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कभी कभी मीनारें भी झुका करती हैं

Idhar udhar ki

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कभी कभी मीनारें भी झुका करती हैं
ब्रिटेन में लॉकडाउन एक बार फिर से लगा दिया गया है।वहां कोरोना नए रूप में लौट आया है। वहीं चीन के वुहान में जिंदगी फिर से सरपट दौड़ने लगी है। निराशाओं और आशाओं के भंवर में पूरा साल तैरता रहा। अब गुजरने को है। यकीनन दुनिया ने इस वर्ष बेहद निराशाजनक दौर देखा है।बेबसी व लाचारी देखी है।अपनों से दूर रहकर देखा है।हमारे देश ने भी विभाजन के बाद सबसे बड़ा पलायन देखा है। कोरोना बीमारी से उपजे हालात पर फिल्मकार मधुर भंडारकर इंडिया लॉकडाउन नाम की फ़िल्म बनाने जा रहे हैं।काश इरफान खान जिंदा होते है,तो आम आदमी के दर्द की झलक उनकी आंखों से बखूबी बयाँ होती।

खुशी इस बात की है कि बहुत कम समय में वैक्सीन बना ली गयी है। कुछ देशों में वैक्सीनेशन शुरू हो चुका है, कुछ में इसकी तैयारियां अपने अंतिम पड़ाव पर हैं। निसंदेह इसको बनाने वालों ने कमाल किया है। कोई भी सृजन शून्य से शुरू किया जाता है,इसके लिये निराशा हताशा कोई मायने नहीं रखती है। गोयाकि अंधेरे में रहकर ही टटोल टटोलकर कर आगे बढ़ा जाता है। वैसे घुप्प अंधेरे में लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से,आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो जाया करती हैं।नैराश्य में डूबकर सृजन के गीत लिखे जाते हैं।

इटली में जब प्लेग फैला तो कुछ पुरुष और कुछ महिलाएं गुफा में रहने चले गए।समय व्यतीत करने के लिये प्रत्येक सदस्य को एक कहानी सुनाना पड़ती थी। इस तरह से महान ग्रन्थ डेकामेरॉन की रचना हुई। इसमें लिखी कहानियां इंसान को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिये गजब का माद्दा देती हैं। ऐसा ही कुछ ब्रिटेन में हुआ,प्लेग फैलते ही कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के बंद होने का नोटिस महान वैज्ञानिक न्यूटन को गेट पर लटका मिला,पढ़कर वह घर नहीं लौटे,वहीं एक सेब के पेड़ के नीचे लेट गए।सेब टपकने के साथ ही लॉ ऑफ ग्रेविटी ने जन्म लिया। एक तरफ दुनिया डर के साये में जी रही थी।वहीं दूसरी ओर एक महान अविष्कार अपना आकार ले रहा था।जो दुनिया की किस्मत बदलने वाला था।

हताशा की सख्त सीमेंट नुमा चादर का सीना चीरकर उम्मीद के बीज का अंकुरण होता है।जिंदगी स्वभाव से विद्रोही होती है,किसी किस्म के बंधन उसे नागवार गुजरते हैं।तमाम रास्ते बंद होने पर भी वह अपना रास्ता खुद ब खुद बना ही लेती है।वैसे जो रास्ते मंजिल तक पहुंचाने में नाकाम रहते हैं,उन्हें बदल देना या यू टर्न लेना ही बेहतर रहता है। प्रकृति भी हमें यह सीख देने में पीछे नहीं रहती है। ख़ाकसार के विद्यालय में एक कदम्ब का पेड़ लगभग 18-20साल पुराना होगा। इसने अपना रास्ता कुछ अलग ही अंदाज में बनाया है क्योंकि यह एक घने पीपल के दरख़्त की छाँव में पनपा है।इसे जहाँ जैसी जगह मिली उसी दिशा में बढ़ता चला गया भले ही इन सब के लिये उसे झुकना पड़ा वह झुका भी। इस बात से वाकिफ कि यदि सीधा खड़ा रहेगा तो कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा अपना मुकाम नहीं हासिल कर पायेगा। वह एक कामयाब व मजबूत पीपल की छत्रछाया में है,उसे इसी हालात में आगे बढ़ना होगा।

उसने झुकना पसन्द किया और झुककर ऐसे बाहर निकला कि पीपल को भी पीछे छोड़ दिया।आश्चर्य की बात ये है कि आज इसकी कुछ शाखाएँ पीपल से भी ऊपर हैं। कभी कभी सीधे रास्ते पर चलकर मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता है।जिंदगी हमें टेढ़े मेढ़े रास्तों पे चलने का इशारा भी करती है।पर हम ही सीधे रास्ते पर चलने के चक्कर में जहां के तहाँ बैठे रह जाते हैं। दुनिया बहुत आगे निकल जाती है। रण जीतने के लिये कभी कभी रण को छोड़ना भी पड़ता है,यकीनन कदम्ब ने यह सीख उसके चाहने वाले श्रीकृष्ण से जरूर ली होगी।

ऐसे ही महान शिवाजी और तानाजी ने भी परम्परागत युद्ध से हटकर एक अलग ही युद्ध शैली ईजाद की। औरंगजेब के घने दरख़्त की तरह छाए मुगल साम्राज्य को खोखला कर एक मजबूत मराठा साम्राज्य की नींव रखी। . .खैर कभी कभी मीनारें भी झुका करती हैं झुककर इतिहास ही रच डालती हैं…ये बात अलग है हुक्मरानों को इसे समझने में अक्सर देर हो जाया करती है।

मुनव्वर राणा सही फरमाते हैं-
जो हुक्म देता है, वो इल्तिजा भी करता है, ये आसमान कहीं पर झुका भी करता है।

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्‍य की पुष्टि नहीं करता है।

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