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चुनावी दोहे

Parivartan- Ek Lakshya

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सिंहासन की चाह में नेता भए अधीर
मंदिर मंदिर घूमते माथे मले अबीर .

गुंडे भूले चौकड़ी नाकों पड़ी नकेल
जुगत भिड़ानें घूमते कैसे पहुंचे जेल .

अच्छी छवि ढूंढत फिरे दल दल के दलवीर
फिर भी नाप न दे रहे नेता कुबड़े वीर .

आग लगे की एकता बाढ़ चढ़े का मेल
अंधे लंगड़े बाघ मृग भय बस खेलत खेल .

सुनी मुनादी ठोंककर जनता देगी वोट
चैन गई चिंता जगी , लगी कलेजे चोट .

खींच जनेऊ कान तक माथे मले भभूत
जनता को फुसला रहे ये कपटी अवधूत .

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