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विकास का रथ

Parivartan- Ek Lakshya

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नहीं
तुम नहीं सोच सकते
क्यों ढोते हो तुम
पीढ़ियों का बोझ
जब क़ि सारी दुनियां
या तो है मूक
या नहीं त्यागती
अँधेरों का लोभ ।
तुम कभी हीं सोचते

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