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नए मोड़ पर लोकतंत्र

जागरण मेहमान कोना

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प्रजातंत्र की खूबसूरती यही है कि यह जैसे-जैसे परिपक्व होता है वैसे-वैसे संस्थाओं की भूमिका, कानून का राज, व्यवस्था में सुचिता, आम आदमी की तर्कशक्ति बेहतर होने लगती है। बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र तथा कांग्रेस के सांसद रशीद मसूद को अलग-अलग मामलों में मिली अदालत से सजा देश की न्यायिक व्यवस्था ही नहीं, लोकतंत्र पर भी आम जनता के टूट रहे भरोसे को नई जान देने वाली है। कल तक लोकतंत्र का जो परिदृश्य अंधकार में डूबा नजर आ रहा था उसमें उम्मीद की एक नई किरण उभरती दिख रही है। समग्र आंदोलन की कोख से उपजे सामाजिक न्याय की ताकतों के बल पर सत्ता में आए लालू यादव को यह लगा कि अब प्रजातंत्र और उसकी संस्थाएं या कानून और उसके अभिकरण उनके दास हैं। उन्होंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि जन चेतना के वशीभूत कोई न कोई संस्था तनकर खड़ी होगी। उनको लगता रहा कि साझा सरकार के युग में केंद्र में सत्ता चला रहीं सोनिया गांधी को भी संसद में समर्थन चाहिए, लिहाजा सीबीआइ कितनी सक्रिय होगी। कुछ काल के लिए हुआ भी यही।

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आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआइ अपील में नहीं गई। लालू यादव भूल गए कि देश में अन्य संस्थाएं भी हैं, उन संस्थाओं को चलाने वाले लोग हैं जो तनकर खड़े हो जाएंगे। फिर कांग्रेस भी एक डूबती नाव पर क्यों सवार होगी? वह कोई दूसरी मजबूत नाव देखेगी। 1यही वजह है कि चारा घोटाले में चारा ढोने के नाम पर ट्रक भाड़े का पैसा भ्रष्ट लालू-शासन के लोग हड़प रहे थे और इतना भी ध्यान नहीं दिया कि जो ट्रक का नंबर दिया है वह स्कूटर का निकलेगा। दरअसल वह मानसिकता महत्वपूर्ण है जिसके तहत यह घोटाला किया गया। आज देखने पर लगता है कि लालू प्रसाद ने पूरे सिस्टम को, संवैधानिक व्यवस्था को, कानून को ठेंगे पर रखा, यह मानते हुए कि वह अजेय हैं और रहेंगे। लालू की सजा का एक और भी पहलू है। सत्ता पर काबिज नेताओं, उनके दलालों व अफसरों का गठजोड़। सत्ता के नशे में अफसर भी यही समझते रहे कि वे तो हाथी के कंधे पर बैठे हैं और यह हाथी कभी मरेगा नहीं। सजा से पूरे देश भर में संदेश गया कि नेता के साथ अगर अफसर अपेक्षित कानूनी सीमा के आगे बढ़ा तो इस गठजोड़ की परिणति भ्रष्टाचार में होगी और नेता अफसर को बलि का बकरा बनाएगा।1 ऐसा नहीं था कि इस घोटाले का राजफाश होने के बाद लालू ने इसे दफन करने की कोई कोशिश छोड़ी हो। 1995 में जब नियंत्रक एवं लेखा महापरीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट सामने आई तो जैसा आमतौर पर होता है विधानसभा में उसे नजरअंदाज कर दिया गया। वित्त विभाग ने इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए सारे कलेक्टरों को चिट्ठी लिखी कि वे जांच करें कि क्या फर्जीवाड़ा करके पैसा ट्रेजरी से निकाला जा रहा है। चाईबासा के उपायुक्त अमित खरे ने छानबीन में जो पाया वह चौंकाने वाला था। पूरे राज्य में सैकड़ों करोड़ रुपये फर्जी रूप से निकालने का मामला उजागर हुआ। यह भी पता चला कि यह सब लालू के काल में ही नहीं, जगन्नाथ मिश्र के काल से ही चल रहा था। आइएएस अधिकारी अमित पर दबाव पड़ना शुरू हुआ। तबादले किए गए, तनख्वाह रोकी गई, पिता के मरने पर भी छुट्टी रद्द की गई। सीबीआइ जांच की सिफारिश तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने ठुकराई। बहरहाल हाईकोर्ट ने सीबीआइ जांच के जब आदेश दे दिए तो जो सीबीआइ का एसपी जांच कर रहा था उसे उसके डीआइजी ने धमकाया। गठबंधन की राजनीति लालू के इर्द-गिर्द फिर घूमने लगी। इस बीच लालू के खिलाफ चारा घोटाले का मामला सीबीआइ ने अपने एक ईमानदार और सक्षम संयुक्त निदेशक यूएन बिस्वास को सौंप दिया। बिस्वास पर हमले की साजिश की गई, डराया गया, लुभाया गया।

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हाल के दौर में अचानक जब सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 8 (4) को रद्द करते हुए कहा कि संसद या विधायिका का सदस्य अगर दो साल से अधिक सजा वाली धारा में सजा पाता है तो वह सदस्य महज इसलिए नहीं रहेगा कि वह चुना गया है और ऊपरी अदालत ने उसकी अपील मंज़ूर कर ली है। सभी राजनीतिक दल डर गए और एक स्वर में इस आदेश के खिलाफ कानून बनाने पर राज़ी हो गए, लेकिन देश में कई बार शर्म का झीना आवरण बड़ी से बड़ी बेशर्म हरकत पर भारी पड़ता है। यही हुआ। संसद में यह बिल स्थायी समिति के पास चला गया, कानून नहीं बन सका, लेकिन लालू का दबाव सरकार पर पड़ता रहा। केंद्र सरकार को भी अगले चुनाव में लालू की जरूरत थी। लिहाजा शासन के लिए बनी शर्म-संकोच की सभी हदें पार करते हुए मनमोहन सरकार ने अध्यादेश को राष्ट्रपति के पास भेजा। राष्ट्रपति को भी यह बेशर्मी खटकी। इसी बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नैतिकता जगी, और उन्होंने तीसरी आंख खोल दी। बिल भस्म होने लगा। कहने का मतलब यह है कि लालू भ्रष्टाचार की इस यात्र में कोई मददगार सीबीआइ का डीआइजी स्तर का अधिकारी मिला तो कोई ईमानदार आइजी स्टार का अधिकारी यूएन बिस्वास। कोई प्रधानमंत्री मित्र मिला तो कोई सुप्रीम कोर्ट बेंच इंसाफ की तराजू थामे दिखी। सरकार का कभी पूरा मंत्रिमंडल मददगार मिला तो कोई उसी सत्तापक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का सबसे ताकतवर व्यक्ति सब बेशर्म हरकतों पर अपने ही लोगों पर लानत मलानत करता हुआ सत्य के पक्ष में इस भाव में खड़ा हुआ कि पार्टी का भविष्य कुछ भी हो, भ्रष्टाचारी को बचाने का यह सरकारी नाटक नहीं होने दूंगा।

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इस आलेख के लेखक एनके सिंह हैं

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