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कहीं छा ना जाए एशियाड में डोपिंग का साया

एशियाई खेल

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खेलों के साख को खाक करता डोपिंग एक ऐसा ज़हर है जिसने खेल की धमनियों को दूषित कर रखा है.

Dopingकुछ ही दिनों में ग्वांगझाऊ चीन में एशियाई देशों का महाजलसा एशियन गेम्स शुरू होने वाले हैं. खेलों के इतिहास में यह अब तक के सबसे बड़े खेल होंगे लेकिन क्या यह सबसे अच्छे खेल भी होंगे? यह एक सवाल है जिसमें हमें चीन की काबिलियत पर शक नहीं है और 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेल इसके गवाह हैं. यहां बात खेलों के ज़हर अर्थात डोपिंग की बात हो रही है.

नया नहीं है एशियन गेम्स में डोपिंग प्रकरण

2006 के दोहा एशियन गेम्स में जिस तरह से एक के बाद एक डोपिंग प्रकरण सामने आए थे उसने खेल भावना और अनुशासनहीनता पर एक बड़ा दाग लगा दिया था? यहां तक म्यांमार, उज़्बेकिस्तान के दो-दो वेटलिफ्टरों को स्टेरॉयड का सेवन करते पाया गया जिसके कारण उन्हें अपने पदकों से हाथ धोना पड़ा.

dopingइन मामलों के चलते नौबत यहां तक बिगड़ गई कि वेटलिफ्टिंग को बहुराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता से हटाने की बात होने लगी. बात साफ़ है खिलाड़ियों के किए-धरे के कारण खेल क्यों बदनाम हो.

डोपिंग प्रकरण के एक बात जो गौर करने वाली है वह यह कि जो भी खिलाड़ी डोपिंग में पकड़े जाते हैं उनमें से अधिकतर इन पदार्थों का सेवन अपने कोचों की देखरेख में करते हैं. जो सही मायने में बहुत ही गंभीर बात है. कोच यानी गुरू खिलाड़ियों का मार्गदर्शक होता है जबकि यहां तो कोच ही उनको गलत रास्ते पर ले जा रहा है.

अभी हाल ही में दिल्ली ने जिस भव्यता से कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया उसका लोहा विश्व ने माना लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी यह डोपिंग से अछूते नहीं रहे. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि क्या एशियन गेम्स डोपिंग से अछूते रहेंगे.

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