्र नहीं है, केवल पदानुक्रम और पुरुष वर्चस्व है। आप इसी बात से अनुमान लगा सकते है कि जहाँ एक तरफ कान्वेंट में ननों की संख्या कम हो रही है वही दिलचस्प बात यह है कि पादरी बनने के लिए आगे आने वाले पुरुषों की संख्या बढ़ रही है।

वैश्विक स्तर पर ननों की गिरती संख्या के कई कारण हैं, कुछ समय पहले एक पत्रिका वूमेन चर्च वर्ल्ड ने इस मामले का पर्दाफाश करते हुए सैकड़ों ननों की गर्भपात के लिए मजबूर होने की कहानियों को उजागर किया गया था। पत्रिका ने लिखा था कि जिन ननों में गर्भपात करवाने से मना कर दिया था बाद में उनसे पैदा हुए बच्चों को यह दिखाकर कॉन्वेंट में रख लिया कि वह अनाथ थे। हालाँकि पत्रिका में इस सम्पादकीय लेख के आने के कुछ हफ्तों बाद संपादक को पत्रिका छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया था। जबकि उसी दौरान पोप फ्रांसिस ने स्वीकार किया था कि पादरियों और बिशपों द्वारा ननों का यौन शोषण चर्च में बड़ी समस्या बन चुकी है।

असल में चर्च के लिए सबसे महत्वपूर्ण बलिदानों में से महिलाओं का कुवारापन समझा जाता है। नन खुद को मसीह की पत्नी मानकर प्रतिज्ञा लेती है यानि मानव जीवन साथी लेने के बजाय, वे खुद को जीसस के लिए समर्पित करती हैं। किन्तु पादरी जीसस की इन कथित पत्नियों का शोषण करने से गुरेज नहीं करते है। जो नन अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दे तो ठीक है अगर कोई प्रतिज्ञा नहीं तोडती तो उसे दुर्व्यहार, प्रताड़ना और निष्कासन की सूली पर चढ़ा दिया जाता है।

लेख-राजीव चौधरी 

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