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डिजिटल शोक

जागरण मेहमान कोना

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Peeyush Pandeyसोशल मीडिया के तमाम मंचों ने व्यक्ति के भीतर की वेदना को मुखर कर दिया है। हाल की कुछ घटनाओं के दौरान लोगों की प्रतिक्रियाओं को देखकर ऐसा ही लगता है। 14 अगस्त को मशहूर फिल्म अभिनेता शम्मी कपूर का निधन हुआ तो फेसबुक पर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। 22 सितंबर को पूर्व भारतीय कप्तान मंसूर अली खां पटौदी का निधन हुआ तो सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर शोक संवेदनाओं से पटी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। श्रद्धांजलि देने वाले सैकड़ों लोगों के जेहन में नबाव पटौदी महज एक क्रिकेटर और अभिनेता सैफ अली खान के पिता थे। भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान के बारे में उन्हें कुछ अता-पता नहीं था। डिजिटल शोक के संदर्भ में महत्वपूर्ण परिघटना एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स का निधन रहा। पांच अक्टूबर को स्टीव जॉब्स के निधन की खबर प्रसारित हुई तो लाखों लोगों ने करोड़ों संदेशों के रूप में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इनमें भारतीयों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। स्टीव जॉब्स भले एक जमाने में भारत में बसने का इरादा लेकर आए थे, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका कभी भारत से खास नाता नहीं रहा।


एप्पल के उत्पादों की लोकप्रियता भी भारत में बेहद सीमित रही है। सच्चाई यह भी है कि स्टीव जॉब्स के निधन के बाद अखबारों व टेलीविजन चैनलों में छाई सुर्खियों के बाद लाखों भारतीयों ने जाना कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का निधन हुआ है, लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया व्यक्ति को अमूमन जानने या न जानने के झंझट से ऊपर रहते हुए डिजिटल शोक प्रगट करने में आगे रहती है। स्टीव जॉब्स के निधन के बाद भारतीय सोशल मीडिया दुनिया में बही डिजिटल शोक की लहर के बाद यह बात और साफ हो गई। फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया के तमाम दूसरे मंचों पर महज एक क्लिक के साथ शोक संवेदना प्रकट की जा सकती है, लेकिन सिर्फ एक क्लिक अथवा शोक संदेश के रूप में तीन-चार शब्द लिख देने भर से व्यक्ति के भीतर मानवीय करुणा का भाव जाग सकता है। दरअसल, सोशल मीडिया में शोक प्रगट करने में भी उमंग दिखाई देती है। अजीब विडंबना है कि शहर में ही किसी परिचित के घर हादसे के बाद शोक प्रगट करने के दौरान दूरियां और समय की कमी जैसे छोटे कारक हमारी संवेदनशीलता को भोथरा कर देते हैं, लेकिन डिजिटल शोक प्रगट करने के मामले में हम स्टीव जॉब्स को एक बार नहीं कई बार श्रद्धांजलि अर्पित कर डालते हैं। यहां एक सामान्य सवाल हो सकता है कि किसी के निधन के बाद शोक प्रगट करने में गलत क्या है? निश्चित रुप से न इसमें कुछ गलत है और न असामान्य, लेकिन सिर्फ डिजिटल शोक की लहर में बहते हुए खुद को संवेदनशील मान लेना सवाल खड़े करता है। यही भाव सोशल मीडिया की ताकत को सीमित कर देता है और यही भाव सोशल मीडिया के मित्रों को असल मित्रों के बरक्स देखने की प्रवृत्ति पैदा करता है।


सवाल यह है कि जिस सोशल मीडिया की दुनिया में एक अनजान शख्स के दुख-दर्द में लोग एक सेकेंड गवाएं बिना यूं ही शामिल हो जाते हों वहां क्या वर्चुअल दोस्तों को असल दोस्तों के बराबर रखकर देखने की बात भी होनी चाहिए? मुश्किल यह है कि कई वाक्यों का हवाला देकर लगातार ऐसा करने की कोशिश की जाती है। फेसबुक और ट्विटर जैसी साइट्स सोशल नेटवर्किग साइट्स हैं। मतलब यह कि इनके निर्माताओं का मानना भी यही था कि इन साइट्स के जरिए लोग आपस में मिलें और संबंधों का दायरा बढ़ाएं। सोशल नेटवर्किग साइट्स संबंधों के विस्तार के बीच तमाम कारोबारी संभावनाएं पैदा कर रही हैं। ये साइट हुनर प्रदर्शन का मंच बन रही हैं और इन मंचों पर एक रुचि के लोग साथ आकर दबाव समूह का काम कर रहे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान इन मंचों की ताकत हम सभी देख चुके हैं, लेकिन किसी भी हालत में ये फ्रेंडशिप साइट्स नहीं है। हां, सोशल नेटवर्किग साइट्स पर लगातार संवाद करते हुए समान रुचि के लोग यदि नजदीक आ जाते हैं तो यह बेहतर और अच्छी बात है। वर्चुअल दुनिया से शुरू हुआ रिश्ता असल जिंदगी में भी शामिल होता है तो यह उन दोनों लोगों के बीच का मामला है। इसी बात को डिजिटल शोक से समझा जाना चाहिए।


इस आलेख के लेखक पीयूष पांडे हैं


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