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हम वापस नहीं लौट सकते

चंद लहरें

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सत्य अहिंसात्मक आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, आत्मनिर्भरता,  विदेशी वस्तुओं, संस्कृति का बहिष्कार, स्वदेशी आान्दोलन आदि मूलमंत्रों ने बेशक देश को गुलामी से मुक्त करने में  मदद की। एक सिद्धान्त के तहत महात्मा गाँधी  का कम  से कम वस्त्र पहनना, नंगे फकीर के रूप में गोलमेज काँफ्रेंस तक में भाग लेना, बकरी का दूध पीना आदि एक प्रयोग पर आधारित थे।

उपरोक्त  स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत में किये गये जिन प्रयोगों  की विशिष्टताओं ने विश्व को एक नये आन्दोलन जन्य  प्रयोगों की राजनीतिक शक्ति का परिचय दिया, वस्तुतः वह उनीसवी शती के पूर्वार्ध के एक महान विचारक  हेनरी डेविड थोरो (Thoreau), के एक उपन्यास वाल्डेन का  प्रभाव था।

एक आर्टिकल में व्यक्त इस सत्य ने साउथ अफ्रिका और तत्पश्चात भारत में इसके प्रयोगों के रहस्य से पर्दा उठा ही दिया, साथ ही उस विचारधारा ने स्वतंत्रता पूर्व से स्वतंत्रता पश्चातऔरअब तक एक विचार सेतु बनाने का भी कार्य किया, इस सत्य को भी उद्घाटित कर दिया। यद्यपि वाल्डेन का रचयिता भी अपने दार्शनिक सिद्धान्तों के लिए एक पुराने स्कूल आफ थिंकिंग  जिसमे प्लेटो से लेकर  काँट, हेगल  आदि दार्शनिक शिक्षाविदो  राजनीति विशारदों  चिन्तकों को सम्मिलित किया जा सकता है, की परम्परा का प्रतिपादक ही माना  जाएगा

जिन्होंने व्यक्ति- स्वतंत्रता और, उसमे राज्य के कम से कम हस्तक्षेप की कल्पना और वकालत की थी। महात्मा गाँधी ने सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रिका में इसे प्रयोगात्मक स्वरूप दिया। वहाँ प्राप्त सफलता ने भारत में इसे प्रयोगात्मक स्वरूपदेने को प्रेरित कियाऔर इसतरह पूरे स्वतंत्रता संग्राम में इसने अपनी विशिष्ट पहचान बना ली।

थोरियू (थोरो) का प्रभाव उनपर पड़ाऔर भारत जैसे गरीब, कृषिप्रधान अस्त्र शस्त्र विहीन देश के लिए यह नवीन धारणा उन्हें हर तरह से समुचित जान पड़ी। थोरो के सिद्धान्तों को हम प्रकृतिवादी सिद्धान्त की संज्ञा भी देसकते हैं इस अर्थ में कि वह राज्य या सरकार का व्यक्तिगत जीवन में दखल को उचित नहीं मानता और सबसे अच्छी सरकार की संज्ञा उसे देता है जो व्यक्ति के जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप करता है। एक सार्वभौम सिद्धान्त बहुत सारे सम्बन्धित सिद्धान्तों को जन्म दे देता है। मात्र एक सोच अपने विस्तार मे बहुत सारी सोचों का समायोजन कर लेती है।कहने का तात्पर्य यह कि इसदेश के विकास के ढर्रे मे कहीं वही सोच न विस्तार पा रही हो ,यह सोचा जा सकता है।

वस्तुतः प्रकृति के अधिक सन्निकट रहकर कम से कम जरूरतों के साथ जीने की कला  यह इस पृथ्वी कीआर्य सभ्यता की देन रही।कम जरूरतें कम संघर्ष ,शान्त और स्वस्थ जीवनशैली। किन्तु तब भी दो तरह की विचार धाराएँ रहीं ही। सम्पन्नता की लालसा तब भी थी ही। और जब प्रकृति ने नयी नयी संभावनाएं दिखाईं तो उनका उपयोग उन्होंनेभी किया।आवश्यकताओं के विविध स्वरूपों ने पूरे विश्व मे संधर्षात्मक भौतिकवादी जीवनशैली का आश्रय लेने को विवश कर दिया और मशीनी उद्योग धन्धों ने जीवन को भी मशीनी बना दिया।

निरंतर भव्य विलासी जीवन की आकांक्षा ने हमें प्रकृति से दूर कर दिया  ।बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती आकांक्षाओं ने विश्व मे संघर्ष को जन्म दिया। कृषि कार्य ही नहीं, निवासस्थान के लिए भी। हम भूल बैठे कि धरती वही है, विस्तार पा नहीं सकती।अपनी इच्छाओं के उड़ान ने हमें जल थल नभ हर जगह संघर्ष करने के लिए विवश कर दिया ।

