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किसान आंदोलन

avibyakti

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किसान आंदोलित हैं। सरकार कुछ भी सुनने को तैयार नही है। 16 दिनो से सड़कों पर किसान डटे हुए हैं। किसानों का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य कि गारंटी दीजिये। मामला बहुत पेचीदा हैं। क्या लोकतन्त्र में जनता के प्रतिनिधि जनता की बात मान लेंगे तो उनकी हार मान ली जाएगी। तमाम तरह के सवाल लोगों के मन में चल रहा है।

भारत में 85% लोग गांवों में रहते हैं। भारत गांवों का देश हैं। किसानों और मजदूरों के जीवन स्तर गाँव में जा कर देखा जा सकता है। किसी भी परिवार को तीनों समय का खाना उपलव्ध नहीं है। अगर घर में कोई बीमार पड़ गया तो नीम हकीम के भरोसे हीं इलाज संभव हैं। ख़ासी, सर्दी जैसी बीमारी के ऊपर तो ध्यान देने की भी जरूरत महसूस नहीं होती, इस लिए की जीवन अभाव में है। किसान शब्द सुनने में अच्छा लगता है, पर जो लोग गांवों से जुड़े हैं ओ जानते हैं कि किसान का मतलब भी मजदूर ही है जो अपने परिवार के साथ अपने खेत में मजदूरी करता है।

कुछ लोग इस आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं तो कुछ लोग इसे नक्सलियों और खालिस्तानियों द्वारा समर्थित बता रहे हैं। अब पाकिस्तान के साथ-साथ चीन का नाम भी जोड़ा जाने लगा है। मीडिया के बहस में अभी इस आंदोलन को देश विरोधी बताया जा रहा है। किसानों ने इस बार ठान लिया है कि इस बार देश के किसानों के हित में अपनी बात सरकार से मनवा कर ही मानेंगे।

16 दिनों से सर्दी के चरम विंदु वाले मौसम में सड़कों पर अपने बच्चों और औरतों के साथ डटे हुए हैं। कुछ चाटुकार इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानों का आंदोलन बता रहे हैं। पर वास्तविकता है कि यह आंदोलन देश के सभी हिस्सों में फैल गया है। बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार, सभी राज्यों में इसका विरोध हो रहा है।

किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत नें तो घोषणा कर दी है कि सरकार अगर जिद्द पर अड़ी रही और नए कानून को खत्म नहीं करती है तब किसान 26 जनवरी को राजपथ पर होने वाले परेड में ट्रेक्टर के साथ शामिल हो जाएंगे। इस आंदोलन के क्रम में सच्चाई सामने आई है कि देश में जितनी भी ख़रीदारी किसानों से हुई है उसमें 60% पंजाब के किसानों से हुई है। अब सवाल उठता है कि बिहार तथा देश के अन्य हिस्सों से किसानों से क्यों नहीं उनका उत्पाद खरीदा गया। बिहार में हुई खरीद का आकडा मात्र 6% ही है। बिहार के किसानों के साथ हुई इस भेद भाव पर भी किसानों को बताना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

किसानों को उचित हक मिलना चाहिए। अगर उन्हें लगता है कि ये कानून पुजीपतियों के हक में है तो इस कानून को निरस्त किया जाना चाहिए। देश के सभी नागरिक समान हैं। इनकी जरूरते भी समान हैं। सरकार को इनकी बातों को मान लेना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि ये आंदोलन घटने के बजाय बढ़ते ही जा रहा है।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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