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साठ साल का सफर

जागरण मेहमान कोना

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A Surya prakash संसद के कामकाज के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर निगाह डाल रहे हैं ए. सूर्यप्रकाश


13 मई को संसद अपनी साठवीं वर्षगांठ मनाएगी। रविवार होने के बावजूद इस दिन संसद की विशेष कार्यवाही चलेगी। संसद के साठवें जन्मदिवस के उत्सव के बीच यह उसके कामकाज, कार्यकुशलता और प्रासंगिकता पर नजर डालने का सही वक्त है। शुरुआत सकारात्मक बिंदुओं से करते हैं। संसद के दोनों सदनों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि ये भारत के विभिन्न वर्गो, समुदायों, जातियों, पेशों, पंथों का पहले से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पहली लोकसभा में करीब 36 फीसदी वकील, 10 फीसदी पत्रकार व लेखक थे और इनमें से अधिकांश प्रभावशाली हिंदू जातियों से संबंध रखते थे। वंचित समूहों के राजनीतिक सशक्तीकरण के कारण पिछले दो दशकों में लोकसभा का संयोजन पहले से कहीं अधिक संतुलित हुआ है। पहली लोकसभा में 112 सदस्य दसवीं पास नहीं थे। 14वीं लोकसभा में यह संख्या घटकर 19 रह गई है। इसी प्रकार पहली लोकसभा में 277 स्नातक, स्नातकोत्तर थे। 14वीं लोकसभा में 428 सदस्यों के पास यह योग्यता है। वंचित वर्गो के राजनीतिक सशक्तीकरण ने राज्य विधानसभाओं का संयोजन भी बदला है और इसका असर राज्यसभा में देखा जा सकता है, क्योंकि राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में विधायकों की प्रमुख भूमिका होती है। ऊपरी सदन में भारतीय समाज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विविधता का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।


संसद में सकारात्मक प्रकृति की कुछ अन्य घटनाओं में कमेटी व्यवस्था की शुरुआत और 1993 में स्पीकर शिवराज पाटिल द्वारा संसद की कार्यवाही का टीवी पर प्रसारण शामिल हैं। विभिन्न विभागों की कमेटियों के गठन से संसद की कार्यकुशलता में सुधार हुआ है और सांसदों की विशेष योग्यताओं का सदुपयोग संभव हुआ है। संसदीय कार्यवाही के टीवी पर प्रसारण ने संसद से परदा उठा दिया है और अब लोग इसका असली रंग देख पा रहे हैं। इससे सांसदों के आचार-व्यवहार में भी सुधार आया है। इन सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ संसद में नकारात्मक घटनाओं की सूची काफी लंबी है। प्रश्नकाल अपनी महत्ता खो चुका है। प्रश्नकाल में भूपेश गुप्ता, इंद्रजीत गुप्ता, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, पीलू मोदी और मधु दंडवते जैसे प्रखर नेता जब सवाल-जवाब पर उतरते थे तो अच्छे-अच्छे मंत्रियों को पसीना छूट जाता था। आज सांसद बिना तैयारी या नैतिक साहस के रस्मअदायगी मात्र के लिए सवाल पूछते हैं। इसी कारण अक्सर उन्हें चुप करा दिया जाता है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव आदि भी बेजान हो चुके हैं। सरकार विपक्ष से इसलिए नहीं घबराती, क्योंकि वह खुद नैतिक धरातल पर नहीं खड़ा है। अगर सांसदों की बात की जाए तो परीक्षा परिणाम निराश करने वाला है।


