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मुसीबत बनता तालिबान

जागरण मेहमान कोना

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तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) के सरगना हकीमुल्लाह महसूद का यह बयान कि वह पाकिस्तान सरकार से बात करने को राजी है, लेकिन हथियार नहीं डालेगा, ताकीद करने के लिए पर्याप्त है कि पाकिस्तानी तालिबान से शांति की उम्मीद करना बेमानी है। महसूद के इस बयान के कुछ घंटे बाद ही तालिबान ने पेशावर के सीमांत इलाके जबई में 21 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार अपने मूल इरादे जाहिर कर दिए। वैसे संघर्ष विराम के लिए टीटीपी ने जो रखी थीं, उनसे ही यह स्पष्ट हो गया था कि वह हथियार डालना नहीं चाहता। गौरतलब है कि टीटीपी ने शरिया कानून को लागू करने, अमेरिका से संबंध तोडने, भारत से बदला लेने के लिए फिर से युद्ध पर ध्यान केंद्रित करने और काबुल सरकार के खिलाफ अफगानी विद्रोहियों के युद्ध में दखल न देने की मांग की थी। पाकिस्तान सरकार के पास इन शतरें को निरर्थक बताते हुए बातचीत से इन्कार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था, उसने ऐसा किसा भी। असल में पाकिस्तान सरकार को टीटीपी सरीखे खूंखार आतंकी संगठन से संघर्ष विराम की अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए थी।


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उसने यह वहम पाक सेना के अधिकारियों के इस शिगूफे के बाद पाला कि शीर्ष तालिबानी नेताओं के बीच दरार पड़ गई है। उल्लेखनीय है कि सेना के शीर्ष अधिकारियों ने नेहकीमुल्ला महसूद को ऑपरेशनल कमांडर के पद से हटाकर वली उर रहमान को नियुक्त किया है, जो पाकिस्तान सरकार के साथ सुलह करने के लिए जाना जाता है, लेकिन टीटीपी की ओर से जारी वीडियो पाक सेना के इस दावे को खारिज करता है। वीडियो में हकीमुल्लाह महसूद और वली उर रहमान न केवल साथ बैठे नजर आ रहे हैं, बल्कि यह कहते हुए भी नजर आ रहे हैं कि हमारे बीच फूट पाक सेना का दुष्प्रचार है। हालांकि असलियत में टीटीपी और सरकार के बीच संघर्ष विराम की कोशिश ढोंग के सिवाय कुछ नहीं है। यह किसी से नहीं छिपा है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी तालिबान की मदद करती है और सरकार उन्हें अपना नेटवर्क फैलाने की इजाजत देती है। असल में तालिबान समस्या की जड़ पाकिस्तान के इतिहास में है। पाकिस्तान का निर्माण ही धार्मिक मतावलंबियों की स्थली के तौर पर हुआ है। शुरू से ही वहां के कई इलाकों में धार्मिक कट्टरपंथ काफी ताकतवर रहा है।


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तालिबान एक तरह से उसी धार्मिक कट्टरपंथ का प्रतीक है और यह पाकिस्तान की जड़ों में समाया हुआ है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान ने कभी ईमानदारी से चाहा ही नहीं कि देश से तालिबान या इससे मिलते-जुलते आतंकी संगठनों का सफाया हो क्योंकि तालिबान का हव्वा ही तो देश की अर्थव्यवस्था को चला रहा है। तालिबान का डर दिखाकर पाकिस्तान अब तक अमेरिका से अरबों डॉलर की सहायता ऐंठ चुका है। हालांकि उसकी इस चाल को अब अमेरिका समझ चुका है। उसने पाकिस्तान के दावों पर भरोसा करने की बजाय सीधी कार्रवाई शुरू कर दी है। तालिबान के प्रभाव वाले पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर प्रांत में अमेरिका अब तक 39 ड्रोन हमले कर चुका है, जिनमें कम से कम 274 लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिका की यह कार्रवाई ही पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है। अवाम तो इसका विरोध कर रही है, तालिबान इनसे खासा नाराज है। वह कई बार चेतावनी दे चुका है कि पाक सरकार इन हमलों को बंद करवाए। सरकार कोशिश भी कर रही है, लेकिन अमेरिका कार्रवाई पर अड़ा हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान सरकार और तालिबान के बीच वषरें से कायम भरोसा टूटने के कगार पर है। यह स्थिति घातक है, क्योंकि इसकी प्रतिक्रिया में तालिबान का हिंसक होना तय है। कुल मिलाकर पाकिस्तान सरकार अपने ही बनाए जाल में फंस गई है और उसे बचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है।


लेखक अवधेश आकोदिया स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं



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