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मीनू की कहानी…. मेरी जुबानी (भाग-४)

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भाग-३ से आगे

मीनू अपनी ससुराल पहुँचती है| दरवाजे पर गाड़ी रूकती है| किसी औरत की आवाज मीनू के कानों तक आती है, ‘ मैं नहीं उतारूंगी, खुद ही उतर आये महारानी , इतनी दुष्ट है इसकी मम्मी कि दो कौड़ी की साड़ी भेजी है वो भी पूरे पांच मीटर लम्बी नहीं है’ | मीनू को यह नहीं मालूम था की कौन चिल्ला रहा है क्योंकि उसने तो एक हाथ जितना लम्बा घूंघट डाल रखा था| पर किसी ने उस औरत (मीनू की सास) को समझाया की बहु घर आई है , बाद में ये सब कह लेना , अभी तो अन्दर ले आओ| बाहर से करीब एक घंटे बाद उसे अन्दर लाया गया और सभी महिला रिश्तेदारों को पैसे देकर पैर छूने के लिए कहा गया वो भी कम से कम २१ रु. प्रति महिला| अब जो पैसा मीनू को उसकी मम्मी ने विदाई के समय दिया था उसे अपनी पर्स से निकालकर जुट गयी इस कर्मकांड में | सभी कह रहे थे कि कितनी सुन्दर बहु पायी है लेकिन उसकी सास का कहना था कि बहु तो सुन्दर है पर दहेज़ तो सुन्दर नहीं मिला , फ्री में ब्याह लाये हैं समझो| दिन तो जैसे-तैसे गुजर गया, अब बारी थी ‘रात’ की|

स्पष्ट करता चलूँगा की मीनू का स्वभाव ऐसा था की जिस बात पर वो राजी न हो, उस बात पर उससे जबरदस्ती करना नामुमकिन था| दिन भर सास की खरी बातें और उस पर पति का गैर-जिम्मेदाराना रवैया| थोड़े ही समय में अपने पति के प्रति हल्की घिन्न को अपने अन्दर जन्म दे दिया था मीनू ने आखिर उम्र ही क्या थी उसकी जो बहुत समझदारी दिखा पाती| इसी घिन्न की वजह से वह उस रात अपने पति के साथ औपचारिक न हो पायी और गुस्से में आकर जड़ दी एक लात अपने पति को| क्यों…….? साफ़ शब्दों में लिखना उचित न होगा, समझना ही बेहतर विकल्प है|

सुबह हुई , आज का दिन था Reception या At Home पार्टी या जो भी कह लें| छोटा-मोटा function था लड़के वालों की तरफ से | सभी लोग शाम की तैयारी में जुट गए और मीनू नहा-धोकर ‘मुंह-दिखाई’ कराने में| शाम को सभी मेहमान एकत्रित हुए, दूल्हा-दुल्हन बैठाए गए| चूँकि मामला लोकल का था , इसीलिए मीनू के पापा और भाई-बहन भी शामिल थे| मीनू ने स्टेज पर बैठे हुए देखा की उसके घर से मम्मी को छोड़ सभी आये हैं| वो वही बैठे-२ रोने लगी, भाई-बहन पास आये तो उनसे मम्मी के बारे में पूछा , पता चला की घर में कुछ रिश्तेदार हैं इसलिए वो नहीं आयीं | मीनू सोचने लगी कि क्या उनका मन नहीं था मुझे देखने का, जो लड़की एक दिन भी उनसे दूर न रही हो वो दो दिन कैसे रह गयी| उसका मन बार-२ अपने मायके जाने को कर रहा था| मगर जब उसके पापा ने कि अब हम लोग जा रहे हैं , मीनू कि आँखों में तुरंत आंसू आ गए कि आज मेरे पापा बिना अपनी लड़की को साथ लिए जा रहें वो भी पराये लोगों के हवाले छोड़कर| यानी अभी तक किसी ‘अपने’ को ससुराल में ढूंढ नहीं पायी थी मीनू|

