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देश के ऊंचे नीचे लोग!

aaina

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यदि लोगों में आमचर्चा है कि गोरे अंग्रेज देश से गये तो काले अंग्रेज शासक बन बैठे और कुछ नहीं बदला, तो उचित ही है, क्योंकि व्यवस्था और उसके तौर-तरीके वही हैं. उच्च, सभ्रांत नागरिक सर्व शक्तिमान है और निम्न-निर्धन, वंचित की आवाज कोई सुनने वाला नहीं. निश्चित ही ये शहीदों के सपनों का भारत नहीं है.
अभी संसद में फाईनेंस बिल पारित हुआ. अब राजदलों को विदेशों से मिलने वाले चंदे की जांच नहीं होगी. एनपीए वाले हजारों करोड़ के कर्जदार, डिफाल्टर पूंजीपतियों और उनके गारंटर से वसूली नहीं होगी. मंदिरों में जमा भक्तों के द्वारा चड़ाए गये लाखों-करोड़ों का कोई हिसाब किताब नहीं होगा न ही इस धन का उपयोग देश के विकास में किया जायेगा.
सांसद-विधायक आयकर के दायरे से बाहर रहेंगे. इनको एक बार चुने जाने पर आजीवन पेंशन मिलेगी. जनप्रतिधियो के निर्वाचन के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं होगी ।
         तस्वीर के दूसरे पहलू को देखें तो किसान मजदूर या आमजन के छोटे-मोटे कर्ज जमा न होने पर जलील ही नही आत्महत्या तक करने को मजबूर किया जायेगा।सरकारी/ निजी छेत्र के कर्मचारी -श्रमिक को मिलने वाले वेतन के साथ समस्त भत्तों पर भी आयकर देय है ।नये प्रावधान के तहत उनको पैशन भी नहीं है ।ठेकेदारी प्रथा श्रमिकों  का चूस रही है।बेरोजगारी का संकट विस्फोटक स्थिति में है।आमजन पर टैक्स- टैक्स के मकड़जाल का शिकंजा कसता जा रहा है ।     
         हजारों करोड़ के भारी भ्रष्टाचार के खुलासे से बैंको की विश्वसनीयता तक भंग हुई है।-और तो और इन भ्रष्टाचारियों द्वारा कानून को धता बताकर विदेश भाग जाने से न्याय ,कानूनी एजेंसियों की साख भी कमजोर हुई है ।  नागरिकों के मन में विश्वास घर करता जा रहा है कि देश में लोकतंत्र नहीं अपितु गणमान्य तंत्र है,जो गणमान्य हैं वे हर बंदिश से परे हैं।आमजन और गणमान्य की हैसियत में जमीन आसमान का फर्क है ।गणमान्य ही देश के मालिक है और उनसे कौन हिसाब मांगेगा?नागरिक का धर्म है वोट देना बस,गणमान्य का देश के लिए कोई धर्म नहीं है ।

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