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क्रेजी किया रे….

Anubhav

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एक शक्ल के दो व्यक्ति कई बार मिल जाते हैं। ऐसा ज्यादातर जुड़वां भाई या जुड़वां बहनों में देखा जा सकता है। फिर भी कद-काठी, आदत से दोनों में अंतर कर पाना आसान होता है। कई बार दोनों की शक्ल ऐसी हो कि अंतर करना भी मुश्किल पड़ जाए तो शायद पहचान करने में पापड़ बेलने पड़ सकते हैं। फिर भी इंसान ऐसे हमशक्लों को पहचान ही लेता है। वैसे तो फिल्मों में होता है कि एक शक्ल के दो व्यक्ति को जब कोई पहचान नहीं सका तो बाद में पालतू जानवर ही अपने मालिक को पहचानता है। जानवर तो सुंघकर मालिक को पहचान लेते है। इसके ठीक उलट एक शक्ल वाले दो जानवरों के बीच भेद करना हो तो शायद काफी मुश्किल हो सकता है। क्योंकि बेजुबान तो यह भी नहीं बता सकता कि असली कौन है या नकली कौन। ऐसे में कोई क्रेजी हो तो क्या कहने।
एक पुलिस के अधिकारी के घर में पालतू कुत्ते का नाम क्रेजी था। लेबराडोर प्रजाति के इस कुत्ते का रंग काला था। क्रेजी की नटखट हरकतों का सुबह से लेकर शाम तक घऱ में कोई न कोई जिक्र जरूर छिड़ा रहता। साहब के साथ ही साहब के बेटे ने क्रेजी को सिर चढ़ा रखा था। मैडम की तो वह सुनता ही नहीं था। इस पर मैडम क्रेजी से कुछ चिढ़कर रहती थी। देहरादून की एक कालोनी में इंस्पेक्टर साहब किराए के मकान में रह रहे थे। एक दिन मैडम ने क्रेजी को किसी बात पर डंडा दिखा दिया, जिससे क्रेजी रुष्ट हो गया। घर का गेट खुला देककर चुपचाप क्रेजी घऱ से खिसक गया। पहले इंस्पेक्टर के बेटे ने क्रेजी को घर के आसपास तलाश किया। फिर भी जब उसका पता नहीं चला तो उसने अपने पिता को इसकी रिपोर्ट मोबाइल से दी। पिता ने कहा कि घर के आसपास गलियों के कुत्तों के साथ खेल रहा होगा। बेटे ने बताया कि चारों तरफ तलाश कर लिया है। कहीं पता नहीं चल रहा है। लगता है कि किसी ने चोरी कर लिया। थानेदार का कुत्ता कौन चोरी करेगा। किसी को बेमौत मरना है। यही सोचकर इंस्पेक्टर साहब गरजे और कहा-मैं कुछ सिहापियों को घर भेज रहा हूं। वे कुत्ता तलाशने मे तुम्हारी मदद करेंगे।
इंस्पेक्टर साबह का फरमान मातहत कैसे नकारते। जो सिपाही चोर व बदमाश की तलाश में भटकते थे, वे साहब के क्रेजी की तलाश में जुट गए। नतीजा शून्य ही निकला। क्रेजी का कोई पता नहीं चला। कई दिन खोज चली, बाद में यह मान लिया गया कि अब क्रेजी का मिलना मुश्किल है। जिस तरह अपराधी काफी प्रयास के बाद भी नहीं मिलता तो पुलिस फाइनल रिपोर्ट लगाकर केस बंद कर देती है। यही हाल क्रेजी की खोज का भी हुआ। एक माह कर सभी इस आस में थे कि क्रेजी मिल जाएगा। धीरे-धीरे उसके मिलने की उम्मीद धूमिल पड़ गई। उसकी खोज भी बंद कर दी गई।
क्रेजी के खोने के ढाई माह बाद एक घटना घटी। इंस्पेक्टर साहब का बेटा रोहित मोटरसाइकिल से किसी दोस्त के घर जा रहा था। रास्ते में उसे क्रेजी की शक्ल का एक कुत्ता दिखा। रोहित रुका और इस उम्मीद से कि कहीं यह क्रेजी तो नहीं उसने कुत्ते को पुकारा…. क्रेजी। कुत्ता भी उसकी तरफ देखने लगा। दोबारा पुचकारने पर कुत्ता रोहित के निकट आ गया। यह क्रेजी ही तो था। जो ढाई साल का था। वही हरकत, वही लाड-प्यार दिखाने की उसकी आदत। हां क्रेजी मिल गया। रोहित खुश हुआ और