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मंकी बोले तो मन की बात (कविता) अविनाश वाचस्‍पति

अविनाश वाचस्‍पति

अविनाश वाचस्‍पति

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मंकी बोले तो बंदर
केला लेकर हाथ में
घुसता संसद के भीतर
नहीं है तीतर
बिल्‍ली भी नहीं पास में
केला खुद खाते हैं
छिलके पर पब्लिक को
फिसलाते हैं
केला चित्‍तीदार समझकर
काले धन को सफेद केला
बनाना खा जाते हैं।

संसद में बैठे
यूं तो सब मंकी हैं
बंदर नहीं कहूंगा मैं
मंकी को दूंगा नया अर्थ
चुनाव के उपरांत
संसद में उछलते कूदते
नजर आएंगे।
चाहता हूं मैं
इच्‍छा मेरे मन की है
सभी चर्चित धर्म के ठेकेदारों
यानी धार्मिक बाबाओं को
सौंप दूं सत्‍ता
जिनका चयन करेंगे
उनके अंधभक्‍त भक्‍तगण
बापू आसाराम, निर्मल बाबा, बाबा रामदेव
और बाबाओं और बाबियों को
बिठला दूं संसद में
जहां पर मिल जुल कर
सब अपने मन की संसद चलाएं
उछल कूद कर देश को
विकास की ऊंचाईयों के
नए प्रतिमानों पर पहुंचाएं
विश्‍व बुलंदी पर
देश में काले धन में
काले रंग की लाजवाब चमकार लाएं।

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