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स्वाभिमान की रक्षा के लिए

चंद लहरें
चंद लहरें
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बात इसी वर्ष 13 जनवरी 2021 की है। दैनिक जागरण में एक आर्टिकल प्रकाशित हुआ था–अपनी ज्ञान परम्परा का महत्व समझें-श्रीगिरीश्वर मिश्र के प्रस्तुत निबंध की ओर ध्यान आकृष्ट होने और इतने दिनों के उपरांत भी उसे विस्मृत न कर पाने का कारण वह विषय रहा जिसने मस्तिष्क को सोचने की एक विशेष दिशा प्नदान की।यह मूल कथ्य कि अपनी पुरानी भारतीय ज्ञान परम्परा वस्तुतः विदेशियों के हाथों गिरवी रखी हुई है क्योंकि हमारी तत्कालीन अकिंचन स्थिति ऐसा करने को बाध्य थी।

यह एक विशिष्ट कथ्य है जो हमारी पुरानी ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने की प्रेरणा तो देता ही है हमारे समस्त आचार विचार , वैदिक माहित्यिक ज्ञान जिसे हमनेविपन्न मान लिया वस्तुतः कृत्रिम चकाचौंध में वहप्रकाशहीन दिखायी दे रहाथा  और अब कदम कदम पर जबहमें उसके शान्त सौम्य प्रकाश की आवश्यकता महसूस हो रही है उसे पुनरुज्जीवित करने की आवश्यकता प्रतीत होती है।हमारी उस ज्ञानपरम्परा का लाभ विदेशियों ने  चुप चाप उठाया उसपर अपनी मुहर लगाने की भी कोशिश की।

यह सही हे विपन्नता  की स्थिति में बहुमूल्य वस्तुओं को गिरवी रखने की परम्मपरा काफी पुरानी है।हम अपनी सुरक्षा केलिए, आवश्यकता के लिए कई वहुमूल्य चीजें बंधक रखते आए हैं।उपहार में अपना बहुमूल्य हीरा कोहिनूर भी किसी शक्तिशाली नृप को देकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की थी।  किन्तु यह भी सही है कि गिरवी रखी हुई चीजों को वापस लौटा लेने की भी परम्परा है। अपना ज्ञान, अपनी भाषा और अपनी विचारधारा कोहमने पश्चिमी विचारधारा को गिरवी रख दी और यह मान कर बैठ गये कि हम इन सभी क्षेत्रों में अकिंचन  हैं।

हमारी संस्कृति भी उनके सम्मुख अकिंचन है।किन्तु अब मानवमात्र के लिए अपने स्वाभिमान का रक्षण उसकी प्थम प्राथमिकता हो गयी है परिणामतः तथाकथित अत्यधिक पिछड़े देश भी जोसदियों से किसी विदेशी सभ्यता से रौंदे गये हों और आज व्यवहार मे उसी सभ्यता को लेकर फल फूल रहे हों , अपनी आदिम सभ्यता और संस्कृति को पुनर्जिवित करना चाहतें हैं और इस तरह अपनी दासता का दंश भूलना चाहते हैं।यह अत्यंत स्वाभाविक भी है। मानव जाति ने अपने विकास के दौर में देश काल के अनुरूप जीने की कलाएँ विकसित कीं , चिकित्सा की पद्धितियाँ विकसित की, रहन सहन के ढंग, कला कौशल विकसित किये जो उन्हें आज भी प्रिय  हैं।  वे उनको सुरक्षित और संरक्षित रखना चाहते हैं भले ही  आज के दौर मे उनकी उपयोगिता हो अथवा नहीं।यह उनके स्वाभिमान की रक्षा का प्रश्न होता है।

