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मोदी के असर की बानगी

जागरण मेहमान कोना

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विज्ञापन और ब्रांड गुरु एलिक पदमसी का यह जुमला बहुत मशहूर है कि मेरा विश्वास अपने ब्रांड में बदलाव करने पर नहीं है, बल्कि सामने वाले को ऐसा करने के लिए विवश करने पर है। जब मैं नरेंद्र मोदी के असर की व्याख्या करने के लिए एलिक के इस जुमले को इस्तेमाल कर रहा हूं तो यह संभव है कि उन्हें यह अटपटा लगे, क्योंकि एलिक ने भी मोदी के खिलाफ पूरी तन्मयता के साथ अभियान चलाया था। एलिक मुङो माफ करें, लेकिन सच्चाई यही है कि मोदी के केंद्रीय भूमिका में आने और इससे ध्रुवीकरण की जो संभावनाएं उभरी हैं उसने भाजपा के कुछ पुराने दुश्मनों को मुस्लिम वोट में हिस्सेदारी के लिए कुछ इस तरह उकसा दिया है मानो अगले आम चुनाव में इसके अलावा अन्य कुछ बचा ही न हो। संभवत: इसी के चलते कांग्रेस बटला हाउस मुठभेड़ को लेकर बचकाने बयान दे रही है और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस घटनाक्रम ने नीतीश कुमार और अखिलेश यादव को मोदी के मुकाबले अपनी रणनीति फिर से निर्धारित करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में आने वाले मुख्यमंत्री अचानक असहाय नजर आने लगे हैं। अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगा कि इस सबका लोकसभा चुनाव में सीटों की दृष्टि से कितना बड़ा अंतर पड़ेगा, लेकिन इतना तो तय है कि जो भी अंतर आएगा उसका सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिलेगा। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि शुरुआत में ही विरोधियों ने गलती करनी आरंभ कर दी है और यह ऐसा ही है जैसे एक बेसुध बॉक्सर उल्टे-सीधे पंच मारने लगता है और मुकाबले की कोशिश में खुद को ही घायल कर लेता है।

अयोध्या में नई सुबह की आहट


कुल मिलाकर आशय यही है कि मोदी अपने विरोधियों को उनके खुद के ब्रांड पर सोचने को विवश कर रहे हैं? नीतीश कुमार और अखिलेश यादव, दोनों ने ही सुशासन और विकास के नारे पर बहुमत हासिल किया था। नीतीश कुमार ने कानून एवं व्यवस्था में सुधार और बुनियादी ढांचे के विकास के प्रयासों के साथ लोकप्रियता हासिल की। इसके अतिरिक्त तथ्य यह भी है कि वह भाजपा को इसके लिए राजी करने में भी सफल रहे थे कि वह मोदी को बिहार से दूर रखे। एक मजबूत स्थानीय नेता एक राष्ट्रीय नेता के सामने नियम तय करने की स्थिति में था। उनकी इस सफलता ने ही उन्हें बिहार के मुस्लिमों के बीच शेर का बच्चा वाली छवि के रूप में पेश किया और इसके फलस्वरूप लालू प्रसाद यादव के राजद के अनेक नेता पाला बदलकर नीतीश कुमार के साथ जुड़ गए। नीतीश की छवि साफ, आधुनिक, सुशासन के लिए समर्पित और सेक्युलर नेता के रूप में बनी। यह नीतीश रूपी ब्रांड था जिसने बाजार में विरोधियों का सफाया कर दिया।


इसी तरह अखिलेश यादव एक युवा, गंभीर, आसानी से उपलब्ध और विनम्र राजनेता की अपनी छवि के साथ लोगों को नौकरियां देने के वायदे करते और सरकारी-निजी कंपनियों के सहयोग से परियोजनाएं स्थापित करने और इससे भी अधिक युवाओं को कंप्यूटर, लैपटाप बांटते हुए अंग्रेजी शिक्षा की प्रेरणा देते हुए एक नए रूप में सामने आए। अखिलेश का यह रूप पुराने पड़ चुके लोहियावाद को गले लगाए रखने की उनके दल की प्रतिबद्धता से अलग था। अखिलेश यादव का चुनावी अभियान इस मामले में उल्लेखनीय रहा कि उसमें शायद ही मुस्लिमों से सीधे मुखातिब होने जैसी कोई बात नजर आई हो। कितना मजेदार है कि यूपी के पिछले चुनाव में अखिलेश यादव का अभियान सपा का अब तक का सबसे अधिक सेक्युलर चुनावी अभियान था। यह अखिलेश यादव का ब्रांड था जिसने देश के सबसे अधिक हताश-निराश वोटरों के बीच विस्मयकारी असर डाला।

