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आत्महत्या : अनकही दास्तां

जनता  जनार्दन

जनता जनार्दन

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भीगती मसों और फूलती नसों  के दिनों में, घर से सैकड़ो किलोमीटर दूर, एक छोटे से दस बाई दस के कमरे में, निपट अकेला बैठकर रो रहा एक किशोर, अपने मन मस्तिस्क में चल रहे झंझावातों और चक्रवातों को झेल रहा होता है, अपनी मनः  स्थिति को कोस रहा होता है| किसी छोटे बड़े सपने के ख़त्म हो जाने के कारण हर वक़्त अपने को हीन समझ रहा होता है और उसके बाद वह एक ऐसा फैसला लेता है जिसे लेने का उसे कोई हक नही है। पहले वह एक ख़त लिखकर छोड़ता है और फिर इस दुनिया को छोड़ देता है| वो अपने आखिरी ख़त में लिखता है कि – मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नही बचा था, यही एक मात्र समाधान है ,मैं आत्महत्या कर रहा हूँ, मुझे माफ़ करना और वह यह कहकर मर जाता है|

मेरा यह लेख उसी आखिरी ख़त का जवाब है की आत्महत्या कोई समाधान नही है| जरा सोचिये की किसी कमरे में एक पंखे से एक रस्सी बंधी हुई है, उस पर एक लड़का लटक रहा है, उसके निर्जीव शरीर के निर्बल और शक्तिहीन हाथ पैर है जो हवा में झूल रहे हैं, आंखे फटी हुई है, गर्दन की नसें टूट चुकी हैं और गालों पर आंसुओं की कुछ बूंदे सूखकर जम गयी हैं|वह लड़का एक बार के लिए तो मर गया,लेकिन उसकी फटी हुई ऑंखें उसकी माँ का फटा हुआ कलेजा बनकर जिन्दा रहेंगी, उसकी गर्दन की टूटी हुई नसें उसके बाप के टूटे हुए वो तार बनेगी जो कभी अब झंकृत नही होंगे, उसके गालों  पर  सूख चुके आंसुओं  के गोले उसकी बहन के आँखों से हरदम बहा करेंगी और उस निर्जीव शरीर के हाथ पैर जो हवा में झूल रहें हैं उसके भाई के हिम्मत को जिंदगी भर तोडा करेंगे और एक अल्पकालीन आवेश के कारण लिया गया उसका ये निस्ठुर निर्णय उसके जैसे लाखों युवाओं को इस तथा कथित समाधान के लिए प्रेरित करेगा|

ये कैसा हल है जिसमें अपनों का बर्बाद होता हुआ कल है| खुदखुशी करने वाला इन्सान एक बार को तो मर जाता है, लेकिन उसके यार दोस्त, उसके घर परिवार के लोग, उसके रिश्ते-नाते के लोग बार-बार मरा करतें हैं| वो हर वक़्त खुद को अपराधी समझतें हैं और इस संत्रास के कारण जीते जी मरे हुए  के समान होते हैं|

आकडे बताते हैं की अत्याधिक  खुदखुशी का कारण अकादमिक विफलताएं होती हैं| इन आकड़ों से उठती हुई चीखें इस विषय को और भी गंभीर बनाते हैं | डॉक्टर्स और मनोवैज्ञानिको का ये कहना है की अगर उन तक सही वक़्त पर किसी प्रकार की भी  मदद ,सहानुभूति और मार्गदर्शन पहुँचता तो उनकी जान बचाई जा सकती थी | आकड़ों का स्पष्ट मानना है की दस में से आठ हत्याएं स्पष्ट संकेतों के बाद होती हैं  | हमारा यह नैतिक दायित्व बनता है की जो हमारे आस- पास में मानसिक तनाव या मानसिक दबाव से ग्रसित लोग हैं उनकी बातें सुने उन पर  विश्वास जताएं, उनका हिम्मत बढाएं|