हमारे भारत के साथ भीऐसा ही कुछ हुआ है। विदेशी आक्रांताओं अथवा साम्राज्यवादी जातियों ने सर्वप्रथम अपनी भाषाओं का हमें गुलाम बनाना चाहा, यह उनकी बहुत बड़ी और अत्यन्त स्वाभाविक विजय थी। जो भाषा उन्हों ने अपनी सुविधा के लिए थोपी, वस्तुतः वह आधुनिक जानकारियों का बहुत बड़ा स्रोत होते हुए भी हमें मानसिक गुलामी की ओर प्रवृत्त करता गया।हमने तो अपनी पुरानी समृद्ध भाषा को छोड़ उनकी भाषा का आश्रय लेकर उनकी नई दुनिया की गुलामी स्वीकार कर लीऔर उन्हों ने हमारी उस समृद्ध भाषा को खंगालना शुरु कर दिया और उसमे सारे वैज्ञानिक ज्ञानों का उत्स ढूँढ़ने में सक्षम होते गये। यह बात हमारी संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा के लिए बहुत अधिक सत्य तो है किन्तु हमारी आधुनिक भारतीय भाषाओं के संदर्भ में भी उतनी ही सत्य है जिसकी शक्ति और साहित्यिक सम्पदा की अवहेलना कर हमनेउसपर अंग्रेजी जैसी भाषा को स्वेच्छा से हावी होने दिया ,मानो समस्त ज्ञान सम्पदा का वही स्रोत हो।

हम कह सकते हैं कि इस लोभ ने हमें अपनी भारतीय भाषाओं को गिरवी रखने को विवश किया। वस्तुतः यह उस युग की माँग थी और ऐसा किए बिना हमारी जानकारियाँ विश्व की जानकारियों के समकक्ष नहीं हो पातीं। किन्तु अब की परिवर्तित स्थितियों में जब हमें अपनी भाषाओं की शक्ति कापूर्ण एहसास है इसे पुनर्जीवित कर उसे राष्ट्र स्वाभिमान की रक्षा का दायित्व सौंपने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान का वाहक इसे ही बनाने की आवश्यकता  है1इस उद्येश्य की पूर्ति हेतु माध्यमिक ही नहीं उच्च शिक्षा स्तर तक इन्हें शिक्षण और प्रशिक्षण का माध्यम बनाना होगा

। मार्ग में बाधाएँ अवश्य हैं किन्तु अगर यह लक्ष्य हो तो प्रयत्नों से उसे प्राप्त करने की कोशिश करनी ही होगी।

हमारी भाषाएँ हर जगह पहुँचे, ठीक उसी तरह जैसे अपनी बुद्धि कौशल के बल पर इम भारतीय विश्व के कोने  कोने तक पहुँच गयेऔर अपना लोहा मनवाने में सक्षम रहे।यह कहने में संकोच नहीं वरन गर्व का अनुभव होगा कि एक सशक्त भारतीय भाषा हिन्दी को प्रतिनिधि भाषा के रूप में विश्वपटल पर सम्पूर्ण महिमा प्रदान करने की हम चेष्टा करें ताकि वह  अंग्रेजी की तरह ही  सर्वज्ञानयुक्त होने का गौरव प्राप्त कर सके। तभी हम उसकी खोई हुई गरिमा को लौटा सकेंगे और अपने स्वाभिमान की रक्षा भी कर सकेंगे। इस दिशा में देश प्रयत्नशील है। नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन इस दिशा में बढ़ता हुआ कदम प्रमाणित होग।जहाँ तक मातृभाषा में शिक्षण का प्रश्न है कक्षा पाँचवी तक और आगे आठवी तक और संभव हो तो आगे की शिक्षा में भी इसे प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया है। देश की अपनी सभी भाषाओं के प्रति न्याय करने और उसे महत्व प्नदान करने की दिशा में यह एक सशक्त पहल है। साथ ही  संस्कृत सहित सभी प्राचीन भाषाओं केशिक्षण पर भी बल दिया गया है।

अब बात हमारी ज्ञान परंपरा की है।अबतक आंशिक रूप से उसी की चर्चा भी हुई है।तात्पर्य यह कि पाश्चात्य ज्ञान परंपरा की जगह हम अपनी वैदिक ज्ञान परम्पराऔर संस्कृति को वापस ला सकें, उसे विदेशी चंगुल से मुक्त कर सकें तो यह महत उपलब्धि होगी  ।बंधक रखने की परंपरा एक ऐतिहासिक सत्य हो सकता है पर बंधक को छुड़ा लेना ,यह भविष्य का ऐतिहासिक सत्य हो सकता है।अपने आचार विचारों , भावनाओं , रीतियों, नीतियों मे इस उद्येश्य को स्थान देना आवश्यक है।

