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ग्लैमर और मसाले के बावजूद बदहाली क्यों ?

हिन्दी सिनेमा का सफरनामा

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रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और यशराज बैनर तले बनी ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ तो सभी को याद ही होगी. एक ओर जहां धर्मेंद्र और अमिताभ स्टारर शोले फिल्म मुंबई के एक थियेटर में लगातार पांच वर्षों तक चली थी वहीं दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने तो शोले का रिकॉर्ड तक तोड़कर लगातार दस सालों तक सिनेमाघर में चलने का एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया था. जुबली कुमार यानि राजेंद्र कुमार के तो कहने ही क्या थे. उनकी तो लगभग हर फिल्म ही जुबली हिट होती थी. परंतु आज की फिल्में कुछ सप्ताह में ही क्यों पुरानी और बोरिंग हो जाती हैं?


ddljग्लैमर तो ठीक है पर कहानी भी तो चाहिए !!

आज की तरह पहले ना तो मल्टिप्लेक्स हुआ करते थे और ना ही फिल्मों में कुछ खास ग्लैमर ही मौजूद होता था तो क्या वजह है कि जहां एक ओर पुरानी फिल्में अपनी रिलीज के एक लंबे समय बाद भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाया करती थीं वहीं आज जिन फिल्मों के निर्माण पर पैसा पानी की तरह बहा दिया जाता है वह एक या ज्यादा से ज्यादा दो हफ्तों तक ही अपना चार्म बरकरार रख पाती हैं?

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बॉलिवुड में हर साल सैकड़ों फिल्मों का निर्माण होता है लेकिन बड़े-बड़े नाम और स्टार्स की मौजूदगी के बावजूद फिल्में दर्शकों को लुभाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं. हाल ही में रिलीज हुई कुछ बड़ी फिल्मों के उदाहरण ही ले लीजिए, बॉडीगार्ड, रेडी, रा.वन, हाउसफुल, एक था टाइगर आदि चाहे किसी भी फिल्म का नाम ले लीजिए सभी का हाल एक सा ही रहा. जितने जोर-शोर के साथ इन सभी फिल्मों को रिलीज किया गया यही देखने में आया कि कुछ ही दिनों में इन सभी फिल्मों की चमक इस कदर फीकी पड़ गई कि बड़े-बड़े और नामी सितारों का नाम भी इन फिल्मों की डूबती नैया को बचा नहीं पाया.


जहां एक तरफ फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि मल्टीप्लेक्स के इस दौर में रोजाना एक फिल्म के 25-25 शो चलते हैं जिस वजह से पहले ही सप्ताह में अधिकांश दर्शक फिल्म देख चुके होते हैं. पहले सप्ताह में ही फिल्म अपनी लागत के साथ-साथ प्रॉफिट कमा लेती है. यही कारण है कि आज कोई फिल्म जुबली के पड़ाव पर नहीं पहुंच पाती.


sholayकसी स्टोरी और भावनाओं का मेल

लेकिन दर्शकों और फिल्म समीक्षकों की राय इन सबसे थोड़ी जुदा है क्योंकि उनका मानना है कि बड़ी-बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्में भी दर्शकों को अपने साथ जोड़ नहीं पातीं, वह जल्दी ही उनसे ऊब जाते हैं. जबकि पहले की फिल्मों में ऐसा नहीं होता था. हिंदी क्लासिक फिल्मों में एक कहानी हुआ करती थी, भावनाएं हुआ करती थीं लेकिन आज केवल शोर-शाराबा और ग्लैमर ही रह गया है. थ्री ईडियट्स, रंग दे बसंती, लगान आदि कुछ फिल्में ऐसी रहीं जिनमें ग्लैमर और पैसा तो खूब खर्च हुआ लेकिन दमदार कहानी और भावनाओं की मौजूदगी के कारण एक लंबे समय तक दर्शकों को खींचने में कामयाब रहीं. जबकि बॉड़ीगार्ड, रेडी का एक दृश्य भी याद करने बैठें तो शायद याद ना आए.

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Post Your Comment : अब यहां सवाल यह उठता है कि फिल्मों के इस बदलते स्वरूप के लिए जिम्मेदार कौन है – फिल्म निर्माता या फिर आम दर्शक, जिनके लिए ग्लैमर रहित फिल्मों का औचित्य ही लगभग समाप्त हो चुका है?


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