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तेरी देशभक्ति मेरी देशभक्ति

एक विश्वास

एक विश्वास

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गांधी नेहरू के भारत वाले देशभक्त बड़े खुश हैं अच्छी बात है कि उनकी जीत हुई है।
अब हमसे यह कह रहे हैं कि मोदी भक्त तुम भी खुश हो लो।

भाई मोदी तो तुम्हारी ही पार्टी में है उसने कब कहा कि मैच न हो या भारतीय मैच न देखें।
यहाँ तो बात सोच की हैं पाकिस्तान क्या यह टीम बीसीसीआई किसी से खेले हमें इसका मैच नहीं देखना है। पाकिस्तान से तो साल में दो चार मैच होंगे परन्तु यह प्राइवेट कंपनी तो हर साल पच्चीसों मैच खेलती है और करोड़ों कमाती है परन्तु देश को ठेंगा दिखाती है।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप देशभक्त नहीं, मैं हूँ परन्तु मैच फिक्सिंग व भ्रामक विज्ञापनों से पैसा कमाने वाले मेरे आदर्श नहीं हो सकते हैं आपके हैं तो मुझे क्या? मैं न प्रमाणपत्र दे रहा हूँ और किसी से ले भी नहीं रहा हूँ। परन्तु सत्य क्या है। सत्य वो नहीं जो मैं कहता हूँ और वो भी नहीं जो आप कहते हैं। सत्य वो है जिसका अपराधी भी विरोध करे तो उसका दिल कहे कि तुम झूठ बोल रहे हो परन्तु तुम्हारी मजबूरी है तो चुप हूँ वरन् ……। जी हाँ यही सत्य है।

आप की ही मान लेता हूँ कि सेना का जवान हमेशा सही नहीं होता परन्तु उसकी हर शहादत देश के लिए ही होती है इससे कौन इंकार कर सकता है। तो उसके मनोबल के लिए मैच की कुर्बानी आप नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं मैं तो दे सकता हूँ। सब अपना काम कर रहे हैं। मैं भी अपना काम कर रहा हूँ किसी का किसी से क्या लेना? बात तो यही है कि देश को जब देश के दुश्मन सीना ठोक कर कहते हैं कि उनका है तो फिर देश उनका क्यों नहीं जो देशभक्त हैं ही नहीं उनके कर्मों में देशभक्ति दिखाई भी देती है।

सब की अपनी देशभक्ति है सबके देशभक्ति के अपने पैमाने हैं। गाँधी नेहरू की देशभक्ति थी कि उन्होंने शहीदेआजम भगतसिंह को फाँसी पर चढ़ने से नहीं बचाया, चंद्रशेखर आजाद को आतंकी बताया, अपने घमंड के लिए सुभाषचंद्र बोस को लोगों द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद उन्हें मजबूर किया कि वो पद छोड़ दें, पंद्रह में से तेरह कांग्रेस कमेटियों के समर्थन के बावजूद पटेल की जगह नेहरू प्रधानमंत्री बने आदि घटनाएँ देशभक्ति की ही मिसाल हैं वरना कोई किसी को देश का बाप तो नहीं ही बना देता।

देशभक्ति तो यह भी है कि आज लोग आतंकियों के साथ बैठ कर देशद्रोह रचते हैं और सवाल सरकार से करते हैं कि आतंक बढ़ क्यों रहा है। सेना का जवान सहिष्णुता से काम ले पत्थर खाए तो चलेगा परन्तु मुठभेड़ में आतंकी या नक्सली मार गिराए तो सवाल होता है कि यह मानवाधिकार का हनन क्यों? यह सब क्या है? बेशक यह आज के हिंदुस्तान की इंडिया की देशभक्ति ही है परन्तु यह भारतीय की देशभक्ति नहीं है।
सत्तर साल से जाति धर्म संप्रदाय भाषा और क्षेत्र के नाम का अनुचित लाभ लेकर देश से छल फरेब आज देशभक्ति बन गई है। जो अपने लोगों के हक मार कर आगे बढ़े हैं वो आज भी उनका हक छीन रहे हैं। कोई नहीं कहता कि हम तो बहुत पा गए अब अपने किसी दूसरे साथी को भी लाभ ले लेने दो परन्तु वो भी अपनों का शोषण कर उन्हें बरगला कर देश के खिलाफ भड़का कर देश को नुकसान पहुँचा कर देशभक्त बन जाते हैं। किसके सहारे? उन्हीं भूखे नंगे लाचारों के सहारे जिनका हक उन्होंने आजीवन मारा है। यह है हमारे देश की देशभक्ति।

यहाँ जो अपने माँ बाप के भक्त नहीं बन पाए वो दूसरों को सलाह देते हैं कि कोई उनको देशभक्ति न सिखाए। कोई क्या देशभक्ति सिखाएगा उनको जो चीन का सामान नहीं त्याग सकते। जो मैच प्रसारण से बिजली बचाकर उसका उपयोग किसी जनहित के कार्य में नहीं कर सकते। जो देश की सेना के शहीदों का सम्मान नहीं कर सकते। जो कर्तव्य से अधिक अधिकार को मानते हैं उन्हें कौन सिखाएगा देशभक्ति?
देशभक्ति तो दिल में होती है और हमारे वातावरण से उत्पन्न होती है। जो झूठ फरेब से पैदा हुआ और उसी में पला बढ़ा वो क्या जानेगा कि देशभक्ति क्या होती है।

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