हमारी वैदिक ज्ञान परंपरा मे हमारी प्रकृति की पहचान और उपयोगिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  संकट काल में जब पूरी मानव जाति एक अदृश्य पैनडेमिक रोग के संकट से जूझ रही है इसकी जड़ी बूटियों की चिकित्सकीय दृष्टि ने भारत को बहुत हद तक इसे झेलने और दुष्प्रभावों से बचाने की प्रतिरक्षात्मक शक्ति विकसित करने में मदद की है। अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए हमें इनका खुलकर समर्थन करने की आवश्यकता है।किन्तु बाहरी प्रभावों और चिकित्सकीय शैली के मोह में हमारे बुद्धिजीवी इसकी आलोचना करने से नहीं चूकते। आत्मनिर्भरता की ओर बढ्ते हमारे इस कदम को हमस्वयं रोक देनाचाहते हैं।

चिकित्मकीय उपलब्धियों के संदर्भ में भी यह सत्य है।हमने अपने प्राचीन चिकित्सकीय एवं औषधीय ज्ञान परम्परा को विकसित नहीं होने दिया ।त्वरित चिकित्सा की आवश्यकता, मानसिकता और सर्जरी की विकसित स्थिति ने पाश्चात्य चिकित्सकीय पद्धति का विश्वभर मे प्रसार देख हमें भी उसे ज्यों की त्यों अंगीकृत करनेे मे अपनी भलाई दिखी, यह अत्यन्त स्वाभाविक था। किन्तु आज उसकी पूर्ण प्रतिद्वन्दिता तो नहींपर रोगों के स्थायी उपचारमें हमारी देशी दवाईयाँ  जड़ी बूटियों से सम्बन्धित वित्मृत अर्धविस्मृत ज्ञान को अगर हम ताजा कर रहें हैं और उसके प्रति जन मानस की उपयोगितात्मक श्रद्धा को जगाना चाहकर विश्वमें उसे सम्मान दिलाने की चेष्टा कर रहे हैं  तो यह खोयी हुई ज्ञान परम्परा को पुनर्प्रतीष्ठित करने जैसा ही होगा। अफ सोस इस बात का अवश्य है कि अब हमारे देश के जाने माने पाश्चात्य पद्धति के चिकित्सक ही ऐसा नहीं होने देना चाहते। क्या यह देश के लिए लज्जाजनक नहीं?/

एक दूसरा विषय जिस पर आधुनिक वैश्विक बौद्धिक विचारधारा द्वारा लगातार हमले होते रहे हैं और उसे सदैव अवांछित औरपिछड़े पन का दर्जा दिया जाता रहा है, वह एक विशेष जीवन शैली अथवा जीवन पद्धति है , जिसकी उपयोगिता को पाश्चा त्य अथवा मुगलकालीन धार्मिक आक्रामकता एवं जीवन शैली के सम्मोहन ने अँधेरे में ढकेल दिया । किन्तु , अब विचारकों ने उसकी उपयो गिता को पहचानने की चेष्टा की है। प्राचीन शैव, वैष्णव जीवन शै ली के पश्चात भारतीय वैदिक, उपनिषदकालीन जीवन शैली , जिसकी अनुपमेय उत्कृष्टता अपने जीवन मूल्यों के कारण सार्वकालिक और सार्वदेशिक  है, जो मानवता की रक्षा का एकमात्र उपाय सिद्ध हो सकता है, उसे विदेशी चाकचक्य ने आच्छादित कर दिया है।मानव सभ्यता के आदर्श  उन आदि रूपों के रक्षण ,पोषण और नई उचित व्याख्याओं द्वारा उनके पुनर्स्थापन की रक्षा करने की भी आवश्यकता है ताकि भारतभूमि के विस्मृत स्वाभिमान की रक्षा हो सके।

