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महाहिंसा का तांडव है यह पर्व

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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विचारवान लोग जहाँ अब पुरे विश्व में अपनी वैदिक संस्कृति का डंका बजा रहे है वहीं हमारे देश में हो रहे कुछ घ्रणित कार्य हमे शर्मिदा करते है। कल एक ऐसी ही खबर पढकर मन फिर द्रवित हो गया। खबर थी- हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले में मनाया जाने वाला माघी त्योहार शुरू हो गया है। दो दिन के भीतर यहां 70 पंचायतों में करीब 50 हजार से ज्यादा बकरे काटे जा चुके हैं। यहां देवी माता को खुश करने के लिए दी गई 50 हजार बकरों की बलि। भला कोई माता किसी दूसरी माँ के बच्चों के खून से खुश हो सकती है? हत्या करना पाप है, इसमे चाहें कोई जीव क्यों न हो। पूरे महीने मनाये जाने वाला यह पारम्परिक त्यौहार पूरे माघ महीने में मनाया जाता है। सोमवार और मंगलवार को मां काली की पूजा की जाती है। उत्तराखंड के जोनसार बाबर की 105 पंचायतों में भी यह त्योहार मनाया जाता है। हर परिवार अपने आंगन में बकरे काटता है। इस त्योहार को कुछ इलाकों में “भातियोज” भी कहा जाता है। किद्वंती के अनुसार वर्षो पहले काली माँ का रथ टूट गया था उसके कोप से बचने के लिए सेंकडो बकरों को काटकर काली माँ को प्रश्न किया जाता है।

वैदिक धर्म में जीव-हिंसा को पाप माना गया है। जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, क्या वह कल्याणकारी हो सकता हैं? इसमें किसी प्रकार भी विश्वास नहीं किया जा सकता। धर्म की रचना ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है। यदि धर्म का उद्देष्य यह न होता तो उसकी इस संसार में आवश्यकता न रहती। विद्वानों का मत है वैदिक रीति में क्षेत्रीय लोक परम्पराओं की धाराएँ जुडती गयी जिसे बाद में पाखंडियों द्वारा इसी संस्कृति का हिस्सा बताया जाने लगा। जैसे वट वृक्ष में असंख्य लताएँ लिपटकर अपना अस्तित्व बना लेती है लेकिन वो लताएँ वृक्ष नहीं होती उसी तरह यह बलि प्रथा व् अन्य कुरुतियाँ मानने वाले लोग हिन्दू हो सकते है पर वैदिक धर्म का हिस्सा नहीं हो सकते। बलि प्रथा का प्रचलन हिन्दुओं के तांत्रिकों के सम्प्रदाय में देखने को मिलती है किन्तु यह परम्परा पाशविक है इसे धार्मिक परम्परा कहना भी धर्म शब्द का अपमान है पशु -बलि करने वाले लोग बहुधा देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिये ही उनके सामने अथवा उनके नाम पर जानवरों और पक्षियों आदि निरीह जीवों का वध किया करते हैं। इस अनुचित कुकर्म देवी- देवता प्रसन्न हों सकते है? ऐसा मानना अन्ध-विश्वास  की पराकाष्टा है। उनकी महिमा को समाप्त करना और हत्यारा सिद्ध करना है।

अपने को हिन्दू कहने और मानने वाले अभी अनेक धर्म ऐसे हैं| जिनमें पशु-बलि की प्रथा समर्थन पाये हुए हैं। ऐसे लोग यह क्यों नहीं सोचते कि हमारे देवताओं एवं ऋषिओं ने जिस विश्व-कल्याणकारी धर्म का ढाँचा इतने उच्च-कोटि के आदर्शों द्वारा निर्मित का है। जिनके पालन करने से मनुष्य देवता बन सकता है, समाज एवं संसार में स्वर्गीय वातावरण का अवतरण हो सकता है, उस धर्म के नाम पर हम पशुओं का वध करके उसे और उसके निर्माता अपने पूज्य पूर्वजों को कितना बदनाम कर रहे हैं।

धर्म के मूलभूत तत्त्व-ज्ञान को न देखकर अन्य लोग धर्म के नाम पर चली आ रही अनुचित प्रथाओं को धर्म का आधार मान कर उसी के अनुसार उसे हीन अथवा उच्च मान लेते हैं,अश्रद्धा  अथवा घ्रणा करने लगते हैं। इस प्रकार धर्म को कलंकित ओर अपने को पाप का भागी बनाना कहाँ तक न्याय-संगत और उचित है। इस बात समझे और पषु-बलि जैसी अधार्मिक प्रथा का त्याग करें भेडें, बकरे ऊंट आदि ईश्वर की ही सन्तानें है, उनकी उत्पत्ति है और उन्ही की सम्पत्ति है। आप क्या कुर्बान करेंगे? ईश्वर का दान फिर से ईश्वर पर कुर्बान? क्या किसी बालक को खुश करना है? जबकि ईश्वर ने तो जो दान एक बार दे दिया, वापस लेने की उसे कत्तई चाहना नहीं। ईश्वर दाता है, याचक नहीं।

ईश्वर इस तरह की हिंसा से कभी भी खुश होने वाले नहीं। उन्होंने जगह जगह प्राणियों के साथ दया संवेदना की उम्मीद रखी है। वास्त्विकता तो यह है कि इस स्वार्थ में लाखों जानवर बलि चढ जाते है। महा हिंसा का तांडव है यह पशु-बलि की कुरीति। आखिर धर्म के नाम पर यह घ्रणित, पाशविक कार्य कब तक चलते रहेंगे क्या इस हिंसा को रोकने के लिये भी कानून की आवयश्कता है या लोग स्वयं इन हिसंक कृत्यों से दूर हो जायेगें यदि है नहीं तो हम जरुर इसके लिये कानून का दरवाजा खटखटायेगें

rajeev choudhary

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