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महामारी, मौत और देश

जनता  जनार्दन

जनता जनार्दन

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किसी का दिन सासों की तार को टूटने से बचाने में गुजर गया होगा और किसी की रात उसकी आखिरी रात बनकर बीत गई होगी। इस महामारी में जिंदगी और मौत के बीच का सफर का लुत्फ उठाते हुए कुछ लोग घर को लौट आतें हैं पर कुछ लोग सफ़र में ही खो जाते हैं। महज़ साल भर इस महामारी को होने को आया है पर बीतते वक्त के साथ इसका भयावह रूप देखने को मिल रहा है। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। आप? मैं? सरकार? आखिर कौन?।

इस संसार में हर किसी का अपना हिस्सा है, सब अपने हिस्से की मांग रखते हैं पर इस देश की जनता आखिर किसके हिस्से में आती है? चिताओं की उठती हुई आग को भी शीर्ष पर बैठे लोगो को देखनी चाहिए। यह मंजर कितना भयावह है इसकी जानकारी शायद अभी सबको नही पता। मेरे देश की जनता अपने ही देश में अपने ही संसाधनों पर अपनी जान की भीख मांग रही है। आकड़े छिपाए जा सकतें हैं,परंतु चिताएं नही । जो चैन की नींद सो रहें वो बहुत खुशनसीब हैं । जिसके सर से आज छत उजड़ गई हो , जिसको मुंह तक निवाला पहुंचाने वाला हाथ न बचा हो , जिसके जीने का सहारा ही मुंह फेर लिया हो उसे नींद भी गवारा नही।

आप कहेंगे की सिस्टम ढह रहा है! नही सच्चाई तो यह है की यही सिस्टम है। लोगों ने लोग चुने थे की जो वक्त पर उन्हें राह दिखाएंगे , उनका सहारा बनेंगे , वही लोग आज सबकी मौत का कारण हैं। सआदत हसन मंटो ने कहा था – जब एक की मौत हो तो वह मौत होती है पर जब हजारों की मौत हो तो वो तमाशा होता है। तमाशा मदारी दिखाता है ,पर इस देश में कितने मदारी है उसकी गिनती नही है। तकलीफ सिर्फ उनकी नही होती जो चले जातें हैं, तकलीफ उनकी भी होती है जो पीछे छूट जाते हैं । आज लड़ाई जारी है जिस दिन यह लड़ाई खत्म हुई उस दिन इस देश की जनता एक -एक मौत का हिसाब मांगेगी। सियासत की आग पे रोटियां सेंकने वाले अक्सर ऐसे वक्त पर अंधे हो जाते हैं।

आजकल कलम भी सोच समझ कर चलती है। इतना डर तो शायद अंग्रेज शासन में नही रहा होगा । लोकतंत्र अनेक मतों से बनता है, यही लोकतंत्र की खूबसूरती है ,अगर सबकी सोच एक जैसी हो जाए तो फिर तानाशाही और लोकतंत्र में अंतर क्या रह जायेगा ? लेकिन अब सरकार के खिलाफ लिखना या बोलना देशद्रोह से कम नही । खैर , इस संवेदनशील विषय पर ये मेरे अपने विचार हैं । मैं सबके कुशल होने की कामना करता हूं।

आयुष द्विवेदी

हंसराज कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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