Menu
blogid : 5736 postid : 6961

भुखमरी से अधूरी जंग

जागरण मेहमान कोना

  • 1877 Posts
  • 341 Comments

चार साल से केंद्र सरकार प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर दुविधा की शिकार है। यह बिल योजना आयोग से कृषि मंत्रलय और फिर खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रलय के चक्कर काट रहा है, किंतु जैसे-जैसे 2014 का चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे इस विधेयक को कानूनी जामा पहनाने और भूखे लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने के प्रयास तेज होने लगे हैं। इस कानून से भी बाजी पलटने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि खाद्य सुरक्षा बिल उसे फिर से सत्ता में ले आएगा। यह बिल संप्रग-3 का मार्ग प्रशस्त करता है या नहीं, यह तो अलग सवाल है, किंतु असल सवाल यह है कि क्या यह प्रस्तावित बिल भुखमरी और कुपोषण को दूर कर देश में भूखे लोगों की संख्या को बड़े पैमाने पर घटाने में सफल होगा? आखिरकार, एक ऐसे देश में जिसमें भूख से मरने वालों की विश्व में सबसे अधिक आबादी है और जो विश्व भूख सूचकांक में 66वें स्थान पर आता है, खाद्य कानून तभी अपने उद्देश्य पर खरा उतर सकता है जब भूखों की संख्या में बड़ी गिरावट आए।

Read: महिला मुद्दों पर राजनीति


बिल में प्रत्येक लाभार्थियों के लिए पांच किलो चावल, गेहूं और मोटा अनाज क्रमश: 3, 2 और 1 रुपये की दर से देने का वायदा किया गया है। इसका लाभ देश के 67 प्रतिशत लोगों को मिलेगा। गांवों की 75 और शहरों की 50 फीसद आबादी इस योजना से लाभान्वित होगी। 1.31 लाख करोड़ रुपये की लागत वाले खाद्य बिल में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव हैं। इसमें अनुदानित खाद्यान्न का मूल्य हर तीन साल बाद संशोधित किया जा सकता है। मिड डे मील और तीन साल से छोटे बच्चों के लिए घर पर ले जाने वाले राशन के पोषक स्तर को घटा दिया गया है और आवश्यक सुधारों, शोध और विकास के जरिये कृषि पुनरुद्धार पर जोर दिया गया है। इस बिल से उम्मीद जगती है, किंतु यह देखते हुए कि 2004-05 से लेकर 2009-10 के बीच के पांच वर्षो में एक करोड़ 45 लाख किसान खेती छोड़ चुके हैं और विनिर्माण क्षेत्र में 50 लाख लोग नौकरी गंवा चुके हैं, यह स्पष्ट हो जाता है कि हर गुजरते साल में भूखे लोगों की संख्या बराबर बढ़ती जाएगी और साथ ही सरकार का खाद्य सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी। जब तक सरकार देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर लेती तब तक खाद्य सुरक्षा विधेयक के उद्देश्यों को पूरा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा। चूंकि नीति निर्माता 2014 के चुनाव से आगे का नहीं देख पा रहे हैं, इसलिए भुखमरी मिटाने का यह मौका हाथ से फिसलने जा रहा है।


सवाल उठता है कि खाद्यान्न का उत्पादन करने वाले गांवों में इतनी भुखमरी क्यों है? देश का खाद्यान्न कटोरा कहे जाने वाले क्षेत्र में भूखे लोगों की इतनी बड़ी आबादी क्यों मौजूद है? यह समझ से परे है कि पंजाब में, जहां अनाज खुले में सड़ जाता है, दस फीसद लोग भूखे पेट सोने को क्यों मजबूर हैं? वैश्विक भूख सूचकांक में देश की भुखमरी कम करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला पंजाब गैबन, होंडुरस और वियतनाम से निचले दर्जे पर क्यों है? खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाने वाले 22 देशों में खोजी टीम भेजने के बजाय बेहतर होता सरकार देश के भीतर झांकती। यहां उसे उन तमाम सवालों के जवाब मिल जाते जिनकी तलाश में ये देश-देश भटकने जा रहे हैं। इसका जवाब पश्चिम ओडिशा के कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापट की भूख पट्टी में मिल जाएगा। कुछ साल पहले तीन दशक तक भुखमरी का दंश ङोलने वाले बोलांगीर जिले में कुछ गांवों में जाने का मुङो मौका मिला था। इसके बाद से मेरे साथी देश के अनेक ऐसे गांवों में घूम चुके हैं, जो भुखमरी मिटाने के लिए सामाजिक रूप से कारगर शेयरिंग एंड केयरिंग सिद्धांत पर चल रहे हैं। अगर इस पद्धति पर चलकर ये गांव भुखमरी को मात दे सकते हैं तो यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि देश के छह लाख गांवों में से अधिकांश ऐसा नहीं कर सकते।