सांसदों और जनता के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। पांचवें दशक में नारा था-सादा जीवन उच्च विचार। अब यह आदर्श उच्च जीवन कोई विचार नहीं में बदल गया है। सांसद अपने पैसे और रुतबे का प्रदर्शन करते हैं और आम आदमी से कट गए हैं। वे अपनी गाडि़यों पर लाल बत्ती लगाना चाहते हैं, अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने से नहीं हिचकते, संसदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करते, संसदीय कार्यवाही और संसदीय समितियों की बैठक से अधिकांश सदस्य नदारत रहते हैं। यह सूची अनंत है और इसका दुष्प्रभाव संसद की कार्यवाही पर पड़ता है। सार्वजनिक जीवन में मानकों की स्थापना के लिए भारत की संसद ने सांसद एचजी मुद्गल को बर्खास्त कर एक नजीर बनाई थी। मुद्गल ने बांबे बुलियन एसोसिएशन को फायदा पहुंचाने के लिए मुद्दा उठाया था। इसके लिए उन्होंने 2700 रुपये लिए थे, किंतु यह घटना 1951 की है, जब प्रोविजनल पार्लियामेंट कार्यरत थी। हालांकि 1952 में लोकसभा और राज्यसभा का गठन होने के बाद नैतिक मुद्दों पर शिथिलता छाने लगी। शराब के आयात की अनुमति के लिए एक सदस्य द्वारा 20 सांसदों के जाली हस्ताक्षर करने पर संसद मौन रही। बाद में अदालत में उस पर मुकदमा चला और उसे जेल हुई। जन असंतोष को देखते हुए 1990 के दशक में स्पीकर शिवराज पाटिल ने सदस्यों के लिए आचार संहिता का प्रस्ताव रखा था और लोकसभा की विशेषाधिकार समिति को मामला सौंपा था।


दोनों सदनों में आचार कमेटियों का गठन किया गया, किंतु कुल मिलाकर कमेटियां सुसुप्तावस्था में ही रहीं। इस बीच सांसदों के नैतिक मापदंड बराबर गिरते चले गए। समाचार चैनलों द्वारा किए गए दो स्टिंग ऑपरेशनों ने इसकी पोल खोल दी। इनमें से पहला ऑपरेशन सवाल पूछने के लिए सदस्यों द्वारा पैसे वसूलने से जुड़ा था। कुछ सांसद 30 हजार से 1.1 लाख रुपये के बदले संसद में सवाल पूछने के लिए राजी थे। जैसे ही यह टीवी चैनल पर प्रसारित हुआ, जनता हतप्रभ रह गई। इस घटना की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। इसकी रिपोर्ट पर 11 सांसदों को संसद से बर्खास्त कर दिया गया। करीब-करीब इसी समय एक और खुलासा हुआ। एक चैनल ने दिखाया कि चार सांसद सांसद निधि के तहत परियोजना की अनुशंसा के लिए रुपयों की मांग कर रहे थे। एक बार फिर घोटाले की जांच के लिए लोकसभा कमेटी का गठन किया गया और सांसदों को दोषी पाया गया। इन सांसदों को सदन से निलंबित करने की सिफारिश की गई। सदन ने इस रिपोर्ट पर कार्रवाई की। इसी प्रकार एक सांसद कबूतरबाजी में लिप्त पाया गया। उसका भी निष्कासन किया गया। इस लेखा-जोखा का क्या नतीजा रहा? जैसाकि पहले बताया गया है कि 60 वर्षो के दौरान संसद में देश के विभिन्न वर्गो, जातियों को मिलने वाले प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिकरण हुआ है। स्टैंडिंग कमेटियों के गठन से केंद्रीय बजट की संसदीय पड़ताल में सुधार आया है।


कार्यवाही के टीवी पर प्रसारण से संसद जनता के करीब आई है। भ्रष्टाचार में लिप्त सांसदों के निलंबन और निष्कासन से एक हद तक संसद में लोगों की आस्था बची रही है। फिर भी सदन की कार्यवाही में व्यवधान एक नई समस्या बन कर उभरा है, जिसे दूर किया जाना बेहद जरूरी है। संसद का तीस फीसदी से अधिक समय व्यवधान की भेंट चढ़ जाता है। स्वतंत्र नागरिकों द्वारा संसद के दोनों सदनों के कामकाज की पड़ताल वक्त की जरूरत है। पिछले साठ वर्षो में इस प्रकार का कोई परीक्षण नहीं हुआ है। अंतत: चूंकि हमारी संसद की साठवीं वर्षगांठ का अवसर है, हमें सकारात्मक बिंदु पर बात खत्म करनी चाहिए। हमारी संसद 60 साल की हो गई है और अगर अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों को उधार लेकर कहें तो यह न थकी है और न ही रिटायर हुई है।


लेखक ए. सूर्यप्रकाश वरिष्ठ स्तंभकार हैं


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