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स्वच्छता की प्रेरणा के लिए

चंद लहरें

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एक ओर चन्द्र विजय की तैयारी हो रही थी,चन्द्रमा की सतह पर चौदह दिनों तक रोवर से खोज बीन की तैयारी। अंतरिक्ष पर विजय  प्राप्त कर सम्पूर्ण विकसित राष्ट्रोंमें नाम दर्ज करने की अकल्पनीय खुशी,और दूसरी ओर देश की निपट अविकसित मनःस्थिति या आदिकालीन ग्रामीण सोचों से निकलने को प्रेरित करने की कोशिश।,संसद के बाहर झाड़ू लगाने का प्रदर्शन। हमारी वर्तमान सरकार की अन्तरिक्ष और देश के स्वास्थ्यऔर  सफाई , दोनों ही मोर्चों पर सफलता की कामना।  सोच में कहीं कोई गलती नहीं है।

भाजपा के अपने प्रथम शासनकाल में ,प्रधानमंत्री मोदी ने पद ग्रहण के बाद  सबसे अधिक जिस बात पर बल दिया ,वह थी स्वच्छता।। काफी प्रयास हुए ।अधिकारी वर्ग इस मिशन को पूरा करने में जी जान से जुट गये।गाँवोंमें घर -घर शौचालयों की व्यवस्था की गयी  उसका उपयोग न करने वालों को दंडित करने की घोषणा की गयी।झाड़ू लेकर प्रधानमंत्री के साथ अन्यों ने खूब फोटो खिंचवायी।प्रधान मंत्री मोदी के व्यक्तित्व की इस नयी पहचान ने सबको आकर्षित किया था, यद्यपि आलोचनाएँ तब भी काफी हुई थीं।विरोधी दलों को तो आलोचना करनी ही थी,जबकि इस कार्यक्रम को विशेषकर गाँधी जी से जोड़ने की कोशिश की गयी थी। किन्तु लगा, जैसे अधिकारी वर्ग इस विषय पर जागरुक कदम उठाने लगे हैं।  पर फिर वही ढाक के तीन पात।

वस्तुतःसफाई एक जुनून है, स्वच्छता से आँखों और मन का एक लगाव है जो निज को और आसपास को स्वच्छ रखने को प्रेरित करता है। उसके उपाय ढूँढ़ता है,उसकी चर्चाएँ करता है और इस विचार को अपने आसपास लोगों  के मनमें घर बनाने देता है। इस जुनून के बिना यह संभव नहीं। किन्तु आसपास पड़े ढेरों कूड़े कर्कटों को उठाना लोग अपना कर्तव्य नहीं समझते क्यों कि इस काम के लिए वे सरकारी, अर्ध सरकारी या स्वायत्त संस्थाओं को टैक्स देते हैं।उन्हेंयह गंदी स्थिति नहीं अच्छी लगती पर दूसरों की जिम्मेवारी समझ वेइससे कन्नी अवश्य काटते हैं।  यह स्वाभाविक भी है।ऐसी मनः स्थिति को किसी के झाड़ू उठाए हुए हाथ सफाई की प्रेरणा नहीं दे सकते।

कुछदिनों पूर्व तक ये संस्थाएँ भी सही ढंग से  काम करने लगी थीं पर धीर धीरे वे भी पूर्व स्थिति में पहुँचती जा रही हैं।

लोगों की मानसिकता आदिकालीन है। जब स्वच्छता पर विशेष ध्यान  देने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी  । वर्ण व्यवस्था के तहत यह एक विशेष वर्ण अथवा सामाजिक वर्ग का कार्य होता था ,पर सामाजिक विकास के तहत टूटती हुई वर्ण व्यवस्था  ने स्वाभाविक रूप से सबों को यह कार्य अपने हाथों मे लेने को विवश किया है।पाश्चात्य जीवन शैली से सम्बद्ध विचारों का भी प्रभाव पड़ा है । पर अभी ग्राम्य समाज उस प्राचीन विचारधारा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सका है। अतः इस कार्य के लिए वह अभी भी एक वर्ग विशेष का मुँह जोहता है। यह इस समस्या का व्यावहारिक  चिंतन पक्ष है।यह पक्ष ही प्रबल है जिसके कारण तत्सम्बन्धित सारे संकल्पों को पराजय का मुँह देखना पड़ता है। कूड़ा जमा करनेवाले डब्बे  जगह जगह रखे गये हैं पर कूड़ा उसके अन्दर से अधिक बाहर जमा होता है। यह जागरुकता का अभाव है।और अगर अंदर बाहर कूड़ा भर भी गया तो उसे उठाकर मुकाम तक पहुँचाने की समस्या अभी भी बरकरार है। नगरपरिषद के एक पार्षद से तत्सम्बन्धित जिज्ञासा करने पर अपनी असमर्थता  यह कहकर जाहिर की कि कूड़ा डम्प करने की जगह का ही निश्चय नहीं हुआ है। तात्पर्य यह कि योजनाओं काआधा अधूरा  कार्यान्वयन ही हो पाता है, यह लोगों केमन में संशय और अविश्वास को जन्म देता है और वे नये प्रयत्नों के प्रति स्वयं भी उदासीन हो जाते हैं।

