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कोविड संकटकाल में बच्चों का संरक्षण

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डा. बर्ना गांगुली एवं डा.बख्शी अमित कुमार सिन्हा, सहायक प्राध्यापक, सेन्टर फाॅर इकोनाॅमिक पाॅलिसी एंड पब्लिक फाइनांस, आद्री

बच्चे भविष्य की पूंजी हैं। बच्चों पर आज जितना निवेश होगा, वह समाज और राष्ट्र के लिए उतना ही फलदायी होगा। चीन प्रति परिवार तीन बच्चे पैदा करने का प्रस्ताव ला रहा है, क्योंकि उसकी बहुत बड़ी आबादी बूढ़ी होती जा रही है। यही हालत कमोबेश विकसित देशों की भी है जो अपनी बूढ़ी हो रही आबादी को लेकर चिंतित हैं। वहीं भारत बच्चों के मामले में धनी देश है। बिहार, भारत का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यह राज्य 4.98 करोड़ बच्चों का घर है जो कि 10.4 करोड़ आबादी का लगभग आधा हिस्सा (48%) है।

भारत की 11% बच्चों की आबादी के साथ, बिहार देश की बाल आबादी में दूसरे स्थान पर है। 0-18 आयुवर्ग के कुल 47.21 करोड़ बच्चों में से 34.36 करोड़ (72.8%) ग्रामीण क्षेत्रों में और 12.85 करोड़ (27.2%) शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। योजना आयोग के 2011-12 के अनुमानों के अनुसार, 320.4 लाख बिहार की ग्रामीण जनसंख्या (34.1%) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है और ग्रामीण बिहार में रहनेवाले 72.8% बच्चे अधिकांश गरीबी में रहते हैं। साथ ही, बिहार 31287 रु. प्रति व्यक्ति आय के साथ अन्य राज्यों में सबसे निचले स्थान पर है और इसीलिए बिहार में बच्चे एक संवेदनशील वर्ग हैं।

वर्तमान में हमारा देश कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा है और पिछली बार के विपरीत इस बार बच्चे भी इस महामारी से संक्रमित हो रहे हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार 11 जून, 2021 तक भारत में 0-10 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों में कोविड-19 से होनेवाली कुल मौतें 9.3 लाख (3.36%) और 11-20 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों में कुल मौतें 23.3 लाख (8.41%) दर्ज किया गया है।

बच्चों में महामारी से संबंधित मृत्यु को कम करने के लिए 13 मार्च, 2020 से स्कूलों को बंद कर दिया गया। परंतु बच्चों के विकास में शिक्षा एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए स्कूली शिक्षा जारी रखने के लिए आपातकालीन उपाय के रूप में सभी कक्षाओं में ऑनलाइन शिक्षण की व्यवस्था की गई। दूसरी ओर प्रारंभिक विश्लेषणों में यह देखा जा रहा है कि राज्य की सामाजिक-आर्थिक असमानताएं ऑनलाइन शिक्षण को प्रभावित कर रही हैं। निम्न आय वर्ग में स्मार्ट फोन और कंप्यूटर की अनुपलब्धता, अस्थिर इंटरनेट कनेक्शन, प्रौद्योगिकी कौशल तथा बिजली की कमी स्कूली बच्चों के सामने व्यापक चुनौतियां प्रस्तुत कर रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार बिहार में सिर्फ 8.7% बच्चे शिक्षा के लिए अपने मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं जबकि केवल 28.4% के पास माता-पिता के मोबाइल तक पहुंच है और 69.7% साधनहीन अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के नुकसान से चिंतित हैं।