थोड़ी देर बाद उसे अन्दर लाया गया जहाँ कपड़े बदलने के बाद उसे उसके कमरे में भेज दिया गया| फिर वही मुसीबत , ‘रात की बात’. इस रात तो उसका खूब झगड़ा हुआ अपने पति से| किस बात पर बताने कि जरूरत नहीं| मीनू उस रात रोते-२ ही पता नहीं कब सो गयी | सुबह के ५ बजे लगा कि कोई दरवाजा खटखटा रहा है | मीनू ने दरवाजा खोला तो उसकी सास चिल्लाते हुई बोली कि जरा खुद से और जल्दी उठा करो, यहाँ ५ बजे से ही पानी आ जाता है| मीनू ने सारी सफाई की और उसकी सास ने सभी बर्तन मांजे| उसके बाद मीनू से कुछ खाने के लिए बनाने को कहा | मीनू दो दिन में ही तंग हो गयी , चूँकि उसकी रोजमर्रा जिंदगी (मायके की) में यह सब शुमार न था| मीनू को लगा कि उसकी ससुराल में सिवाय उसकी सास और पति के , सभी लोग अच्छे हैं और उससे भी खुश हैं| दोपहर को मीनू ने देखा कि उसका पति अपनी माँ के पास बैठा पिछली रात का रोना रो रहा था| यह दृश्य देखकर मीनू सन्न रह गयी , उसको यह बिलकुल गलत लगा कि पति-पत्नी के बीच कि बातचीत किस तरह उसकी सास के सामने ‘आम’ हो रही है | इस बात से वह अपने पति के प्रति और भी ज्यादा झुलस गयी |

आज मीनू को इन्तजार था रात होने का ताकि अपने गुस्से का भरपूर इजहार कर सके| परन्तु दिन भर काम कर थक जाने के बाद उसका मन नहीं हुआ झगड़ा करने का| वह लेटते ही सो गयी और उसका पति उसे कोसता रहा| उसने मीनू को सोने भी नहीं दिया, मीनू का पारा चढ़ने लगा था| इस बार गुस्से में आकर उसने अपने पति से कह ही दिया कि मेरे माँ-बाप ने किस जंगली और गंवार के हवाले कर दिया | इतना सुनते ही वह बाहर चला गया , थोड़ी देर बाद टहल कर वापस कमरे में आ गया और चुपचाप सो गया | पहली रात ही मीनू की लात खाकर वह समझ गया था कि इस लड़की से पंगा ठीक नहीं | लेकिन उसके भी सब्र का बाँध कमजोर पड़ रहा था |

कमरे का सन्नाटा , रात के साथ गुजर तो गया लेकिन सुबह होते ही फिर वही उलझने , बेचैनियाँ| आज फिर दिन बीतने के साथ मीनू ने देखा कि उसका पति अपनी माँ के पास बैठा कुछ बातें कर रहा है| मीनू को कुछ -२ समझ तो आया लेकिन उसने ज्यादा गौर नहीं किया | थोड़ी देर बाद उसकी सास ने उसे आवाज दी, मीनू गयी तो देखा उसका पति वहां से जा चुका था| मीनू से उसकी सास ने कहा कि हम तुम्हे अपने लड़के के लिए लेकर आये हैं, हमारे घर काम करो न करो पर अपने पति को खुश रखो, उसका कहना मानो| मीनू अब पूरी तरह समझ चुकी थी कि माजरा क्या है| अब तो वह आग बबूला हो चुकी थी लेकिन सास से कुछ कहने कि हिम्मत नहीं थी उसकी|

इस रात तो उसके पति की आँखों में कुछ और ही था| शैतानी हिम्मत और इंसानी जोश| मीनू भी विरोध की स्थिति में नहीं थी क्योंकि ये सभी बातें धीरे-२ आम हो रही थी और उस पर अप्रत्यक्ष दबाव भी बन रहा था| अब मीनू को यही लग रहा था कि कैसे भी करके वो अपने मायके चली जाए| भगवान् ने उसकी सुन भी ली और दुसरे ही दिन उसके पापा विदा कराने आ गए| आज मीनू बहुत खुश थी| उसने मन ही मन ठान लिया कि अब कभी यहाँ वापस नहीं आएगी| इसी इरादे के साथ मीनू अपने मायके जाने की तैयारी करने लगी|

शेष अंतिम भाग में ….

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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