कुत्ते को पुचकारते हुए अपने पीछे आने को कहा। आगे-आगे रोहित और पीछे-पीछे यह क्रेजी। रोहित उसे घर लाया। घऱ में सभी खुश थे कि जो काम पुलिस का तंत्र नहीं कर सका वह रोहित ने कर दिखाया। अबकी बार मैडम ने भी क्रेजी को खूब दुलारा। शायद वह रुठा न हो। मैडम को क्रेजी कुछ मैला लगा तो उसे शैंपू से नहलाया गया। फिर क्रेजी को पशु चिकित्सक के पास ले जाकर वे टीके लगाए गए जो लगने बाकी थे। खोने के बाद जब क्रेजी दोबारा घर आया तो किसी को यह शक नहीं हुआ कि वह क्रेजी नहीं है। उसकी सारी आदतें पहले जैसी ही थी।
क्रेजी के मिलने के करीब पंद्रह दिन बाद इंस्पेक्टर की नजर एक और ऐसे कुत्ते पर पड़ी जो एक चारदीवारी के भीतर उछलकूद मचा रहा था। यह चारदीवार उनके घर के निकट ही थी, जो सैन्य एरिया की थी। ऊंची दीवार पर सड़क की तरफ जो गेट था, उसी के भीतर उसे वह कुत्ता नजर आया जो क्रेजी की ही शक्ल व प्रजाति का था। उन्हें लगा कि कहीं यही तो क्रजी नहीं। कहीं भूलवश रोहित दूसरा कुत्ता घर ले आया। यही क्रेजी हो सकता है। क्योंकि यह घऱ के ही पास चारदीवारी में कैद है। इस फौजी एरिया का मुख्य गेट ही अक्सर खुलता था, जो उनके घऱ से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था। पिछला गेट बंद रहता था, उसकी दूरी घर से मुश्किल से सौ मीटर थी। उन्होंने इस कुत्ते को भी क्रेजी-क्रेजी पुकारा तो वह पिछले गेट के पास सामने खड़ा हो गया और दुम हिलाने लगा। इंस्पेक्टर को लगा कि यही क्रेजी है। 22 साल के रोहित को अपने कुत्ते को ही पहचानने में कैसे गलती हुई, वह यह नहीं समझ सके।
इंस्पेक्टर साहब सैनिक एरिया में मुख्य गेट से पहुंचे। वहां मौजूद फौजियों से उन्होंने कुत्ते के बारे में पूछा। फौजी ने बताया कि यह कुत्ता तो पिछले ढाई माह से उनके पास है। पहले तो काफी दुबला था, अब मोटा भी हो गया। इंस्पेक्टर साहब ने जब क्रेजी को पुचकारा तो वह ठीक उसी तरह उनसे लिपटने लगा जैसे उसकी आदत थी। वह कार में बैठाकर इस क्रेजी को घर ले आए। एक घर में एक शक्ल के दो कुत्ते और दोनों क्रेजी। आवाज दो तो दोनों सामने खड़े हो जाएं। दोनों एक दूसरे पर गुर्राते कि मानो दूसरा नकली हो। कुत्तों को आपस में लड़ता देख इंस्पेक्टर का परिवार परेशान हो गया। एक शक्ल के दो आदमी हो तो उसे कुत्ता पहचान सकता है, लेकिन कुत्ते को कौन पहचाने कि कौनसा असली क्रेजी है। दो कुत्ते पालना भी मुश्किल है। मंहगाई में बजट उनकी परवरिश में ही बिगड़ जाएगा। पर किस क्रेजी को घर से बाहर करें यह किसी को नहीं सूझ रहा था। डर यह था कि कहीं असली क्रेजी बाहर न हो जाए। मैडम कहती जो बाद में मिला वही क्रेजी है। रोहित कहता कि जो पहले मिला वही क्रेजी है। कोई तय नहीं होने से दोनों क्रेजी ही मौज कर रहे थे।
होली आई और मैडम ने घर में गुजिया बनाई। दोनों क्रेजी मैडम के सामने कीचन के बाहर बैठे थे। मैडम ने दो गुजिया उठाई और एक-एक दोनों के आगे उछाल दी। बस यहीं भेद खुल गया। एक क्रेजी गुजिया एक झटके में चट कर गया, वहीं दूसरा उसे सूंघ कर अलग हट गया। मैडम को याद आया कि क्रेजी तो गुजिया बड़े शोक से खाता था। मैडम खुशी से चिल्लाई- रोहित, जिस क्रेजी को तुम लाए, थे, वह हमारा क्रेजी नहीं है। उसे अपने दोस्त को दे दो।
भानु बंगवाल

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