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राह दिखाकर चला गया गाइड

जागरण मेहमान कोना

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हिंदी फिल्मों में देव आनंद अपनी विशिष्टताओं के कारण सदाबहार। उन्हें लोग आनंद के देव भी कहते हैं। शायद इसीलिए कि वे अपने पूरे और लंबे फिल्मी करियर में लोगों को सिर्फ और सिर्फ आनंद देते रहे। वे अपने समकालीन अभिनेता राजकपूर और दिलीप कुमार की तरह ही अलग छवि वाले रहे और सबसे खास बात यह रही कि उनका अंदाज हमेशा रोमांटिक रहा। देखें तो बतौर हीरो इतनी लंबी पारी हिंदी सिनेमा के किसी भी अभिनेता ने नहीं खेली। सौ से भी ज्यादा फिल्मों में अभिनय करने वाले देव हाल में फिल्म चार्जशीट को लेकर चर्चा में थे। यह उनकी 114वीं फिल्म थी। अभी तक उनके अंदाज में कोई बदलाव नहीं आया था, जबकि उम्र 88 साल हो गई थी। सिर हिलाते हुए, मचलते-झूमते हुए, तिरछी आंखें, मस्तानी चाल, नशीली आवाज में बातें करने की अदा ने उन्हें एक स्टाइलिश हीरो बनाया। तब से लेकर अब तक के अभिनेताओं को देखें तो सभी में देव की झलक कहीं न कहीं जरूर मिलती है। यही सब वजह थी कि देव करीब पांच दशक तक बतौर हीरो परदे पर छाए रहे।


देखें तो उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद भी मन से देव आनंद पूरी तरह जवान थे। यदि कुछ बदला था तो बस उनके चेहरे की रौनक, जिसका उम्र के साथ बदलना शाश्वत है। उन्होंने परदे पर अपने ही गाये एक गीत मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया.. को जिंदगी का फलसफा माना और उसी पर अमल करते हुए आगे बढ़ते रहे। उन्होंने बरबादियों का सोग कभी नहीं मनाया। कुछ बुरा भी हुआ तो वे उसका जश्न मनाते आगे बढ़ते गए। लेकिन हमेशा अपने दिल की सुनने वाले देव आनंद को आखिर में उनके दिल ने दगा दिया..। पंजाब के गुरदासपुर में 26 सितंबर 1923 को जन्मे धर्मदेव आनंद मशहूर वकील पिशोरीमल आनंद की छठी संतान थे। धर्मदेव कुछ ही बड़े हुए थे कि मां चल बसीं। उनकी प्राथमिक शिक्षा डलहौजी के कॉन्वेंट स्कूल में हुई। वर्ष 1938 में मैट्रिक और 1942 में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए ऑनर्स करने वाले धर्मदेव से पिता ने वकील या सरकारी महकमे में अफसर बनने की उम्मीद की थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। वैसे धर्मदेव को सेना की नौकरी शुरू से ही पसंद थी। मैट्रिक पास करने के बाद वे नौसेना में भर्ती होने गए थे, लेकिन पिता स्वतंत्रता सेनानी थे, इसलिए ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें नौसेना में भर्ती नहीं होने दिया। धर्मदेव इस बात से बहुत दुखी हुए। फिल्मों को लेकर धर्मदेव के मन में आकर्षण तो था, लेकिन इसी में करियर बनेगा, यह वे नहीं जानते थे। मन में कुछ ऐसा चला कि एक दिन उन्होंने बंबई जाने का फैसला कर लिया।


तीसरे दर्जे का टिकट और साथ में तीस रुपये लेकर वे 19 जुलाई 1943 की सुबह बंबई पहुंच गए। जब धर्मदेव बंबई आए, तब उनके बड़े भाई चेतन आनंद भी वहीं थे। वे धर्मदेव के साथ मालाबार हिल में एक मित्र के यहां ठहरे। फिर चेतन आनंद अपने उपन्यासकार मित्र राजा राव के मरीन ड्राइव स्थित फ्लैट में रहने आ गए। राजा राव के जरिये दोनों भाई ख्वाजा अहमद अब्बास से मिले और धर्मदेव ने अभिनय करने की अपनी इच्छा उनसे बताई तो उन्होंने दोनों भाइयों को इप्टा से जुड़ने को कहा। इसके साथ कुछ पैसा कमाना जरूरी था, इसलिए धर्मदेव ने सेना के पोस्टल सेंसर डिपार्टमेंट में 165 रुपये प्रतिमाह की नौकरी कर ली। जब वेतन से भी बात नहीं बनती दिखी तो धर्मदेव ने डाक टिकट का अपना अनोखा संग्रह 25 रुपये में बेच दिया।


धर्मदेव का संघर्ष चलता रहा, इसी बीच एक दिन जुबैदा नाटक के मंचन के दौरान निर्माता बाबू राव पई की निगाह में धर्मदेव आ गए। उन्होंने धर्मदेव को प्रभात स्टूडियो, जो अब पुणे फिल्म एवं टीवी संस्थान है, आकर स्क्रीन टेस्ट देने के लिए कहा। उन्हें इस काम में सफलता मिली और वे प्रभात की फिल्म हम एक हैं के लिए चुन लिए गए। यह फिल्म 1946 में रिलीज हुई। इस फिल्म के निर्देशक थे पीएल संतोषी और हीरोइन थीं कमला कोटनीस। यह राष्ट्रीय एकता पर आधारित एक सामाजिक फिल्म थी। इसमें धर्मदेव ने मुस्लिम और उनके बेहद खास मित्र रहमान ने हिंदू चरित्र को जिया था। बता दें कि इस फिल्म के साथ धर्मदेव के नाम से धर्म हट गया और धर्मदेव आनंद से देव आनंद हो गए। हम एक हैं के बाद देव की फिल्में आगे बढ़ो, मोहन, हम भी इंसान हैं और विद्या रिलीज हुई। विद्या में उनकी नायिका बनीं चौथे दशक की चर्चित नायिका सुरैया। बावजूद इसके यह फिल्म नहीं चली। फिर आई शाहिद लतीफ निर्देशित जिद्दी, जिसने सफलता पाई। इस फिल्म को देखने के बाद बलराज साहनी ने देव के अभिनय की काफी सराहना की। बता दें कि शुरुआती दौर में बलराज साहनी ने देव के अभिनय कौशल को नकार दिया था।


फिल्म जिद्दी में देव का होना भी महज एक संयोग था। पहले इस फिल्म में काम करने वाले थे अशोक कुमार, क्योंकि तब वे दर्शकों के चहेते हीरो थे, लेकिन अशोक कुमार ने यह फिल्म नहीं की, बल्कि उन्होंने कहा भी कि देव को ही उस फिल्म में लिया जाए। जिद्दी में काम करने के बाद देव को कंपनी की ओर से चार सौ रुपये मासिक मिलने लगा, जो उस समय के हिसाब से बहुत अधिक था। बहरहाल, जिद्दी की सफलता के बाद देव आनंद फिल्मी दुनिया के अच्छे अभिनेताओं में शुमार होने लगे। देव आनंद ने अब तक की तो थीं 114 फिल्में, लेकिन उनकी तीस से ज्यादा फिल्में सुपर हिट हुई। जब देव को फिल्मों में सफलता मिली तो वे लोगों की आंखों को तारे हो गए। उन्हें भाइयों का भी समर्थन पूरा-पूरा मिल रहा था। फिर 1949 में तीनों भाई चेतन, देव और विजय आनंद ने मिलकर नवकेतन की स्थापना की। इस बैनर की पहली फिल्म अफसर 1950 में रिलीज हुई। हालांकि यह फ्लॉप रही, लेकिन अगली फिल्म बाजी (1951) ने अच्छी सफलता पाई। इस फिल्म की हीरोइन थीं गीता बाली और कल्पना कार्तिक। कल्पना के साथ देव टैक्सी ड्राइवर में भी साथ आए। वह भी चली। इस फिल्म ने देव को जहां स्टार की हैसियत दी, वहीं चेतन आनंद को निर्देशक और विजय आनंद को लेखक के रूप में चर्चा दी।


नवकेतन बैनर से तब जुड़ने वाले तमाम लोग थे, जैसे एसडी बर्मन, राज खोसला, आरडी बर्मन, गुरुदत्त, अमरजीत, जयदेव, साहिर लुधियानवी, आशा भोसले आदि। व्यावहारिक सिनेमा में चेतन आनंद की पहचान भी नवकेतन के जरिये ही बनी। इस बैनर की सर्वाधिक चर्चित फिल्में थीं गाइड, हम दोनों और जॉनी मेरा नाम। जॉनी मेरा नाम उस समय की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी, तो गाइड ने एक फिल्म के रूप में देश विदेश में चर्चा पाई। हम दोनों देश की और खासकर देव आनंद की सर्वाधिक खूबसूरत फिल्म कहलाई। देव के चाहने वालों की तादाद दुनिया भर में है। उन्हें दादा साहब फालके, फिल्मफेयर और फिल्म से जुड़े तमाम विशेष सम्मान मिले, लेकिन देव तब अभिभूत हो गए, जब उन्हें दिलीप कुमार और राजकपूर की मौजूदगी में फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा गया। अभिनय को नया अंदाज देने वाले देव आनंद हमारे बीच नहीं हैं। गाइड का वह राजू, जो खुद तो जिंदगी का साथ निभाता चला गया, लेकिन हमें छोड़ गया बेखुदी में उसे पुकारते रहने के लिए..।


इस आलेख के लेखक रतन हैं


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