यह विषयांतर है , हलाँकि बहुत महत्वपूर्ण।हम फिर  थोरो के सिद्थांतों के आलोक में आज के युग को देखना चाहते हैं।उसके साथ कुछ अध्यात्म को जोड़ना भी भावसंगत प्रतीत होता है।बड़े बड़े बाजार में उपलब्ध समृद्ध और प्रतियोगात्मक जीवनशैली से सम्बद्ध वस्तुओंके बिना क्या हम जी नहीं सकते?आज कोरोना ने जिस तरह चुपचाप प्रत्येक घर में प्रवेश करने की ठान रक्खी है, बिना सूचना दिए आक्रमण कर लोगों को खतरनाक स्थिति में पहुँचाकर हमें सामान्य जीवनशैली से जिसतरह दूर कर दिया है वह निरंतर सावधानियों की माँग करता है।

 

यहाँ तक कि वैक्सीन उपलब्ध हो जाने की एक आशाजनक स्थिति भी उसमें विशेष परिवर्तन नहीं ला सकती, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ऐसा कहना हमसे एक विशेष जीवनशैली की निरंतर माँग करता है। हम बाजारों की खाक छानने  और भव्य चकाचौंध से भरी भीड़भाड़ वाली जीवनशैली से बाज नहीं आना चाहते।क्या हम इन सब पर नियंत्रण कर कम आवश्यकताओं के साथ नहीं जी सकते?इसी की वकालत तो थोरियू(थोरो) आदि प्रकृतिवादी, मानवतावादी विचारकों ने भी की थी।

कुछ दिन अगर हम ऐसा करते हैं तो क्या इसकी आदत नहीं बना सकते?धरती शायद ऐसा करने को प्रेरित कर रही है।कोरोना की त्रासदी, भूकंप के बड़े बड़े झटके, अनियंत्रित नदियों की बाढ़ ,जंगलों का जलते ही जाना आदि क्या कुछ उसके अंदरुनी हलचलों की गवाही नहीं देते ? पर निरे भौतिकवादी हम  इन प्राकृतिक संकेतों को समझना ही नहीं चाहते।अगर पर्यावरण संरक्षण हम नहीं करते तो धरती हमें ऐसे कितने संकटों से दोचार करवा सकती है उसकीहम कल्पना तक नहीं कर सकते।

मनुष्य की स्वार्थपूर्णव्यापारिक बुद्धि पर लगाम चाहिए।बढ़ती जनसंख्या पर लगाम चाहिए ताकि आवश्यकताएँ सीमित हो जाएँऔर गृह सीमा में ही पूरी हो जाएँ।पर निराशा होती है यह सोचकर कि हम इतना आगे बढ़ चुके हैं कि वापस लौट नहीं सकते।

जिन मूलभूत सिद्धांतो को लेकर महात्मा गाँधी ने देश को आजाद करने के सपने देखे, उसमे देश को स्वावलम्बी करने के प्रयत्नों को भी जोड़ा पर समय के प्रवाह ने उसकी उपेक्षा कर दी और व्यक्ति और राष्ट्र दोनो ही दृष्टियों से हम परावलम्बी ही होते गये। चुपके से उन्नति के नाम पर व्यक्तिवादिता नेजीवन में प्रवेश लिया।  यह भी थोरो के सिद्धांतों काप्रकारांतर से अनिवार्य पल्लवन ही था।

वर्तमान संदर्भ में यह कहने में कोई हिचक नहीं होती किइस प्रकृतिवादी दृष्टिकोण नेजहाँ लोगों को अधिक से अधिक प्रकृति के बीच जीवनव्यतीत करने की बात की, वहीं समाज, व्यक्ति  राष्ट्र आदि के परस्पर सम्बन्ध की अनिवार्यता पर बल न देते हुएव्यक्तिवादी दृष्टिकोण का पोषण किया। मनुष्य के अन्तर्निहित गुणों और उसकी सम्भावनाओं का पूर्ण विकास होना चाहिए। समाज का उसमें किंचित हस्तक्षेप नहीं होना चा हिए–समाज से अधिक व्यक्ति को महत्व देनेवाले इसी सिद्धान्त ने आगचलकर अराजकवादी दृष्टिकोण का पोषण भी किया।

इस एक सिद्धान्त ने ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत की .। आज उसपर चाहे जितने भी लगाम लगा लें ,उसे सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य और अधिकार से जोड़ने की कोशिश करें, यह अपने मूल रूप में अप्रतिहत रहने को सदैव प्रयत्नशील हो यदा कदा अराजक माहौल उत्पन्न करता ही रहेगा।संभवतः इसी मूल भावना ने द्विराष्ट्र केसिद्धान्त का समर्थन भी किया। राष्ट्रवादिता  की विश्यवापी  लहर के उपर भी व्यक्तिवादिता की  अपने अस्तित्व को बचाकर रखना उसकी एक स्वाभाविक विशेषता रहीऔर एक बड़ी चुनौती भी।

व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्तियों की अभिव्यक्ति और राष्ट्रवादिता के मध्य  सही संतुलन  की आवश्यकता इस युग की माँग है जिसकी अवहेलना नहीं हो सकती।इस संतुलन के अभाव में ही राष्ट्रद्रोह जनित आवाजें उठा करती हैं। जाति और समुदाय के नामपर राष्ट्र और समाज के हितों की अवहेलना की जाती है। यह सही है कि व्यक्ति के विकास के लिए स्वतंत्रता चाहिए ,राष्ट्र अथवा समाज का कम से कम हस्तक्षेप चाहिए।पर उसके कारण राष्ट्र की स्वतंत्रता ,सम्प्रभुता और अखंडता पर आँच भी तो नहीं आनी चाहिए।

