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नाकामी की नई बानगी

जागरण मेहमान कोना

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विशाल आकार और अपार क्षमताओं के साथ ही परमाणु क्षमता से लैस भारत खुद को हाशिये पर धकेलने की चीन की रणनीति का जवाब नहीं दे पा रहा है। बार-बार मनमोहन सिंह ने टकराव से बचने के लिए रियायतें दी हैं, जैसे कि भारत के पास युद्ध या तुष्टीकरण के अलावा कोई अन्य विकल्प ही न हो। मनमोहन सिंह की बीजिंग यात्र के दौरान यह कमजोरी उभरकर सामने आ गई। कोई भी चीनी नेता भारत यात्र के साथ ही अपने सदाबहार साथी पाकिस्तान भी जाता है, किंतु मनमोहन सिंह ने बीजिंग यात्र के बाद अपने कार्यक्रम में लंबे समय से लंबित जापान यात्र को शामिल नहीं किया। भारत की चिंताओं की अनदेखी होने के बावजूद मनमोहन सिंह का जोर दोस्ती और सहयोग बढ़ाने पर रहता है। सीमा विवाद का हल न निकल पाने के कारण चीन भारत पर सैन्य दबाव बनाने में कामयाब हो रहा है। हालांकि वह वास्तविक नियंत्रण रेखा को भी मानने से इन्कार कर रहा है। तिब्बत को बांध परियोजनाओं का बड़ा केंद्र बनाने के बाद अब वह भारत पर ही वार कर रहा है। पिछले सप्ताह सरकारी नियंत्रण वाले समाचार पत्र में टिप्पणी की गई कि भारत अरुणाचल प्रदेश में जल परियोजनाओं के माध्यम से इस पर नियंत्रण और कब्जा करने का प्रयास कर रहा है।

देश से क्या कहेंगे मनमोहन


वास्तव में, मनमोहन सिंह की बीजिंग यात्र में किसी भी मूल मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं हुई। प्रस्तावित सीमा सहयोग समझौता जरूर चर्चा में है, जिसमें चीन की पहल पर चीनी सेना द्वारा भारतीय भूभाग में की जाने वाली घुसपैठों पर रोक लगाने, सीमा पर शांति की स्थापना करने और विश्वास बहाली जैसे उपायों पर वचनबद्धता प्रदर्शित की गई है। मनमोहन सिंह एक ऐसे पक्ष की पहल पर होने वाले इस नए समझौते का औचित्य साबित नहीं कर पाए जो पहले से विद्यमान सीमा शांति समझौते का खुलकर उल्लंघन करता रहा है। फिर भी उनके जनसंपर्क अधिकारी नए समझौते की जबरदस्त मार्केटिंग कर रहे हैं और इसे भारत के हित में बता रहे हैं। वे इसकी ऐसी विशेषताओं का बखान कर रहे हैं जो वास्तव में संदेहास्पद हैं। चीन के साथ नई सैन्य हॉटलाइन से क्या भला हो सकता है, जबकि पाकिस्तान के साथ ऐसी ही हॉटलाइन कारगर सिद्ध नहीं हुई है? भारत की कमजोरी इस बात से प्रदर्शित हो जाती है कि चीनी सेना की घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए इसने नियमित सेना के स्थान पर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस तैनात की हुई है। ऐसे में यह प्रावधान कि किसी भी देश की पेट्रोलिंग का पीछा नहीं किया जाएगा, दरअसल चीन के पक्ष में ही जाता है। भारत ने इस साल कई अवसरों पर घुसपैठ के रूप में चीन की आक्रामकता देखी और ऐसे हर अवसर पर नई दिल्ली का जवाब बेहद लचर और चीन का दुस्साहस बढ़ाने वाला नजर आया।