घर घर शौचालय के साथ ही सार्वजनिक शौचालय भी बनवाए गये है।  रंग रोगन से आकर्षक होने के पश्चात भीयह तबतक उपयोगी नहीं हो सकते,जबतक इसके संचालन के लिए किसी कर्मचारी की नियुक्ति न हो।    तात्पर्य यह  कि ये आधे अधूरे कार्य विशेषकर ग्रामीण जनता की सफाई से सम्बन्धित जीवनशैली में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते । यह बात सौ फीसदी ग्रामीणों पर नहीं तो पचास फीसदी पर तो अवश्य ही लागू होती है। प्लास्टिक एक बहुत बड़़ी समस्या है। लाख बंदिशों के बाद भी यह हर जगह व्यवहार में है। अर्ध जागरूक ग्रामीण जनता इसका बड़े गर्व से हर अवसर पर उपयोग करती हैं और परिणामतः गली सड़कऔर गड्ढे इससे भरे रहते हैं । लोगअभी भी हाथ डुलाते हुए ही शॉपिंग के लिए निकलते हैं और प्लास्टिक कीथैलियों में ही सामान भर कर लाते हैं।कुछ बड़े -बड़े दुकानों ने इसके बदले कागज की थैलियाँ देनी आरम्भ की हैं पर  सामान्य दुकानदारों को बिक्री करनी होती है   कागज के ठोंगे महँगे भी पड़ेंगे और उनके ग्राहकों को पसन्द भी नहीं आएँगे, परिणामतः वे मना भी नहीं कर पाते। ये तो गाँवों की समस्याएँ हैं पर हर स्तर के शहरों और नगरों की स्थिति भी  कुछ अधिक अच्छी नहीं। नालों की सफाई से लेकर कूड़ा कर्कट के  बड़े बड़े ढेरों  का पड़ा रहना आम बात है । वस्तुतः सब जगह मानसिकता वही है।    सफाई कर्मचारियों की आए दिन हड़ताल समस्या को विकट बना देती है।

ये व्यावहारिक समस्याएँ संसद के बाहर नेताओं द्वारा झाड़ू लगा कर न तो सुलझाई जा सकती हैं न सफाई की कोई प्रेरणा ही दे सकती हैं। लोग अब इन प्रयासों की वास्तनिकता को अच्छी तरह समझते हैं और प्रभावित होना तो दूर , व्यंग्य से हँसते हैं।  वे इसे खुले आम राजनीतिक उद्येश्यों को साधना समझते हैं। इन मामलों में हर स्तर की जनता पर्याप्त जागरुक हो गयी है।

ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा किए गये प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। प्रभाव पड़ा है पर तत्सम्बन्धित मन की शिथिलता अभी भी बरकरार है। वह पुनः एक बार जोर शोर के प्रयासों की बाट जोह रही है। सरकार शिथिल तो जनता शिथिल।

प्रश्न है कि करना क्या होगा?चुनाव के समय जिस प्रकार नेताओं अभिनेताओं मे प्रचार की सक्रियता होती है, घर घर को स्पर्श करने और अपनी बात कहने की आवश्यकता होती है, कुछ उसी प्रकार की सक्रियता इस विषय में भी चाहिए।सफाई प्रदर्श न ही करना है तो गाँवों की ओर मुँह मोड़ना होगा। अधूरे कार्यों को पूरा करना होगा।जागरुकता के लिए उन्हे शहरों, गाँवों और गलियों में घूमना होगा, सभाएँ करनी होंगी ,स्त्रियो पुरुषों को इस दिशा में शिक्षित करना होगा। । सामाजिक टीमों का गठन कर पुरजोर आंदोलन करना होगा।संसद के बाहर का प्रदर्शन कोई मायने नही रखता।

आशा सहाय

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