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फिर भारत पाक वार्ता?

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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आज देश की जनता सामने सबसे बड़ा प्रश्न कश्मीर मुद्दा भले ही अटका पड़ा हो किन्तु हमारे हिसाब से राष्ट्रीय प्रश्न ये है की जब कश्मीर पर भारत और आतंकवाद पर पाकिस्तान बात नहीं कर रहा है तो भारत पाक वार्ता का औचित्य क्या है? बेशक, भाजपा के उग्रपंथी, नेता  पाकिस्तान के प्रति नीति में इस नये मोड़ से नाखुश हैं।  बहरहाल, उम्मीद की जाती है कि मोदी सरकार ने, पाकिस्तान के मामले में अबतक की कूटनीति के दयनीय अध्याय से सही सबक लिए होंगे। बैंकाक से शुरू हुई वार्ताओं की प्रक्रिया को अब चौतरफा संवाद की ओर बढऩा चाहिए, जिसके दायरे में दोनों देशों के बीच तमाम अनसुलझे मुद्दों को समेटा जा सके। भारत के लिए कश्मीर कश्मीर के लिए हजारों हिन्दुओं के हित इस वार्ता में जरूर होने चाहिए|

विपक्षी दलों का कहना है कि सीमा पार से आतंकवाद और घुसपैठ की घटनाएं जारी हैं। पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलीबारी में सेना के जवान मारे जा रहे हैं। हालात पहले जैसे ही हैं तो ऐसे में पाकिस्तान के साथ बातचीत करने का औचित्य क्या है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस बातचीत को देश के साथ धोखा तक बता दिया। विपक्षी दलों की बात में दम भी है क्योंकि पीएम मोदी खुद कहते आए हैं कि गोलीबारी और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती। बातचीत के लिए उपयुक्त माहौल का बनना जरूरी है।  राष्ट्रमंडल देशों की बैठक में हिस्सा लेने माल्टा पहुंचे पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ ने ब्रिटेन के पीएम डेविड कैमरन के साथ बातचीत में कहा कि उनका देश भारत के साथ बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार है। इसके बाद पेरिस में पीएम नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच हुई संक्षिप्त मुलाकात ने बातचीत के लिए माहौल बनाने की जमीन तैयार की होगी। हालाँकि यह जमीन पिछले 68 सालो में अनगिनत बार तैयार हुई और नतीजा ढाक के तीन पात वाला रहा और हम पाकिस्तान की कूटनीति की बजाय अपने घर में बने कानून से हारते नजर आये| जबकि वास्तविकता यह है कि कश्मीर की समस्या को कभी भारत के निजामो ने सुलझाना चाहा ही नहीं वरना धारा 370 जो कश्मीर को अलग सविंधान, अलग ध्वज, अलग राज्य अध्यक्ष और कश्मीर को शेष भारत से भिन्न और अलग रखने का माध्यम बनी हुई है उसे हटाना होगा जब हम ही राजनैतिक और कानूनन कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं दर्शाते तो फिर पाकिस्तान और शेष विश्व क्यों स्वीकार करेगा?

ऐसा नहीं है कि 1947 में कश्मीर के भारत में विलय के बाद एकदम धारा 370 का जन्म हुआ बल्कि कश्मीर रियासत का विलय अक्तूबर 1947 में हुआ था जबकि इस सच से भी अनभिज्ञता जाहिर नहीं की जा सकती कि शेख अब्दुल्ला के दबाव में यह धारा सविंधान में उसके दो वर्ष बाद अक्टूबर 1949 में डाली गई थी| और लोगों के मनोभाव में यह बात डाल दी गयी कि कश्मीर आजाद है वह भारत का हिस्सा नहीं है नेहरु जी इस अदूरदर्शिता का खामियाजा भारत आज तक हजारों सैनिको के लहू, कश्मीरी हिन्दुओं के साथ हुआ व्यभिचार के रूप में चूका रही है आज जिस प्रकार यह धारा कश्मीरी अलगाववाद को सवैधानिक संरक्षण प्रदान करती है इसी कारण राष्ट्र विरोधी तत्वों का इसको बनाये रखने में निहित स्वार्थ पैदा हो चूका है|

आज कश्मीर के परिपेक्ष में  भारत सरकार हमेशा गुलाम कश्मीर की बात करती है जबकि अपने हिस्से में ही वहां से उजड़े कश्मीरी हिन्दू वापिस नहीं बस सकते भारत सरकार को और विपक्ष को इस मामले में पाकिस्तान से बात न कर एक स्वर में धारा  370 को हटा वहां पर अन्य लोगो को बसाने का काम करना चाहिए इस मामले में भारत चीन से सबक ले सकता है कि किस तरह उसने तिब्बत को भारत से हथियाकर वहां पर अपनी आर्मी के रिटायर सैनिको को बसाकर वहां उपजा असन्तोष दबा दिया|

अब अगर वार्ता होनी ही है तो यह सामान्य शिष्टाचार का आदान प्रदान करने, चाय पीने और मौसम पर चर्चा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए. यहां यह भी ध्यान रखना होगा अगला सार्क सम्मेलन 2016 के मध्य में पाकिस्तान में प्रस्तावित है। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पीएम मोदी को पाकिस्तान की यात्रा करनी होगी और ऐसे में यदि माहौल बदला नहीं और बदलने की कोशिश नहीं की जाती तो उनकी इस यात्रा पर भी सवाल उठने शुरू हो जाते। आतंकवाद और कश्मीरी हिन्दुओं के हित के अलावा कोई बात नहीं होनी चाहिए

राजीव चौधरी

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