कांग्रेस और न्यायपालिका


और अब यह देखें कि इन दोनों ने अपने-अपने ब्रांड के साथ क्या किया? नीतीश कुमार मोदी के मसले पर भाजपा से अलग हो गए। एक झटके में फैसला हुआ और नीतीश को 48 घंटे की प्रसिद्धि का मौका मिल गया। नीतीश का स्पष्टीकरण कुछ भी हो, उन्होंने अपने राज्य की अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी को लालू प्रसाद यादव से दूर ले जाने का मौका देखा। वह रातोंरात कांग्रेस और सेक्युलर बुद्धिजीवियों के प्रिय बन गए। यह बात अलग है कि सेक्युलर बुद्धिजीवियों का यह समर्थन चुनावों में कोई अहमियत नहीं रखता। बिहार में कांग्रेस नैनो पार्टी (उसके चार विधायक किसी भी छोटी कार में आसानी से आ सकते हैं) की तरह है। अगर नीतीश कुमार कांग्रेस से जुड़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें क्या हासिल होगा? क्या अब पूरी मुस्लिम आबादी नीतीश के साथ हो जाएगी और वह भाजपा से अलग होने के कारण अगड़ी जातियों के रूप में होने वाले नुकसान की भरपाई अतिरिक्त मुस्लिम मतों से कर सकेंगे? उनकी गणित तो यही है कि पूरा मुस्लिम समुदाय उनके पक्ष में आ खड़ा होगा, लेकिन लालू इतने आसान खिलाड़ी नहीं हैं।

मनमानी की नई मिसाल


लालू के पास तर्क है और वह यह जानते हैं कि अपनी बात कैसे समझाई जाए। उन्हें बस बिहार के मतदाताओं को यह याद दिलाने की जरूरत है कि अकाली दल और शिवसेना के साथ जदयू भाजपा का सबसे प्रिय सहयोगी रहा है और जब गुजरात जल रहा था तब राजग के दूसरे सेक्युलर नेताओं (ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू) की तरह नीतीश एक शब्द भी नहीं बोले थे। इसलिए लालू को बस यही कहना है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को। नीतीश ने अपनी इस रणनीति पर अमल करते हुए इस तथ्य से आंखें फेर लीं कि उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए ऐतिहासिक जनादेश सुशासन के नाम पर मिला था। मिडडे मील त्रसदी पर उनकी प्रतिक्रिया के संदर्भ में मुङो खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि उनका जवाब आत्मकेंद्रित और बचकाना था। राष्ट्रीय फलक पर आने के आकांक्षी अच्छे, आत्मविश्वास से भरे और अनुभवी राजनेता साजिश की बातें कहकर बचकाना रवैया नहीं दर्शाते। दुर्भाग्य से नीतीश अब सुशासन और विकास की बातें नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनका जोर वोट बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यकवाद पर है। भाजपा के चले जाने से उन्होंने कुछ सक्षम मंत्री भी खो दिए हैं। आश्चर्य नहीं कि पिछले तीनों जनमत सर्वेक्षण नीतीश की ताकत घटने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।


अखिलेश की स्थिति कुछ अधिक जटिल है। वह युवा आकर्षण के दम पर सत्ता में आए, लेकिन अपने पिता और चाचाओं की पूरी क्रिकेट टीम के दखल के आगे समर्पण कर बैठे। उन्होंने कुछ चुनावी वायदे पूरे किए हैं, लेकिन बदनाम सरकारी तंत्र के जरिये जो कुछ बांटा गया है उसमें आगे कुछ विवाद उभर आएं तो आश्चर्य मत कीजिएगा। उनके राज्य में शासन की गुणवत्ता, कानून एवं व्यवस्था और यहां तक कि सांप्रदायिक सौहार्द इतना बिगड़ चुका है कि लोगों ने मायावती के शासन को बेहतर महसूस करना शुरू कर दिया है। उनके हालिया कदम (दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन) ने तो नौकरशाही को भी मायावती की वापसी का आकांक्षी बना दिया है। वह तो अधिकारियों को केवल इधर से उधर ही करती ही थीं, लेकिन अखिलेश यादव ने तो एक युवा आइएएस अधिकारी को न केवल निलंबित कर दिया, बल्कि वह उन्हें आरोपपत्र भी सौंपने की तैयारी कर रहे है। वह क्यों ऐसा कर रहे हैं? स्पष्ट रूप से मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए, क्योंकि उन्हें भय है कि मोदी का भय उन्हें कांग्रेस की ओर मोड़ सकता है। कुछ समय पहले अखिलेश यादव सरकार आतंक के मामलों में जेलों में बंद मुस्लिम युवाओं को राहत देने की कोशिश कर रही थी। अब आप सुशासन और विकास के प्रतीक नजर आने वाले नीतीश कुमार और अखिलेश यादव की रणनीति की किस तरह व्याख्या करेंगे? क्या वे वही नहीं कर रहे हैं जिसका जिक्र एलिक पदमसी ने किया था?


इस आलेख के लेखक शेखर गुप्ता हैं


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