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आयुर्वेद चिकित्सा : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता

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आचार्य चरक ने एक श्रेष्ठ भिषक हेतु सम्यक आयुर्वेदिक प्रयोगों एवं अनुसंधान का महत्व बताते हुए सूत्र स्थान में कहा है;
“सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणां । सिद्धिराख्याति सर्वेश्च गुणैर्युक्तं भिषक्तममं ।।135।

यानि चिकित्सा विज्ञान एक सतत प्रक्रिया हैं, यह ग्रंथों में बंधी या रुकी हुई नहीं है, ये मैं नहीं कह रहा आचार्य चरक कह रहे हैं। अब दोष, दूष्य, देश, काल, प्रकृति आदि आदि की बात करते हैं। निदान एवं चिकित्सा इन्ही के आधार पर होनी चाहिए, मैं मानता हूँ ऐसा ही होना चाहिए। हम 21 वी सदी में हैं विज्ञान का युग है, किसी भी विषय को सिद्ध करना मतलब विज्ञान सम्मत होना है। आम, दोष, दूष्य आदि आदि परिमाण सम्मत प्रमाणित करना आवश्यक है। भले ही ये पैरामेडिक्स हो पर कुछ तो मानक निर्धारित होने चाहिए जो विश्व वैज्ञानिक विरादरी को मान्य हो। इसके लिए सोंच को विस्तृत करना जरूरी है, अनुसंधान जरूरी है।

 

 

 

चिकित्सा सिर्फ अनुमान से नहीं चलेगी। जैसा कि हमारे पूज्य आचार्यों ने कहा है कि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार अपने को परिष्कृत करना होगा। जब ऐसे अनुसंधानों को वैश्विक मान्यता मिलने लगेगी तो वो भी निश्चित ही होने लगेगा। आचार्यो ने निदान को सिर्फ दोष, दूष्य में ही नहीं बांध दिया है। निदान के साथ साथ चिकित्सा के भी अन्य सिद्धांत भी बताए हैं, उन पर भी गौर करना आवश्यक है। ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में प्रयास नहीं हो रहे, विभिन्न आयुर्वेद जगत के वैज्ञानिकों के साथ अन्य क्षेत्रों के वैज्ञानिक भी प्रयासरत हैं। और योजना में भी हैं।

 

 

 

हमें मत भिन्नताओं को भी नहीं भूलना होगा चरक संहिता में जहां रोगों के नाम के साथ उनकी गणना का उल्लेख है वही महर्षि अग्निवेश ने लोगों को गणना से परे कहा है और यह भी बताया है कि कोई भी रोग वात पित्त कफ का अतिक्रमण नहीं करता अतः रोगों की चिकित्सा में इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। कोई भी सिद्धांत खासकर चिकित्सा सिद्धांत व्यवहारिक होना चाहिए यानी ऐप्लिकेबल। ऐसा कालक्रम में आचार्यो द्वारा व्यवहार और शोध द्वारा किया भी जाता रहा है। उदाहरण के रूप में चरक निदान और माधव निदान देखेंगे तो साफ नजर आएगा। आगे यह क्रम रुक गया क्योंकि आयुर्वेद ग्रंथों को शोध ग्रंथ न मानकर धार्मिक ग्रंथ माना जाने लगा, आस्था जुड़ गई। आयुर्वेद ठहर गया।

 

 

 

दूसरी तरफ जिस आयुर्वेद से आधुनिक चिकित्सा पद्धति का उदय हुआ वह निय नए शोधों से पैरा मेडिकल साइंस तक पहुंच गया और अभी भी रुका नहीं। अभी भी हमारे विद्वान साथी गुंजाइश ही नहीं छोड़ना चाहते। अब हमारे आचार्य भगवान थे या वैज्ञानिक थे ये अंतर तो हमें करना होगा। आयुर्वेद के आधारभूत मानकों को शोध आधारित बनाने की है, बात एक सामान्य चिकित्सक के समझने योग्य बनाने की है। आज ज्ञान की कमी वश नहीं बल्कि व्यवहारिकता के कारण लगभग सभी आयुर्वेदिक चिकित्सक चिकित्सा भले ही आयुर्वेदिक करते हों पर निदान आधुनिक चिकित्सा सिद्धांतों के अनुसार करते हैं। और अनुमान लगाते हैं अगर आर्थराइटिस हैं तो वात प्रकुपित होगा। ये एक उदाहरण है। आयुर्वेद को स्थापित करने के लिए अनुसंधान की नितांत आवश्यकता है। सबसे पहले आयुर्वेद नैदानिक सिद्धांतो पर। इसका कोई विकल्प नहीं।

 

 

 

 

1. चाहे आर्थराइटिस हो या कोरोनरी आर्टरी डिसीज इनका उदाहरण इस पर आयुर्वेदिक सम्प्राप्ति के वर्णन के लिए नहीं बल्कि इसलिए दिया गया कि इन रोगों के नामों की जरूरत क्यों पड़ रही है। कोरोनरी आर्टरी डिसीज के पैथोजेनेसिस से आयुर्वेदिक सम्प्राप्ति का अनुमान लगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
2. आयुर्वेद के मूल सिद्धांत- अगर हमारे वैज्ञानिक आचार्यो में जड़ता आ जाती तो वैदिक काल के बाद संहिता काल, व्याख्या काल और विवृति काल न आ पाता। अब इसके बाद जिस काल की आवश्यकता है वो है ‘मानक काल’। हमें अब संदर्भ ग्रंथो से मानक ग्रंथो की तरफ आना होगा।
3. वैभवशाली अतीत पर गर्व करने के बजाय उस अतीत को तथ्यात्मक रूप से परिष्कृत करना होगा।
4. एक समग्र बदलाव की आवश्यकता है, पहला पाठ्यक्रम में बदलाव (उससे पूर्व विषय बस्तु का मानकीकरण, घालमेल को हटाकर रचना-क्रिया शारीर से लेकर चिकित्सा शास्त्र तक), दूसरा चिकित्सा शिक्षा पूर्ण रूप से व्यवहारिक हो।
4. ड्रग डेवेलपमेंट मानकों में बदलाव के लिए ड्रग एन्ड कॉस्मेटिक एक्ट में भी बदलाव की आवश्यकता है जो सीधे गुणवत्ता एवं स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है।

इन सबके अतिरिक्त भी बहुत कार्य की आवश्यकता है।

 

 

-डॉ अवनीश उपाध्याय, पीएचडी (आयुर्वेद)
आयुर्वेद अनुसंधान विशेषज्ञ

 

 

 

डिस्कलेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण जंक्शन किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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