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पृथ्वी को बचाने का संकल्प

जागरण मेहमान कोना

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अर्थ ऑवर यानी दुनिया में पृथ्वी को बचाने की एक छोटी-सी कोशिश, जिसमें लगभग 100 देश और 6000 शहर जुड़ चुके हैं। 2007 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर से अर्थ ऑवर की शुरुआत हुई। कुछ लोगों को ख्याल आया कि कम से कम एक घंटे के लिए ही हम ऊर्जा की बेतहाशा खपत पर लगाम लगाएं। कुछ लोगों की यह कोशिश आज पूरे विश्व में एक सकारात्मक अभियान का हिस्सा है। पहली बार 2007 में 22 लाख घरों और उद्योगों ने एक घंटे के लिए अपनी लाइटें बंद कर दीं। जब हम घरों की बत्ती बुझाते हैं तो हम समाज और दुनिया को बेहतर बनाने के आंदोलन का अहम हिस्सा बन जाते हैं। व‌र्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा शुरू किए गए अर्थ ऑवर अभियान में दुनिया के पांच करोड़ से ज्यादा लोग पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हुए एक घंटे के लिए इसका हिस्सा बन रहे हैं। तबसे हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को अर्थ ऑवर मनाया जाता है। एक शहर से शुरू हुई इस अनोखी पहल में शनिवार को दुनिया के सैकड़ों शहर शामिल होंगे। एक घंटे के लिए ये शहर इस उम्मीद में अंधेरे में डूब जाते हैं कि आने वाली पीढि़यों को उर्जा संकट और ग्लोबल वार्मिंग का कहर न झेलना पड़े। अपने देश को पूर्ण रूप से विकसित करने के लिए हमें विकसित देशों से सीख लेने की आवश्योकता है।


कुदरती संसाधनों की लूट


उर्जा बचत में हम सबका सहयोग अत्यंत आवश्यरक है? यदि उर्जा का उपयोग सोचसमझ कर नहीं किया गया तो इसका भंडार जल्द ही समाप्त हो सकता है। अपना भविष्य उज्जवल बनाए रखने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में सभी तरह की ऊर्जाओं तथा ईंधन की बचत बेहद आवश्यक है, क्योंकि आज हम बचत करेंगे तो ही भविष्य सुविधाजनक रह पाएगा। बचत चाहे छोटे स्तर पर क्यों न हो, जरूर कारगर होगी क्योंकि बूंद-बूंद से ही सागर भरता है। आज हम संभल कर ऊर्जा के साधनों का इस्तेमाल करेंगे तो ही इनके भंडार भविष्य में बचे रह पाएंगे। वैश्वीकरण के दौर में आज हमारी जीवनशैली में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव हम इस रूप में भी देख सकते हैं कि जो काम दिन के उजाले में सरलता से हो सकता है, उसे भी हम देर रात तक करते हैं। उदाहरण के लिए क्रिकेट का खेल, विभिन्न सामाजिक समारोह आदि। नियमित व संतुलित दिनचर्या छोड़कर हम ऐसा जीवन जीने के आदी होते जा रहे हैं जो हमें अस्पताल, एक्सरे, ईसीजी, आइसीयू के माध्यम से भयंकर ऊर्जा व्यय में उलझा रहा है।


ग्लेशियरों की चिंता


हमारी दिनचर्या दिन प्रतिदिन अधिकाधिक ऊर्जा की मांग करती जा रही है। विकास का जो मॉडल हम अपनाते जा रहे हैं उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन निश्चित हैं। आज प्रकृति के मिट्टी, पत्थर, पानी, खनिज, धातु को भौतिक सुख साधनों में बदलकर उससे विकसित होने का सपना देखा जा रहा है, जिससे अंधाधुंध ऊर्जा खपत बढ़ रही है। इस कथित विकास में इस बात की अनदेखी हो रही है कि प्रकृति में पदार्थ की मात्रा निश्चित है, जो बढ़ाई नहीं जा सकती। फिर भी पदार्थ का रूप बदलकर, सुख साधनों में परिवर्तन करके, खपत बढ़ाकर विकास का रंगीन सपना देखा जा रहा है। इस विकास के चलते संसाधनों का संकट, प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, ऊर्जा की व्यापक कमी आदि मुश्किलें सिर पर मंडरा रही हैं।


प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढि़यों का भी। जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनो को सुरक्षित छोड़ जाएं, अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेंगी। इस लिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे।


लेखक शशांक द्विवेदी स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


तो बस आंखों में ही रह जाएगा पानी


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