इसव्यक्ति स्वातंत्र्य से व्यक्ति का धर्म भी जुड़ा है। और, धर्म की सुरक्षा केलिए उसके प्रचार , प्रसारभी व्यक्ति का अधिकार है। यह उसकी अध्यात्मिक उन्नति से जुड़ा प्रश्न है।  यह भी व्यक्ति स्वातंत्र्य का हिस्सा हैऔर राष्ट्र का इससे अलग रहना धर्मनिरपेक्षता का विषय है।किन्तु अगर इसे भी दूसरे की आस्थाओं पर बलात प्रहार करने से रोका नजाय तो वैयक्तिक  स्वतंत्रता के नाम पर घोर अराजक स्थितियों की सृष्टि करता है,धर्मों के बीच टकराव की स्थिति को जन्म देताहै। देश करीब करीब नित्य ही ऐसी स्थितियों से जूझ रहा हैऔर उससे निपटने के लिए कानून भी बनाए जा रहे हैं। पर कानूनों का पालन करवाना भी इन सिद्धान्तों के तहत समस्या ही तो है।   ये सारे अराजकवादी प्रतिफलन उस एकमात्र प्रकृतिवादी व्यक्तिवादी सिद्धान्त के ही माने जा सकते हैं।

आज विश्व के बड़े से बडे डेमोक्रेसी मे थोरो के सिद्धान्तों को एक निर्देशक तत्व के रूप में देखा जारहा है , उसे मानवाधिकारों के संरक्षक के रूप में जाना जा रहा है,पर उसके प्रकृतिवादी दृष्टिकोण की परवा करने की आज हमें अधिक जरूरत है।बाकी सारे सिद्धान्तों को वक्त अपनी कसौटी पर कसता रहता है।

यह ठीक है कि इन सिद्धांतों को लेकर  विश्व में मानव अगर प्रगति करना चाहता है तो उसे स्वविवेक का आश्रय लेना होगा।पर यह स्वविवेक ही तो व्यक्तित्व का निर्णायक तत्व हुआ करता है। यही उसके रामत्व,और रावणत्व का निर्माण करता है । यही दोनों के बीच संघर्षों को जन्म देता है। यही जातिगत धर्मगत संघर्षों को भी जन्म देता है।

आदिकाल से आजतक की विश्व  की विकासयात्रा भी व्यक्ति समुदायों अथवा वर्ग विशेषों के व्यवहारों, कार्यकलापों के ही परिणाम हैं जिनपर उनके स्वविवेक की मुहर लगी है।वस्तुतः मनुष्य के बढ्ते हुए स्वार्थों मे  स्वविवेक की  अहमन्यता खो गयी है। विवेक की परिभाषा संकुचित हो गयी है।उसका वह अध्यात्मिक अर्थ ढूंढ़े नहीं मिलता जिसे इन सिद्धान्तों के प्रयोक्ताओं ने गीता, उपनिषद, वेद वेदांगों से ग्रहण किया था।

अब हम ऐसी स्थितियों में फँस गये हैं जहाँ संघर्ष ही संघर्ष है।मात्र अपने देश की ही बात करें तो कल्पना मेंपूर्ण अराजकता ही दिखायी देती है।कभी धर्म ,जाति तो कभी राज्य और भाषा ,कभी रीतियाँ और रिवाज । सीमा पर आतंकियो से जूझने को संघर्ष।  हर जगह वर्चस्व की लड़ाई है । ईसा मुहम्मद और बुद्ध कहीं खो गये प्रतीत होते हैं। वे अपने संदेशों के निशान ढूँढने में लगे हैं।

वर्चस्व कायम करने के लिए इन संघर्षों को मेटने की जगह हवा देते लोग और,बड़ी बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ। ये स्वार्थ जनीन प्रयत्न मानवीय अधिकारों के तहत ही होते हैं।  और मानवीय अधिकार पुनःव्यक्तिवाद , अभिव्यक्ति के अधिकारों के मार्ग पर चलकरअराजक स्थिति की सृष्टि ही करते है। यह स्थिति कहाँ जाकर रुकेगी, कहा नहीं जा सकता।

क्या पुनःइसके समाधान में एक स्वार्थहीन, अत्यन्त साधारण, कम से कम आवश्यकताओं वाले प्राचीन प्राकृतिक जीवन की कामना हम नहीं कर सकते? यह सच है कि अब यह सम्भव नहीं। इच्छाओं ने हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है। प्रकृति के सान्निकट्य की निभृत इच्छा छुट्टियों में पहाड़ों, जंगलो की और आकर्षित करती है पर सदा वहीं आवासित होना शायद कुछ को ही स्वीकार होता है। हम वापस नहीं लौट सकते।

आशा सहाय  9–12-2020

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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