हालांकि सरकार द्वारा विभिन्न पहल जैसे 70,000 से अधिक सरकारी स्कूलों के VI से XII कक्षा के लिए मोबाइल ऐप ‘उन्नयन: मेरा मोबाइल मेरा विद्यालय’ का विकास, कक्षा I से XII के छात्रों के लिए ऑनलाइन किताबें, ‘विद्यालयवाहिनी’ ऐप के माध्यम से स्कूली छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई गई है। विशेषकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों के लिए ऑल इंडिया रेडियो द्वारा ऑडियो प्रसारण तथा दूरदर्शन द्वारा ‘मेरा दूरदर्शन मेरा विद्यालय’ कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है।

लॉकडाउन खासकर गरीब बच्चों के भोजन और पोषण को प्रभावित किया है जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार में 6-23 महीने के केवल 11% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिलता है और 5 साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे कुपोषित, अल्पविकसित और कम वजन के हैं। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (2016-18) के अनुसार बिहार में प्रतिदिन 100% बच्चे (5-9 वर्ष) अनाज का, 42.8% दूध उत्पादों का और केवल 17.3% मांसाहारी भोजन का सेवन करते हैं। कोविड-19 से वर्तमान स्थिति में अतिसंवेदनशील परिवारों की आय प्रभावित हो रही है जिस कारण बच्चों में कुपोषण बढ़ सकता है।

लॉकडाउन की इस स्थिति के दौरान, एकीकृत बाल विकास सेवा निदेशालय ने गर्भवती और स्तनपान करानेवाली माताओं, 6 महीने से 3 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों और 3 से 6 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों के लिए 3 महीने तक (मार्च से मई, 2020) ‘टेकहोम’ राशन और सूखा राशन का प्रावधान किया। साथ ही जून से पूरक पोषण कार्यक्रम के लाभार्थियों को सूखा राशन उपलब्ध कराने के एवज में प्रत्यक्ष लाभांतरण के माध्यम से नकद राशि दी जा रही है। मध्याह्न भोजन तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खाद्यान्न वितरण जैसी कई पहल महामारी के दौरान परिवारों और बच्चों के लिए मददगार साबित हुआ है।

सीएमआइई के अनुसार, जनवरी-अप्रैल 2021 में बिहार में 36 लाख लोग बेरोजगार थे और इनमें से कई लोग पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा से वंचित होने के कारण गरीबी रेखा के हाशिए पर थे। विश्व बैंक के अनुसार, भारत में महामारी से संबंधित नौकरी छूटने के कारण 1.2 करोड़ लोगों के गरीबी रेखा से नीचे खिसकने की संभावना है। गरीबी का सीधा संबंध बाल श्रम से है। अतः गरीबी में एक प्रतिशत की वृद्धि से बाल श्रम में लगभग 0.7% की वृद्धि होती है। कोविड-19 से संबंधित आर्थिक गिरावट ने बाल विवाह, श्रम और मानव तस्करी जैसी सामाजिक कुरीतियों को भी बढ़ा दिया है। तीन राज्यों- बिहार, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, कोविड-19 के दौरान 15-24 साल के 42% बच्चों एवं किशोरों ने अपने घरेलू कार्यभार में वृद्धि का अनुभव किया है। लड़कों (22%) की तुलना में लड़कियों (52%) पर घरेलू काम के बोझ अधिक हैं।

बिहार में बच्चे पहले से ही व्यापक गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल संरक्षण की समस्या, सांस्कृतिक वर्जना, लैंगिक असमानता, जातिगत भेदभाव, उचित बुनियादी ढांचे की कमी और आवर्ती प्राकृतिक आपदाओं के साथ विभिन्न बुनियादी सेवाओं के अभावों का सामना कर रहे हैं और कोविड-19 संकट ने इसे और गहरा दिया है। महामारी से सार्वजनिक राजस्व में काफी गिरावट आई है। अतः स्थिति को सुधारने के लिए, केंद्र एवं राज्य सरकारों को, गैर-सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र सभी को बच्चों पर पड़नेवाले गंभीर प्रभाव को कम करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

 

ड‍िस्‍क्‍लेमर- उपरोक्त व‍िचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्‍ट‍ि नहीं करता है।

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