आत्महत्या मनचाही मौत नहीं है यह अनचाही मौत है| मरना उन्हें भी अच्छा नही लगता लेकिन घबराकर एक क्षणिक आवेश में यह निर्णय ले लिया जाता है| उन्हें  ये बताएं की यह  कोई समाधान नही है|अब तो घबराकर ये कहतें हैं की मर जायेंगे| मरकर भी चैन नही मिला तो किधर जायेंगे ? सही वक़्त पर उन तक पहुँचाया गया मानसिक प्रोत्साहन उनकी जान बचा सकता है| जो खुदख़ुशी करना चाहते हैं उनके लिए मेरा यही सन्देश है की जब उन्हें लगे की यही एक मात्र उपाय है, खुदखुशी ही एक मात्र समाधान है तब अपनी आँखें बंद करके, अपनी भविष्यदृष्टा कल्पना शक्ति से अपनी मौत का मंजर देखिये| अगर सफ़ेद कफ़न ओढ़कर जमीं पर पड़ी अपनी लाश के पास ,सुधबुध खोकर बेहोश हो चुके अपने माँ बाप , रोती  कलपती बहने और दहाड़ें मारकर  चीखता अपना भाई नजर आ जाता है तो उनके होठो के तवस्सुम को अपने जीने का बहाना बना लेना|

अपने शौक, अपने सपने जो अपनी मौत के साथ किसी और माइने में पूरे हो रहें हैं, उन्हें पूरे करने को अपने जीने का बहाना बना लेना | अपनी कला को विस्तार देने को, आगे के जीवन को निहार लेने को ,दूसरों को उपकार देने को ,कोई भी बहाना बना लेना| जीने के लाखों बहाने हैं | अगर फिर भी कोई बहाना न मिले तो तो बचपन में मास्टर जी  की मार से बचने के लिए कोई बहाना गढ़ लिया करते थे , इस बार मौत से बचने के लिए बहाना गढ़ लीजिये  लेकिन मरना इसका उचित समाधान नही है| अकादमिक विफलता कोई विफलता नही होती |विश्वनायक माने  जाने वाले लोग   कभी अपने अकादमिक छेत्र में सफल नही हो पाए थे| जिंदगी यहीं तक नही है , सफलता का पैमाना सिर्फ यही नही है| महत्मा गाँधी, मार्क जकर्वर्ग, थॉमस अलवा एडिसन, सचिन तेंदुलकर, रबिन्द्र नाथ टैगोर, बिल गेट्स अपने स्कूल कॉलेज की परीक्षाओं में कभी सफल नही रहे थे. लेकिन जीवन में अपने अपने क्षेत्र में उत्कर्ष तक पहुंचे , परकास्ठाओं तक पहुंचे| अतः छोटी -मोटी विफलताओं को दिल से  न लगायें , छोटे- मोटे सपनो के पीछे जीवन बर्बाद न करें |गोपाल दास  नीरज जी  की पंक्तियाँ  हैं की –

“ छिप छिप अश्रु बहाने वालों ,

मोती व्यर्थ लुटाने वालों ,

कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है ,

सपना क्या है ?

नयन सेज पर सोया हुआ आँखों का पानी

और उसका टूटना जूं  जागे कच्ची  नींद जवानी ,

गीली उमर बनाने वालों ,

डूबे बिना नहाने वालो ,

कुछ पानी के बह जाने से सावन नही मरा करता है ,

चंद खिलौनों के खो जाने से जीवन नही मरा करता है ,

कुछ दीपों के बुझ जाने से आंगन नही मरा करता है ,

कुछ मुखड़ो के की नाराजी से दर्पण नही मरा करता है ,

कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है ……

अंतत: मैं यही कहना चाहूँगा की जीवन जीना भी एक कला है , इसको जीने का हुनर जो जान गया वह समुच्चय विश्व को जीतने का हुनर रखता है| हम सब एक दुसरे से अलग हैं हम सबकी पहचान अलग है | बस जरुरत है तो खुद की एक पहचान बनाने की जिस दिन आपने अपनी एक पहचान बना लेंगे उस दिन आपको जिंदगी का वास्तविक मूल समझ आयेगा और जीवन जीने का आनंद भी|

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आयुष द्विवेदी

हंसराज कॉलेज 

दिल्ली विश्वविद्यालय  

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