अन्य धर्मों द्वारा दूषित की गयीपरिभाषाओं से उसे मुक्त करने की आवश्यकता है।ऐसा कहना इसलिए आवश्यक प्रतीत होता हैकि हमारी उदारवादिता ने  ही हमारे इस तथाकथित धर्म को विदेशी आक्रांताओं , विस्तारवादी, साम्राज्यवादी जातियों की सोच के द्वारा आच्छादित करने में मदद की है। बुतपरस्ती और सिद्धांतहीनता का आरोप लगाया गया। बहुदेववादी कहकर तिरस्कृत किया गया।उसकी पहचान पर प्रश्नचिह्न खड़े किये गये।साधारण भारतीयों ने उन्हें भी सुना, उनकी ओर आकर्षित भी हुए। एकेश्वरवादी और अनीश्वरवादी सिद्धांत तो विश्व में फले फूले,और मूल भारतीय धर्म या जीवनशैली को उनके द्वारा कुचल दिया गया।पर यह भी सत्य है कि कुचले हुए व्यक्तियों  की पीड़ा सिर उठाने से नहीं चूकती।आज आवश्यकता है हमारे भारत वर्ष में फैले उन सभी धर्मों को पुनरुज्जीवित करने की, संरक्षित करने की जो विविधवेषीय तो हैंपर सर्वदा उस एक परमात्मा को ही सर्वोपरि मानते हैं। और जो कालांतर में वैदिक सभ्यता और संस्कृति को अंगीकृत करते हुए वेदान्तीय सिद्धान्तों के प्रति समर्पित हुए।

इसमें दो राय  नहीं कि अपने देश के इन आध्यात्मिक सिद्धांतों को फलने फूलने से रोकने में विदेशी आक्रांताओं और साम्राज्यवादियों का हाथ ही रहा। हमारी  भारतीय जनता  इनके द्वारा फुसलाती जाती रही।

आाज जब भारत स्वतत्र है,तो अपनी इस धार्मिक ,अध्यात्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि को  उन जकड़नों से मुक्त कर राष्ट्र की स्वतंत्र गरिमामय छवि  को  पुनर्स्थापित करना भी गिरवी से मुक्त करने के बराबर ही होगा।. आधुनिक मानस पर प्रभाव डालने वाले इन वाह्य सिद्धांतों का जीव जगत आत्मा परमात्मा  जजैसे गहन चिन्तनशील विषयों से विशेष लेना देना नहीं।ये सरल मार्ग  परलोक की चिन्तना सेऔर  मुक्ति की चिन्तना से   मु्क्त और सांसारिक वैभव तथा कुछ कल्याणकारी सिद्धांतों से मानव समुदाय पर विजयय प्राप्त करना चाहते हैं ।

भारतीय हिन्दु  चिंतन परम्परा बहुदेववादी  होती हुई भी मुक्ति मार्ग पर बढ़ने वाली है।अपने अपने देवताओं से सायुज्य की कामना करती है।. यहीअन्तिम रूप से हमारी वेदान्तीय उपलब्धि भी है।

एक अफसोस का विषय है कि उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के  लिएकिए गए प्रयासों मेंभावनाओं की  पवित्रता का  आंशिक लोोप होता जा रहा है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा कीही देन हैकि हम अपने सिद्धांतों को दूसरों पर बलात थोपते नहीं बल्कि अपने व्यवहारों द्वारा उसे अनुकरणजन्य बनाते हैं। किन्तु वर्तमान  राजनीतिक परिदृश्य मे इसने हंगामें और शोर शराबे का रूप धारण कर लिया है जो हमारी संस्कृति के अनुरूप  नहीं।

एक महा परिवर्तन की अपेक्षा  है।हमे अत्यधिक पश्चिमीकरण से बचना होगा।रहन सहन ,आहार -विहार  के अबतक प्राप्त सुविधाओं  का सम्पूर्णतः तिरस्कार तो नहीं कर सकते पर अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को सुरक्षित रखने के लिए अपनी मर्यादाएँ,अपने शील सौहार्द जैसी विशेषताएँ, अपने जीवन मूल्योंको उनसे अप्रभावित रखने को निरंतर सचेष्ट रहना हीी होगा जिनसे भारत की भावभूमि बनी है।अगर ये पाश्चात्य प्रभावों की गिरवी हैं तो राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा हेतु उन्हें  मुक्त करना अत्यन्त आवश्यक है।

आशा सहाय —7-4-2021

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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