बोलांगीर और पुणो के कुछ गांवों में लोगों ने परंपरागत आधार पर छोटे-छोटे खाद्यान्न बैंकों की स्थापना की है। गरीब और बेरोजगार लोग इन खाद्यान्न बैंकों से अनाज लेकर अपनी भूख मिटा लेते हैं। उन्हें पर्याप्त मात्र में उधार अनाज दे दिया जाता है, इस शर्त पर कि फसल कटने के समय या फिर काम मिलने पर वे इस अनाज को हल्के-फुल्के सूद समेत चुका देंगे। इन भूखमुक्त गांवों ने शेयरिंग एंड केयरिंग के चक्र से अच्छा खासा खाद्यान्न बैंक तैयार कर लिया है। इसके लिए बस कुछ महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षित करने और कुछ गैरसरकारी संगठनों को सक्रिय करने की जरूरत है। फिर खाद्य सुरक्षा लोगों की जिम्मेदारी बन जाएगी। गांवों को भूख-मुक्त बनाने का एक लाभ यह होगा कि इससे अविश्वसनीय सार्वजनिक वितरण व्यवस्था पर निर्भरता घटेगी और बढ़ती खाद्यान्न सब्सिडी पर अंकुश लगेगा। खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि उद्योग, खनन और निर्यात के लिए कृषि को बलि न चढ़ा दिया जाए। मध्य महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के हिव्रे बाजार के उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि यदि जनता को जन, जल और जंगल पर अधिकार दे दिया जाए तो भुखमरी की समस्या खत्म हो सकती है। 30 हजार रुपये प्रति व्यक्ति आय वाले इस गांव में साठ से अधिक करोड़पति रहते हैं। अगर गांव खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर हो जाएं तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी। तब इसे शहरी गरीबों के लिए लागू किया जा सकेगा। आखिरकार, 6.4 लाख गांवों वाले देश में गांव स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्यक्रम चलाने में कोई ङिाझक नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद तथा संबद्ध मंत्रलय के अधिकारियों ने शायद एक पुरानी चीनी कहावत नहीं सुनी। अगर आप किसी दिन किसी का पेट भरना चाहते हैं तो उसे एक मछली दे दीजिए, किंतु अगर आप उसका पेट हमेशा के लिए भरना चाहते हैं तो उसे मछली पकड़ना सिखाइए।


किसी भी भूखे देश के लिए इससे अधिक आपराधिक कृत्य कुछ नहीं हो सकता कि वह अपने खाद्यान्न का निर्यात करे। दुर्भाग्य से इस बात से कोई चिंतित नहीं है कि देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता गिरकर 1943 के बंगाल अकाल के बराबर पहुंच गई है। इस साल सरकार ने 90 लाख टन चावल और 95 लाख टन गेहूं का निर्यात किया है। कोई भी समझदार सरकार करोड़ों भूखे लोगों के होते हुए यह फैसला कैसे कर सकती है। भूख से लड़ाई केवल खाद्यान्न के वितरण के बल पर ही नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन, भंडारण, ग्रामीण विकास और व्यापार नीतियों के सम्मिलित बल पर लड़ी जा सकती है। सरकार को सस्ते आयात के माध्यम से किसानों को बर्बाद करने से बचना चाहिए। दुर्भाग्य से, खाद्यान्न बिल में इन सब पहलुओं पर प्रावधान नहीं किए गए हैं।


इस आलेख के लेखक देविंदर शर्मा हैं


Read:तंग गलियों का जिंदगीनामा


Tags: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल, खाद्य कानून, खाद्यान्न बिल , Food Security Bill, Poverty Line, Poverty Line in India


Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *