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मर्ज का मामूली उपचार

जागरण मेहमान कोना

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Harsh V Pnatआखिरकार एक समझौता हो ही गया। यह समझौता अमेरिका को कर्ज के संकट से कुछ राहत दिलाने के लिए था। अमेरिका का राजनीतिक तंत्र उस तरह नहीं टूटा जैसा कि कुछ लोगों ने सोचा था। फिर भी यह माना जा रहा है कि इस समझौते तक पहुंचने में देरी हुई, जिसके चलते बहुकोणीय आर्थिक संकटों के संदर्भ में गंभीरतापूर्वक विचार करने और उनका सामना करने के लिए अमेरिकी राजनीतिक प्रतिष्ठान की क्षमता पर कुछ सवाल उत्पन्न हुए। दुनिया यह भलीभांति देख रही है कि विश्व की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था वर्तमान समय संकट के दौर से घिरी है। अमेरिकी सीनेट की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति ओबामा को चार सौ अरब डालर की अतिरिक्त उधारी का अधिकार हासिल हुआ। और यह सब हुआ गत मंगलवार को मध्यरात्रि की डेडलाइन से चंद घंटे पूर्व। बावजूद इसके जो समझौता किया गया है उससे हर कोई खुश नजर नहीं आ रहा है। हाउस के स्पीकर जान ए. बोएनर ने सांसदों को बताया कि कुछ प्राथमिकताएं खतरे में हैं और ओबामा ऊंचे करों की अपनी मांग से पीछे हट गए हैं।


नाराज डेमोक्रेट आमतौर पर इस आकलन से सहमत नजर आए। कुल मिलाकर कटौती के प्रस्तावों पर कुछ सहमति और कुछ असहमति के साथ एक ऐसी रूपरेखा सामने आई, जिसके तहत प्रस्तावित कर्जो में अगले दस वर्षो में 2.1 ट्रिलियन डालर की कटौती की जानी है और महत्वपूर्ण बात यह है नए करों के संदर्भ में किसी तात्कालिक प्रावधान की बात नहीं की गई है। अमेरिकी संसद के लिए पिछला सत्र इसी मुद्दे पर गर्मागर्म बहस का गवाह बना, लेकिन इस समझौते के साथ इस संघर्ष का तात्कालिक समापन हो गया है। बावजूद इसके हर कोई यह महसूस कर रहा है कि एक बड़ी लड़ाई अभी सामने है। ध्यान और इसके साथ-साथ दबाव उस नई सुपर समिति पर स्थानांतरित होगा, जिसके ऊपर यह बताने की जिम्मेदारी डाली गई है कि 1.2 ट्रिलियन डालर से लेकर 1.5 ट्रिलियन डालर की और अधिक बचत कैसे की जाए? पहले दौर की कटौती का दायरा घरेलू खर्चो से लेकर सैन्य कार्यक्रम तक फैला हुआ है। इससे अगले दस वर्षो में 917 बिलियन डालर बचाए जाने हैं। कांग्रेस के बजट आफिस के अनुसार बचत के इस कार्यक्रम में कम ब्याज दर के भुगतान शामिल हैं। दूसरा दौर इसकी तुलना में अधिक कड़ा होगा। कर्ज की सीमा से संबंधित जो संधि हुई है और जिसने एक तरह से अमेरिकी राजनीति पर संकट खड़ा कर दिया था वह दरअसल एक आसान भागही है। असली संकट तो अभी कायम है। मेडिकेयर और सामाजिक सुरक्षा के मसले पर सुधारों का क्या होगा? करों में वृद्धि का सवाल भी कायम है। एक बार फिर राष्ट्रपति और कांग्रेस ने विवेकाधीन खर्चो को निशाना बनाया है, जो कि संघीय बजट का एक तिहाई हिस्सा है। पूर्व में विवेकाधीन खर्चो में की गई कटौती जितनी सघन रही उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि नई रणनीति आगे ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हो सकेगी।


