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सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी

यात्रा

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” सबकुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी/ सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी “।
बेशक शैलेन्द्र साहब ने अपने समकालीन लोगों को दुनियादारी के घोडे पर सवार हो, सरपट दौडते देख कर ही ” अनाड़ी ” फिल्म के लिए यह खूबसूरत गीत लिखा हो और कहीं न कहीं अपने गैरदुनियादार होने की टीस को भी गहरे महसूस किया हो । लेकिन आज शैलेन्द्र साहब जिंदा होते तो शायद यह कहते – ” हम हैं सबसे अच्छे जो न सीखी दुनियादारी ”  यकीनन कहते।

 

 

सच भी है कि अगर आज हम उदास, परेशान और दुखी हैं तो इसलिए कि कुछ ज्यादा ही दुनियादार हैं । हमारी महत्वाकांक्षाएं बेलगाम हैं, आकाश छूते सपनें हैं , और छोटी सी जिंदगी मे सबकुछ पा लेने की हसरतें। जिस दुनियादारी मे रिश्तों का कोई वजूद न हो, प्यार पर भी फरेब की चादर हो, दोस्त महज एक ” कांटेक्ट नम्बर ” और दोस्ती इस्तेमाल की चीज बन कर रह जाए, वहां खुशियों की तलाश का मतलब सूखे तपते रेगिस्तान मे सागर की तलाश से ज्यादा और कुछ नही।

 

 

ये दुनियादारी के सितम ही तो हैं जो आंखों मे आंसु तो देते हैं लेकिन रोने के लिए कोई कंधा नही । यह दुनियादारी ही तो है जो कामयाबी के सपने तो दिखाती है और नाम व शोहरत के आकाश मे छा जाने की उमंगे तो भरती है लेकिन जब तिनकों के मानिंद सपने बिखरते हैं तो कहीं कोई फैली हुई बांहें नही दिखाई देतीं । इस दुनिया की दुनियादारी ने न जाने कितनों को ऐसे मोड पर खडा किया जहां से वह दुनिया को ही अलविदा कह गये ।

 

 

 

लेकिन शायद यही तो है जिंदगी का तिलिस्म , जो अपने पास है उससे लाखों गिले शिकवे और जो नही है उसे पा लेने की चाह । अजीब है मौजूदा दौर की जिंदगी और इस जिंदगी के रंग । बहरहाल इतना जरूर है कि आज दुनियादारी मे उलझे दुनियादारों की जिंदगी को देख कर शैलेन्द्र साहब व राजकपूर साहब को अपने गैरदुनियादार होने का दुख न सालता और वह यह जरूर कहते ‘ अच्छा है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी ।

 

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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