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कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है…….

हिन्दी सिनेमा का सफरनामा

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कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है,

कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए!!

तू अब से पहले सितारों में बस रही थी कहीं,

तुझे जमीं पर बुलाया गया है मेरे लिए!!


कहते हैं कुछ गीत पुराने होकर भी पुराने नहीं लगते. फिल्म कभी-कभी का यह गीत और उसकी खूबसूरत पंक्तियां भी शायद हर प्यार करने वाले की जुबां पर रहती हैं. अमिताभ बच्चन, राखी, शशि कपूर, ऋषि कपूर, नीतू सिंह जैसे बड़े नामों का साथ होने के बावजूद कभी-कभी फिल्म को उसके गीत-संगीत की वजह से ज्यादा जाना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं इस फिल्म को सजीव और बेहद रोमांटिक बनाने वाले फिल्म के गीतकार और शायर साहिर लुधियानवी ने कभी नहीं सोचा था कि वे बॉलिवुड में आएं या यूं कहिए कि वे फिल्मों की दुनिया में जाना ही नहीं चाहते थे. पहले के शायरों की एक खास बात होती थी कि उनका संबंध जिस क्षेत्र से होता था वह उसे ही अपने नाम के आगे जोड़ देते थे. साहिर लुधियानवी भी लुधियाना से संबंध रखते थे.


sahir ludhiyanviआठ मार्च, 1921 को लुधियाना में जन्में साहिर वकील बनना चाहते थे जिसके चलते उन्होंने लुधियाना के एससीडी कॉलेज में दाखिला लिया. घर के माहौल और लिखने के शौक के चलते वे लगातार रचनाएं भी लिखते रहे. साहिर की जीवनी से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे उर्दू लेखक डॉ. केवल धीर के अनुसार कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनकी पहली रचना ‘तलखियां’ प्रकाशित हुई थी.

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लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल और सतीश चन्द्र धवन कॉलेज में पढ़ाई करने वाले साहिर रेलवे स्टेशन से सटे जगराओं पुल के पास डीजल शेड के नजदीक अपनी माता सरदार बेगम के साथ रहते थे. बचपन में उन्होंने अपनी माता-पिता में अनबन और मां के प्रति अत्याचार होते देखा था. यही वजह है कि शुरुआती समय में वह सामाजिक अत्याचार के विरुद्ध ही लिखते थे.


साहिर एक अच्छे शायर थे इसीलिए कॉलेज की लड़कियों के बीच वह बहुत लोकप्रिय थे. कॉलेज में साथ पढ़ने वाली ईश्वर कौर के साथ प्रेम संबंध के चलते उन्हें कॉलेज भी छोड़ना पड़ा. इसके बाद उन्होंने लाहौर स्थित दयाल सिंह कॉलेज में दाखिला लिया. लाहौर में जब उनका मन नहीं लगा तो वे 1945 में मुंबई आ गए और पहली फिल्म आजादी की राह में जाग उठा हिन्दुस्तान.. गीत लिखा. यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ.

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हिंदी फिल्मों में साहिर ने 30 वर्षों तक काम किया जिसमें उन्होंने 113 गाने लिखे. इनमें नौजवान, बाजी, जाल, शोले, टैक्सी ड्राइवर, नया दौर, प्यासा, फिर सुबह होगी, धूल का फूल, बरसात की रात, हम दोनों, गुमराह, ताजमहल, कभी-कभी आदि के गीत खूब चर्चित हुए. साहिर की अंतिम फिल्म लक्ष्मी थी, जिसमें उनके गीत थे.


साहिर संजीदा स्वभाव के इंसान थे, लेकिन अपने गांव लुधियाना से आने वाले लोगों से वह गर्मजोशी के साथ मिलते थे. इतना ही नहीं लुधियाना से अगर कोई भी मुंबई उनसे मिलने जाता, तो वे पूरे दिल के साथ उनकी खातिरदारी करते थे.

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25 अक्टूबर, 1980 को 60 वर्ष की आयु में साहिर लुधियानवी इस दुनिया से चल बसे लेकिन वे आज भी अपनी खूबसूरत शायरी की वजह से याद किए जाते हैं.

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