यह स्पष्ट है कि समझौता डालर की तरलता के मुद्दे पर ध्यान देता है। यह कर्ज संकट के समाधान का आश्वासन नहीं प्रदान करता। बावजूद इसके इस मुकाम तक पहुंचने में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन के पसीने छूट गए और दोनों पक्षों ने अपने शरीर में खरोंचें पाईं। मेडिकेयर खर्चो को नियंत्रित करने पर एक ईमानदार बहस (जो कि कर्ज में अर्थपूर्ण कमी के लिए एक अनिवार्यता है) दोनों ही दलों के लिए असहज रहने वाली है। डेमोक्रेट कीमतों पर नियंत्रण के पक्षधर हैं। यह दिशा राशनिंग की ओर जाती है। दूसरी ओर रिपब्लिकन लागत को सीमित करने के पक्षधर हैं। कोई भी पक्ष अमेरिकियों को अपरिहार्य दर्द सहने के लिए तैयार करने में राजनीतिक रुचि लेता नजर नहीं आ रहा है। जैसे-जैसे 2012 के राष्ट्रपति चुनाव करीब आते जा रहे हैं, दोनों दलों के बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट नजर आना तय है।


रिपब्लिकन विजन एक नाटकीय छोटी सरकार का है। वे एक ऐसा संतुलित बजट चाहते हैं जिसमें टैक्स बढ़ाने की जरूरत न पड़े। डेमोक्रेटों का तर्क इससे अलग है, जिसकी व्याख्या ओबामा समय-समय पर करते रहते हैं। वे एक ऐसे संतुलित दृष्टिकोण के पक्षधर हैं, जिसमें नए राजस्व शामिल हों और सामाजिक सुरक्षा, मेडिकेयर तथा सामाजिक कार्यक्रमों की राह पर चला जाए ताकि समाज के गरीब तबके को सुरक्षा का एक ढांचा मिल सके। दोनों पक्ष इस पर जोर देते हैं कि उनका रास्ता ही सही है जिससे मतदाताओं की इच्छा पूरी की जा सकती है। इच्छा एक मजबूत अर्थव्यवस्था का रुतबा फिर से हासिल करने की। ऋण समझौते के साथ अमेरिका ने अपनी क्रेडिट रेटिंग में और अधिक गिरावट की आशंका टाल दी है, लेकिन उसकी प्रतिष्ठा बिखर रही है। अब यह कहा जाने लगा है कि चीन का मॉडल ज्यादा असरदार सिद्ध हो सकता है। ओबामा स्वयं अमेरिका की प्रतिष्ठा में आ रहे परिवर्तन से परिचित हैं। इसकी स्पष्ट स्वीकारोक्ति को छोड़कर ओबामा मिलते-जुलते सभी संकेत दे चुके हैं। इसकी एक झलक उनके इस फैसले से भी मिलती है जिसके तहत अगले सितंबर तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की घोषणा की गई है।

वह बार-बार यह घोषणा कर रहे हैं कि अब समय आ गया है कि हम अपने घर में राष्ट्र निर्माण पर ध्यान दें। अरब जागरण, लीबिया में नाटो सेनाओं की चुनौती के संदर्भ में ओबामा के बयान भी यह इंगित करते हैं कि समय बदल गया है और अमेरिका अब नए मार्शल प्लान या नए युद्ध की योजना नहीं बना सकता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि सच की स्वीकारोक्ति ही नेतृत्व नहीं है। ओबामा के नेतृत्व की परीक्षा है। एक राजनीतिज्ञ अलग तरह के नेतृत्व की उम्मीद के साथ निर्वाचित हुआ था, लेकिन आज उसे किसी तरह का नेतृत्व दिखाने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भंवर में फंसी हुई है और लोगों ने अब ओबामा को दोष देना शुरू कर दिया गया है। वह खुद अब जार्ज बुश को दोष नहीं दे सकते। विश्व में शक्ति का संतुलन भी तेजी से बदल रहा है और वाशिंगटन के हालिया संकट ने इस बदलाव को रेखांकित ही किया है। जापान की हैसियत कमजोर हुई है और यूरोपीय संघ अब पहले के समान एकजुट-मजबूत नजर नहीं आ रहा है। इसका अर्थ है कि चीन सर्वाधिक विश्वसनीय वैश्विक विकल्प के रूप में उभर रहा है।


लेखक हर्ष वी पंत लंदन के किंग्स कालेज में प्राध्यापक हैं


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