पुरानी राह पर कांग्रेस


यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि चीन के साथ जो समझौता किया जा रहा है वह बुनियादी रूप से चीन के हितों की रक्षा के लिए एक राजनीतिक औजार साबित हो सकता है। यह दूसरे पक्ष को संतुष्ट करने और उसके लिए अवसर पैदा करने का उपक्रम बन गया है। चीनी आक्रामकता के समक्ष नई दिल्ली की सामरिक कमजोरी ने बीजिंग के भूभागीय विवादों के रुख को और कड़ा ही किया है। चीन का फामरूला है कि जो हमारा है वह तो हमारा है ही, जो आपका है उस पर विचार कर लिया जाए। इस प्रकार द्विपक्षीय चर्चा में चीन द्वारा तिब्बत पठार हड़प लेने और वहां दमनकारी शासन चलाने के मुद्दे कभी नहीं उठे। इसके बजाय हमेशा चर्चा का मुख्य बिंदु भारत के नियंत्रण वाले भूभाग पर चीनी दावे रहे हैं। दूसरे शब्दों में भारत-चीन द्विपक्षीय संबंध बीजिंग द्वारा तय की गई शर्तो पर निर्धारित हैं। चीन ने भारत के साथ असंतुलित धरातल पर व्यापारिक संबंध विकसित किए हैं, जिस कारण भारत का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा है। यहां तक कि यह भारत की मूल चिंताओं, जिनमें भूभाग और जल विवाद, सैन्य छापामारी, पाकिस्तान के साथ चीन का सैन्य और परमाणु सहयोग और पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का बढ़ता दखल आदि शामिल हैं, की प्रगति में भी बाधा बन गया है।


जब तक चीन भू विवादों और बांधों पर अपने रवैये में परिवर्तन नहीं लाता तब तक नई दिल्ली को बीजिंग के लिए व्यापार के दरवाजे पूरे नहीं खोलने चाहिए थे। भारत का लचर व्यवहार इस तथ्य से भी स्पष्ट हो जाता है कि जहां चीन भारत के कुछ क्षेत्रों के लोगों के लिए नत्थी वीजा जारी करता है वहीं पिछले सप्ताह ही भारत के मंत्रिमंडल ने चीनी पर्यटकों के लिए वीजा नियमों में ढील देने का प्रस्ताव पेश किया है। वीजा के मामले में भारत का यह रवैया उसके ढुलमुलपन का प्रतीक है।चीन द्वारा मूल मुद्दों को हाशिये पर खिसकाने पर सहमति देते हुए मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से कहा कि दोनों देश गंभीरता और परिपक्वता के साथ तमाम मुद्दों का समाधान निकालने की दिशा में काम कर रहे हैं और इस बात पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है कि दोस्ती और सहयोग के वातावरण पर जरा भी असर न पड़े। चीन द्वारा आरोपित संधि को अपने अधिकारिक दौरे की उपलब्धि के तौर पर प्रदर्शित करना उनके कमजोर मानकों पर भी खरा नहीं उतरता और यह भारत के कूटनीतिक पतन का द्योतक है। इस नए समझौते की पृष्ठभूमि पर गौर करना जरूरी है। लद्दाख के देपसांग क्षेत्र में चीनी सेना के घुस जाने के बाद चीन ने भारत को सीमा सहयोग संधि का मसौदा थमाया था। चीन की सेना को भारत से वापस भेजने में भारत ने बड़ा रक्षात्मक रुख अपनाया और सहमति प्रकट की कि भविष्य में भारतीय सेना इस क्षेत्र में पेट्रोलिंग नहीं करेगी। इसके अलावा भारत सीमा सहयोग संधि पर वार्ताओं के लिए तैयार हो गया, जबकि इससे पहले इस प्रकार के समझौते का विरोध करता रहा था। देपसांग में घुसपैठ ने भारत-चीन के बीच 1993, 1996 और 2005 में होने वाली संधियों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है। 1असल में भारत के देपसांग में 50 सैनिकों की एक छोटी-सी टुकड़ी भेजकर चीन ने बिना खून का एक भी कतरा बहाए भारत पर जीत हासिल कर ली है। एक पराजित राष्ट्र की तरह भारत ने चीन द्वारा थोपे गए समझौते के मसौदे पर केवल अपनी टिप्पणियां और सुझाव दिए। भीरुता से दूसरे पक्ष को दबंगई का प्रोत्साहन मिलता है। नीति में जितना डर होगा, दूसरा देश उतना ही अधिक दबाव डालने लगेगा। भारत बिना तुष्टीकरण और टकराव के चीनी चुनौती से निपट सकता है। चीन की कमजोर नसों को दबाकर भारत उससे फायदा उठाने की स्थिति में आ सकता है। वर्तमान में तो भारत की नीति तुष्टीकरण की राह पर चल रही है। बीजिंग से व्यवहार में मनमोहन सिंह कूटनीति के मूल सिद्धांत-जैसे को तैसा को भी भूल गए हैं। चीन के साथ किया जा रहा नया सीमा समझौता इस बात का जीता-जागता उदाहरण है।

इस आलेख के लेखक  ब्रह्मा चेलानी हैं


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